पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में आने वाले किठौर विधानसभा सीट पर यूपी विधानसभा चुनाव 2022 के दौरान जीत-हार का आँकड़ा सिर्फ 2,180 वोटों का था। पिछले 30 सालों में इस सीट पर सिर्फ दो बार हिंदू प्रत्याशी जीते हैं। इनमें एक भाजपा के सत्यवीर त्यागी भी हैं, जिन्होंने यूपी विधानसभा चुनाव 2017 में यहाँ जीत हासिल की थी। 

मेरठ जिले में कुल 7 विधानसभा सीटें हैं। ये सीटें हैं – सिवाल खास, सरधना, हस्तिनापुर, किठौर, मेरठ कैंट, मेरठ शहर और मेरठ दक्षिण। इनमें हस्तिनापुर सुरक्षित यानी रिजर्व सीट है। किठौर विधानसभा मेरठ संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत आता है, जिसमें कुल 5 विधानसभा की सीटें हैं। 

पिछले विधानसभा चुनावों की स्थिति

यूपी विधानसभा चुनाव 2022 में इस सीट पर अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी (सपा) के उम्मीदवार शाहिद मंजूर ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रत्याशी सत्यवीर त्यागी को हराया था। सिर्फ 0.90% यानी 1% वोट से भी कम से यह हार जीत हुई थी। शाहिद को कुल 1,07,104 वोट मिले थे, जबकि त्यागी को 1,04,924 वोट मिले थे।

किठौर सीट को शाहिद मंजूर का पारिवारिक गढ़ कहा जाता है। शाहिद मंजूर यहाँ से चार बार विधायक रहे हैं। वे साल 2002, साल 2007, साल 2012 और साल 2022 में सपा से निर्वाचित हुए थे। उनके पिता मंजूर अहमद भी यहाँ से दो बार विधायक रहे। वे साल 1967 और 1969 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से विधायक चुने गए थे।  

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पिछले विधानसभा चुनाव में सपा के शाहिद मंजूर और भाजपा के सत्यवीर त्यागी के अलावा बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के कुशल पाल मावी ने भी अच्छा प्रदर्शन किया था। उन्होंने 31,213 वोट लाकर तीसरा स्थान हासिल किया था। पिछले विधानसभा चुनाव में इस सीट पर 69.20 प्रतिशत वोटिंग हुई थी।

हालाँकि, यूपी विधानसभा चुनाव 2017 में भाजपा के सत्यवीर त्यागी ने सपा प्रत्याशी शाहिद मंजूर को 10,822 वोटों से हराया था। उस दौरान त्यागी को 90,622 वोट मिले थे, जबकि शाहिद मंजूर ने 79,800 मत हासिल किया था। बसपा के गजराज सिंह भी 62,503 वोट लाने में कामयाब रहे थे।

यूपी विधानसभा चुनाव 2012 में सपा प्रत्याशी शाहिद मंजूर ने बसपा प्रत्याशी लखीराम नागर को हराया था। तीसरे नंबर पर राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) के प्रत्याशी सत्यवीर त्यागी थे। बाद में यही सत्यवीर त्यागी 2017 से पहले भाजपा में शामिल हो गए। शाहिद को 73,015 और नागर को 61,909 त्यागी को 34,791 मत मिले थे। 

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अगर पार्टी के हिसाब से देखा जाए तो साल 1957 से लेकर साल 2022 तक के विधानसभा चुनावों में भाजपा को सिर्फ दो बार जीत मिली है। पहली बार 1993 में रामकिशन वर्मा जीते और दूसरी बार 2017 में सत्यवीर त्यागी। कॉन्ग्रेस ने तीन बार (1957 और 1962 में श्रद्धा देवी और 1980 में भीम सिंह) जीता। बसपा एक बार भी नहीं जीती।

लोकसभा चुनाव 2024 में किठौर का रूख

किठौर विधानसभा क्षेत्र मेरठ लोकसभा क्षेत्र में आता है। साल 2024 के लोकसभा चुनावों के दौरान भाजपा ने रामायण में राम का किरदार निभाए अरुण गोविल को मैदान में उतारा था। उन्होंने 5,46,469 वोटों के साथ सपा की सुनीता वर्मा को 10,585 वोटों से हराया था। सुनीता को 5,35,884 वोट मिले थे।

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अगर लोकसभा चुनाव 2024 में किठौर विधानसभा क्षेत्र का वोटिंग पैटर्न देखें तो कहानी अलग होगी। यहाँ अरुण गोविल को 41.01% वोट शेयर के साथ 93,578 वोट मिले थे। वहीं, सुनीता वर्मा को 48.34% वोट शेयर के साथ 1,10,315 वोट मिले थे। इस क्षेत्र में सुनीता वर्मा ने 16,737 वोटों से अरुण गोविल पर बढ़त हासिल की थी।

विधानसभा क्षेत्र की जातीय समीकरण

जिस तरह मेरठ लोकसभा मुस्लिम बहुल क्षेत्र है। साल 2026 की अंतिम मतदाता सूची के अनुसार, किठौर विधानसभा में कुल 3,22,769 मतदाता हैं। इनमें 1,77,334 पुरुष मतदाता और 1,45,419 महिला मतदाता हैं। वोटरों की संख्या के आधार पर यह मेरठ दक्षिण के बाद यह जिले की दूसरी सबसे अधिक आबादी वाला विधानसभा क्षेत्र है।  

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साल 2024 लोकसभा चुनाव के समय किठौर विधानसभा में कुल 3,70,320 मतदाता दर्ज थे। साल 2026 में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के बाद तैयार की गई अंतिम सूची में मतदाता संख्या में 47,551 की कमी आई है। यह कुल वोटर का करीब 12.84 प्रतिशत है।

इस तरह इस विधानसभा क्षेत्र में कुल मतदाताओं में लगभग 36 प्रतिशत मुस्लिम, लगभग 16 प्रतिशत जाटव, लगभग 16 प्रतिशत ओबीसी एवं अन्य जातियाँ, लगभग 10 प्रतिशत गुज्जर, लगभग 8 प्रतिशत त्यागी, लगभग 7 प्रतिशत क्षत्रिय और लगभग 7 प्रतिशत जाट की आबादी है।

साल 2027 के लिए क्या है असली खतरा?

साल 2027 का चुनाव सपा के लिए खतरा है। इसके कई कारण हैं। एक तो सपा-रालोद का गठबंधन टूटना और NDA में रालोद का शामिल होना। इसके अलावा, शाहिद की उम्र और उनकी सक्रियता का असर भी महत्वपूर्ण कारक है। हालाँकि, उनके बेटे नवाजिश जिस तरह से 2024 के लोकसभा चुनाव में सक्रिय थे, उससे उनके राजनीतिक पर्दार्पण की बात कही जा रही है।

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हाल ही में आजाद समाज पार्टी में शामिल हुए छात्र सपा के राष्ट्रीय महासचिव और शाहिद मंजूर के सजातीय बाबर खरदौनी ने किठौर से चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। वे कई साल से किठौर विधानसभा क्षेत्र में चुनाव की तैयारी कर रहे हैं। अगर दलित बसपा का साथ छोड़कर आसपा संग जाता है तो सियासी समीकरण गड़बड़ा सकता है।

वहीं, रालोद के एनडीए गठबंधन में आने के बाद यह सीट किसके खाते में जाएगी, इसको लेकर भी कयास है। इस सीट पर भाजपा दो बार जीती है और इस बार दूसरे स्थान पर रही है। ऐसे में इस सीट को एक बार जितने वाली रालोद को वह सीट नहीं देगी। हालाँकि, इस सीट पर जाटों, त्यागियों एवं क्षत्रियों की संख्या नया समीकरण बना सकती है।

किठौर में ही रहने वाले रालोद के पूर्व जिलाध्यक्ष और एक बार विधायक का चुनाव लड़ चुके मतलूब गौड़ भी मुस्लिम वोटों में सेंधमारी कर सकते हैं। रालोद से ही जुड़े पूर्व विधायक परवेज हलीम मुस्लिम वोटों में सेंधमारी कर सकते हैं। हलीम के पिता अब्दुल हलीम सूबे में मंत्री रह चुके हैं।

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रालोद से जुड़े परवेज लंबे शाहिद मंजूर के राजनीतिक विरोधी हैं। बसपा के राष्ट्रीय महासचिव एवं पूर्व राज्यसभा सांसद बाबू मुनकाद अली भी मंजूर के लिए दिवार बने हैं। शाहिद मंजूर का एक भतीजा आतिर मंजूर भी चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि वे भी इस बार मैदान में कूद सकते हैं।

लोगों में सपा विधायक शाहिद मंजूर के प्रति नराजगी

स्थानीय लोग चार बार के विधायक शाहिद मंजूर से दुखी हैं। किठौर को तहसील बनाने की पुरानी माँग पर ठोस कदम नहीं उठाया गया है। लोगों का कहना है कि किठौर को तहसील बनाने की माँग साल 1995 में शुरू हुई थी, लेकिन विधायक शाहिद मंजूर ने इसका समर्थन तक नहीं किया।

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शाहजहाँपुर में सड़क किनारे लगने वाली फल-सब्जी आढ़त के कारण यातायात जाम रहता है। इसलिए नवीन मंडी बनाने की माँग होती रही है, लेकिन ये काम भी पूरा नहीं हुआ है। काली नदी की सफाई, कस्बे में ड्रेनेज सिस्टम, राजकीय महाविद्यालय की मांग, युवाओं के लिए स्टेडियम स्टेडियम आदि की माँग लगातार होती रही है।