उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में नाकुड़ विधानसभा सीट एक ऐसी सीट है, जहाँ पर पिछले यानी 2022 के विधानसभा चुनाव में काँटे की टक्कर रही। हालाँकि, उसमें भाजपा के उम्मीद मुकेश चौधरी सपा के अपने प्रतिद्वंद्वी धर्म सिंह सैनी पर जीत दर्ज करने में सफल रहे। हालाँकि, यह जीत सिर्फ 315 वोटों से हुई थीं।  

नकुड़ विधानसभा सहारनपुर जिले में आने वाली 7 विधानसभा सीटों में से एक है। यह कैराना लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आता है। पिछले चुनाव में जीतने वाले भाजपा के मुकेश चौधरी गुज्जर समुदाय से आते हैं। वहीं, धर्म सिंह सैनी ओबीसी समुदाय के सैनी (माली) समाज से आते हैं। सैनी 2022 के चुनाव से पहले भाजपा छोड़कर सपा में चले गए थे। 

2027 विधानसभा चुनाव में किसकी झोली में गिरेगी नकुड़ सीट

इस मुस्लिम बहुल सीट को फिर से अपनी झोली में लाने के लिए भाजपा ने रणनीति बना ली है और जमीन पर काम करना शुरू कर दिया है। योगी सरकार द्वारा किए गए विकास कार्यों एवं योजनाओं को घर-घर पहुँचाया जा रहा है। साथ ही भाजपा यहाँ की महत्वपूर्ण जातीय समीकरण को भी साधने में प्रयासरत है।

इसके तहत भाजपा छोड़कर साल 2022 के चुनावों में सपा से उम्मीदवार बने धर्म सिंह सैनी घर वापसी कर चुके हैं। भाजपा के सूत्रों का कहना है कि नकुड़ के समीकरण को देखते हुए इस सीट से धर्म सिंह सैनी को ही उम्मीदवार बनाने की संभावना अधिक है। वहीं, गुज्जरों की नाराजगी को दूर करने के लिए मुकेश चौधरी को समायोजित किया जा सकता है।

इसके अलावा, भाजपा-रालोद साथ गठबंधन भी जातीय समीकरण को साधने में मदद करेगा। इससे जाट वोट NDA की तरफ मुड़ेगा। साल 2022 के विधानसभा चुनाव में RLD और सपा का गठबंधन था। वहीं, समाजवादी पार्टी से दूरी बनाकर रहने वाला दलित, पिछड़ा और अति पिछड़ा समुदाय अपना वोट बर्बाद नहीं करेगा।

नकुड़ के सरसावा के रहने वाले एक दलित व्यक्ति ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि मायावती के प्रति यहाँ लोगों में प्रेम है, लेकिन बसपा अभी सरकार बनाने की स्थिति में नहीं है। ऐसे में दलित नहीं चाहते कि सपा की सरकार आए। सपा की सरकार आने पर सबसे अधिक प्रताड़ना दलित समाज को झेलनी पड़ती है। 

वहीं, अति पिछड़ा और पिछड़ा में आने वाले गैर-यादव समुदाय भी सपा से संतुष्ट नहीं है। उन्हें डर है कि अगर सपा जीतती है तो मुस्लिम बहुल इस इलाके में उनका जीवन कठिन हो सकता है। कई लोगों ने बातचीत में एक बात दोहराई कि सपा सरकार में दलित-अति पिछड़ों के खिलाफ नफरत चरम पर पहुँच जाता है। 

कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भाजपा साल 2022 के विधानसभा चुनावों में सिर्फ 315 वोटों से जीती है। वहीं, 2024 के लोकसभा चुनावों में नकुड़ विधानसभा क्षेत्र में सपा-कॉन्ग्रेस गठबंधन को भाजपा से 33,791 वोट अधिक मिले थे। इसलिए इस बढ़त का लाभ सपा को इस विधानसभा चुनावों में भी मिलेगा।

हालाँकि, ऐसी स्थिति नहीं होगी। साल 2022 में धर्म सिंह सैनी को टिकट नहीं मिलने से सैनी समाज में नाराजगी थी। इसलिए यह वोट सपा की ओर शिफ्ट हो गया। RLD का साथ मिलने से जाट भी सपा की ओर चले गए थे। इसका सीधा असर भाजपा की जीत पर पड़ा।

लोकसभा चुनाव परिणामों से उत्साहित होने वाले लोग विधानसभा का गणित समझ लें। उस समय सपा और कॉन्ग्रेस का गठबंधन था, लेकिन विधानसभा चुनाव में दोनों दलों की अपनी-अपनी राजनीतिक महत्वकांक्षा के कारण गठबंधन होने की संभावना कम है। अगर गठबंधन होता भी है तो इसका असर शून्य होगा, क्योंकि कॉन्ग्रेस का अपना कोई जनाधार नहीं है।

इस बार नकुड़ सीट पर समाजवादी पार्टी को सिर्फ मुस्लिम वोटों पर ही निर्भर रहना है। अगर वह सैनी या गुज्जर समुदाय का उम्मीदवार उतारती भी है तो उसे कुछ खास लाभ नहीं होगा। अगर मान भी लें कि उम्मीदवार की जाति का आधा हिस्सा उसे मिलेगा तो भी 34% की मुस्लिम आबादी को जोड़कर यह आँकड़ा 41 प्रतिशत तक पहुँचेगा।

ऐसे में एक बड़ा पेंच AIMIM का भी है। असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी मुस्लिमों का एक बड़ा हिस्सा अपनी तरफ खींचने में कामयाब हो सकती है। वहीं, बसपा को अगर दलित वोट में से आधा यानी 7 प्रतिशत हिस्सा भी मिलता है तो भाजपा के सेहत पर कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा। तब भी भाजपा के हिस्से में 52% वोट रहेगा।

हालाँकि, दूसरे वर्गों में वोटिंग प्रतिशत में गिरावट भाजपा को मुश्किल में डाल सकती है। इसलिए भाजपा का सबसे बड़ा काम अपने वोटरों को बूथ तक लाना बड़ी प्राथमिकता होगी। अगर भाजपा इसमें कामयाब हो जाती है तो उसका जीत सुनिश्चित हो सकता है। हालाँकि, मुकाबला काँटे का होगा, यह तय है।

इस तरह भाजपा से अब ना क्षत्रिय समुदाय की नराजगी है, ना गुज्जर समुदाय की और ना ही सैनी समाज की। इन समाजों का एक तरफा वोट भाजपा की ओर जा सकता है और भाजपा इस बार भारी अंतर से जीतने में कामयाब हो सकती है। भाजपा इस समीकरण को लगभग साध चुकी है।

साल 2022 के विधानसभा चुनाव की स्थिति

साल 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बीजेपी के मुकेश चौधरी को 1,04,114 मत मिले थे। पा के धर्म सैनी को 1,03,799 मत मिले थे। बसपा के साहिल खान को 55,112 मत और कॉन्ग्रेस के रणधीर सिंह को सिर्फ 1,354 वोट मिले थे। असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM भी 3,593 पर सिमट गई थी।  

इस सीट पर 2017 के विधानसभा चुनावों में भी धर्म सिंह सैनी ने भाजपा उम्मीदवार के रूप में कॉन्ग्रेस प्रत्याशी इमरान मसूद को फिर 4,057 वोटों से हराया था। इससे पहले साल 2012 के विधानसभा चुनाव में वे बहुजन समाज पार्टी की के उम्मीदवार के रूप में कॉन्ग्रेस उम्मीदवार इमरान मसूद को 4,564 वोटों से हराया था।  

साल 2024 के लोकसभा चुनाव में नकुड़ सीट की स्थिति

आम चुनाव के दौरान कैराना लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले इस विधानसभा सीट पर भारी बदलाव देखने को मिला है। साल 2024 लोकसभा चुनाव में समीकरण बदल गए थे। सपा और कांग्रेस का गठबंधन था। वहीं, साल 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा की सहयोगी रही RLD भाजपा गठबंधन में आ गई थी।

कैराना लोकसभा सीट पर सपा की प्रत्याशी इकरा हसन जीती है। इकरा हसन को कुल 5,28,013 वोट मिले थे, जबकि गुज्जर समाज से आने वाले भाजपा के प्रदीप कुमार को 4,58,897 वोट मिले थे। वहीं, बसपा के श्रीपाल को 76,200 वोट मिले थे। लगभग 16,696 हजार वोट नोटा और 11 अन्य उम्मीदवारों को मिलाकर मिले थे।

अगर नकुड़ विधानसभा सीट की नजरिए से देखें तो इस सीट पर सपा-कांग्रेस गठबंधन को 1,26,320 वोट मिले थे। वहीं, भाजपा-रालोद गठबंधन को 92,529 मिले थे, जबकि बीएसपी को 31,016 वोट मिले थे। इस लोकसभा चुनावों में नकुड़ विधानसभा क्षेत्र में सपा-कॉन्ग्रेस गठबंधन भाजपा से 33,791 वोटों से आगे रही थी। 

साल 2019 के लोकसभा चुनावों में समीकरण बदल गए। समाजवादी पार्टी इस विधानसभा क्षेत्र में भाजपा से 4,058 वोटों से आगे रही। वहीं, 2024 में यह अंतर और बढ़ गया और सपा ने भाजपा को 33,791 वोटों से दूसरे स्थान पर धकेल दिया।  

नकुड़ विधानसभा सीट का जातीय समीकरण

नकुड़ विधानसभा क्षेत्र में मुस्लिमों और अनुसूचित जाति की आबादी सबसे अधिक है। यहाँ सबसे अधिक मुस्लिम और दलित की आबादी है। यहाँ 34% मुस्लिम और 14% अनुसूचित जाति (दलित) हैं। वहीं, गुज्जर 12%, सैनी 10%, क्षत्रिय 9%, कश्यप 7%, जाट 3.5%, ब्राह्मण 3%, वैश्य 2.5% और अन्य जाति की 5% आबादी है।

इस सीट पर साल 2012 में मतदाताओं की कुल संख्या करीब 3 लाख थी, जो साल 2017 में बढ़कर 3.30 लाख और साल 2022 में बढ़कर 3.55 लाख हो गई। साल 2027 में कुल मतदाताओं की संख्या बढ़कर 3.75 लाख होने का अनुमान है। हालाँकि, SIR में 24 हजार नामों की कटौती भी की गई है।

इस विधानसभा का गठन सन 1952 में ही हो गया था। तब से यह सीट कॉन्ग्रेस की गढ़ रही है। यहाँ विधानसभा और उपचुनाव के कुल 19 चुनाव हो चुके हैं। इनमें कॉन्ग्रेस को 8 बार जीत हासिल की है। इस सीट पर कॉन्ग्रेस की अंतिम जीत 2002 की रही है।

इतना ही नहीं, इस सीट पर 5 बार निर्दलीय भी जीत चुके हैं। इस पर दो-दो बार भाजपा, बसपा और लोकदल का भी कब्जा रहा है। हालाँकि, 2008 में इस सीट का परिसीमन हुआ तो कॉन्ग्रेस का सफाया हो गया। उसके बाद भाजपा और अन्य क्षेत्रीय दलों का इस सीट पर प्रभाव बढ़ा।

इस विधानसभा क्षेत्र में नकुड़ कस्बा, सरसावा, सुल्तानपुर, सरसावा नगरपालिका परिषद, नकुड़ नगरपालिका परिषद और नकुड़ तहसील की चिलकाना सुल्तानपुर नगर पंचायत शामिल हैं। इसमें ऊपरी दोआब क्षेत्र के 271 गाँव और तीन कस्बे भी शामिल हैं।