उत्तर प्रदेश की कुल 403 विधानसभा सीटों में एक सीट बागपत जिले की बड़ौत सीट है। पिछले चुनाव यानी उत्तर प्रदेश विधानसभा 2022 में इस सीट पर सिर्फ 315 वोटों से हार-जीत हुई थी। इस सीट पर भाजपा के कृष्णपाल मलिक ने सपा-रालोद गठबंधन के प्रत्याशी जयवीर सिंह तोमर को हराया था।

जाट समाज से आने वाले कृष्णपाल को कुल 90,931 वोट मिले थे, जबकि जाट समाज के ही जयवीर को 90,616 वोट मिले थे। कृष्णपाल को कुल मतदान का 46.34% और जयवीर को 46.18% वोट मिले। वहीं, 11,244 वोटों के साथ बसपा तीसरे और 1,849 वोटों के साथ कॉन्ग्रेस चौथे स्थान पर रही थी।

कृष्णपाल मलिक की यहाँ से लगातार दूसरी जीत है। साल 2017 में वे भाजपा की टिकट पर 26,486 वोटों से जीते थे। उन्हें 79,427 वोट मिले थे, जो कुल मतदान के 42.89% वोट थे। वहीं, उनके प्रतिद्वंद्वी सपा-रालोद गठबंधन के प्रत्याशी साहेब सिंह को 52,941 वोट मिले थे, जो कुल मतदान के 28.59% वोट थे।

बड़ौत विधानसभा सीट का इतिहास

बड़ौत विधानसभा सीट का गठन सन 1951 में हुआ। इस सीट पर पहली बार चुनाव 1952 हुआ। हालाँकि, आगे चलकर सन 1969 में इस विधानसभा सीट को खत्म कर दिया गया। साल 2008 में जब सीटों का परिसीमन हुआ तो यह सीट फिर से बहाल हुआ। इस तरह इस सीट पर कुल 8 विधानसभा चुनाव ही हुए हैं।

साल 2012 में इस सीट पर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने कब्जा जमा लिया। बसपा के लोकेश दीक्षित ने राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) के अश्वनी कुमार को 5,676 वोटों से हराया था। बसपा के लोकेश को 57,209 यानी 39 प्रतिशत वोट मिले थे। वहीं, अश्विनी कुमार को 51,533 यानी 35 प्रतिशत वोट मिले थे।

इसमें सबसे बड़ी बात ये है कि साल 2012 में यहाँ भाजपा चौथे नंबर पर थी, जबकि समाजवादी पार्टी तीसरे नंबर पर। भाजपा के नवीन कुमार को सिर्फ 6% यानी 8,395 वोट मिले थे। वहीं, समाजवादी पार्टी (सपा) के अजय कुमार को 10% यानी 15,212 मत मिले थे।

लोकसभा चुनाव 2024 में बड़ौत सीट पर स्थिति

लोकसभा चुनाव 2024 में भाजपा और रालोद एक साथ आ गए थे। साल 2024 में बड़ौत विधानसभा सीट वाले बागपत लोकसभा सीट पर NDA गठबंधन ने अच्छा प्रदर्शन किया था। इस सीट पर एनडीए के रालोद प्रत्याशी राजकुमार सांगवान ने सपा पर 38,390 वोटों की बढ़त हासिल की थी।

रालोद के राजकुमार सांगवान को इस सीट पर 93,595 वोट मिले थे, जबकि समाजवादी पार्टी के अमरपाल शर्मा को यहाँ 55,205 वोट मिले थे। आखिरकार, राजकुमार सांगवान ने लोकसभा चुनाव 2024 में  अमरपाल शर्मा को 1,59,459 वोटों से हराकर बड़ी जीत हासिल की थी। 

ये सिर्फ लोकसभा चुनाव 2024 की बात नहीं है। इसके पहले के लोकसभा चुनावों में भी इस विधानसभा क्षेत्र में भाजपा को बढ़त हासिल होती रही है। ​​लोकसभा चुनाव 2019 में भी भाजपा ने राष्ट्रीय लोक दल पर 14,381 वोटों की बढ़त बनाए रखी थी। उस समय रालोद समाजवादी पार्टी के साथ थी।

इसी तरह साल लोकसभा चुनाव 2014 में भी भाजपा ने रालोद प्रत्याशी पर 46,058 वोटों की बढ़त हासिल की थी। लोकसभा चुनाव 2009 में रालोद ने इस विधानसभा क्षेत्र में बसपा पर 7,940 वोटों से बढ़त बनाई थी। उस समय रालोद को भाजपा का समर्थन हासिल था।

जातीय समीकरण

बड़ौत विधानसभा सीट पर वोटरों की संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी होती रही है। साल 2012 में यहाँ कुल वोटर 2,51,139 थे, जो लोकसभा चुनाव 2024 में बढ़कर 3,07,657 हो गए। हालाँकि, साल 2026 में SIR में बड़ौत विधानसभा सीट से 49,625 वोट हटे हैं। अब कुल मतदाताओं की संख्या 2,58,032 रह गई है।

इस सीट की जातीय समीकरण की बात करें तो यहाँ जाटों की आबादी सबसे अधिक लगभग 24 प्रतिशत है। इसके बाद मुस्लिमों की आबादी आती है, जो लगभग 15 प्रतिशत है। अनुसूचित जाति 11.30 प्रतिशत, वैश्य 9%, क्षत्रिय 8.5%, कश्यप 7%, गुज्जर 6%, ब्राह्मण 5%, सैनी लगभग 3% हैं। बाकी अन्य जातियाँ हैं।

विधानसभा चुनाव 2027 की स्थिति

उत्तर भारत में अधिकांश सीटों पर मतदान और हार-जीत की स्थिति में जातीय समीकरण प्रमुख मुद्दा होता है। इसमें उम्मीदवारों की जाति पूरा समीकरण बनाने और बिगाड़ने की काम करती है। हालाँकि, कुछ स्थानीय मुद्दे पर प्रभावी रहते हैं।

अगर पिछले यानी विधानसभा चुनाव 2022 पर नजर डालें तो सपा गठबंधन की राष्ट्रीय लोकदल और भाजपा, दोनों ने ही जाट नेता को मैदान में उतारा था। इसके कारण सपा-रालोद उम्मीदवार को मुस्लिम, अहीर और लगभग 75 प्रतिशत जाटों का वोट मिला था।

वहीं, भाजपा प्रत्याशी को सवर्ण समुदाय और 20-25 प्रतिशत जाटों का वोट मिला था। बसपा ने ब्राह्मण प्रत्याशी उतारा, जिससे ब्राह्मणों का एक हिस्सा बसपा की ओर भी चला गया। इस कारण से मुकाबला कड़ा रहा और भाजपा को सिर्फ 315 वोटों से जीत मिली थी।

गुज्जरों का बड़ा हिस्सा भी रालोद की तरफ चला गया। वहीं, बसपा को अनुसूचित जाति समाज का एकमुश्त वोट नहीं मिला। यहाँ कुल 62.3 प्रतिशत वोटिंग हुई, जबकि बसपा के पक्ष में सिर्फ 5.73 प्रतिशत मतदान हुए। इसका अर्थ है कि एससी समाज असमंजस की स्थिति में रहा।

साल 2027 में स्थिति अलग है। इस बार भाजपा और रालोद एक साथ है। सपा को कॉन्ग्रेस का सहारा हो सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सपा इस बार गुज्जर पर दाँव लगा सकती है, क्योंकि उसे पता है कि मुस्लिम उसे वोट देंगे ही। वहीं, भाजपा गठबंधन की ओर से जाट प्रत्याशी रहने की संभावना अधिक है।