मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ देश के ऐसे व्यक्तित्व हैं, जिनके जीवन का मूल्यांकन आसान नहीं है। वे गरीब परिवार के सामान्य पृष्ठभूमि से आकर संन्यासी बने और फिर साल 2014 में नाथ पंथ के गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर बने। योगी आदित्यनाथ को पीठाधीश्वर बने इस साल 14 सितंबर को 12 साल पूरे हो गए। 

योगी आदित्यनाथ एक तरफ गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर के रूप में धार्मिक और सामाजिक परंपरा से जुड़े हैं तो दूसरी ओर 19 मार्च 2017 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनकर कल्याणकारी योजनाओं को जमीन पर लागू कर रहे हैं। उन्होंने कानून-व्यवस्था, बुनियादी ढाँचे, निवेश, धार्मिक पर्यटन को अपनी सरकार का आधार बनाया।

गोरखनाथ मठ की परंपरा में सामाजिक समरसता, सहभोज, सेवा, जातिविहीन समाज के निर्माण की जो धारा महंत दिग्विजयनाथ और महंत अवेद्यनाथ से बही, उसे योगी आदित्यनाथ ने आगे बढ़ाया। मुख्यमंत्री बनने के बाद यही दृष्टि एक बड़े प्रशासनिक मॉडल में दिखाई दी, जिसे आज “योगी मॉडल” कहा जा रहा है।

प्रदेश की कानून-व्यवस्था में कठोरता, गरीबों तक योजनाओं की सुगमता से पहुँच, महिलाओं की सुरक्षा, धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत का पुनरुद्धार और नई उद्योग नीतियाँ…. इनके जरिए योगी सरकार ने हिंदुत्व, कानून-व्यवस्था, कल्याणकारी योजनाओं और विकास को अपने राजनीतिक मॉडल के अलग-अलग हिस्सों के रूप में पेश किया है।

उनकी राजनीति हमेशा चर्चा में रही। हिंदुत्व, मुस्लिम तुष्टीकरण के विरोध, अवैध बूचड़खानों, धर्मांतरण कानून को लेकर वे मुखर रहे। वहीं, उनके आलोचक इसे सांप्रदायिक राजनीति कहकर खारिज करते रहे। इसलिए योगी के सफर को समझने के लिए आँकड़ों, सरकारी रिकॉर्ड और स्वतंत्र रिपोर्टों के नजरिए से देखना जरूरी है।

एक पीठाधीश्वर के रूप में योगी आदित्यनाथ

एक प्रमुख पीठ के पीठाधीश्वर के रूप में योगी आदित्यनाथ ने कई कार्य किए। उन्होंने जातियों में बँटे हिंदू समाज को जोड़ने के लिए सहभोज से लेकर छुआछूत विरोधी अभियान तक चलाए। दलितों की बस्तियों का दौरा किया और उनके साथ भोजन किया। जो लोग समाज में पिछड़ गए थे, उनके हक के लिए योगी आदित्यनाथ ने लड़ाई लड़ी।

इतना ही नहीं, नाथ परंपरा के वाहक योगी आदित्यनाथ अपने शुरुआती दिनों से ही अयोध्या में श्रीराम मंदिर के निर्माण आंदोलन से जुड़े। उनके गुरु महंत अवेद्यनाथ राम मंदिर आंदोलन के प्रणेताओं में से एक थे। महंत अवेद्यनाथ ने हिंदू संगठनों और साधुओं को एक मंच पर लाने के लिए 1984 में श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का गठन किया।  

योगी आदित्यनाथ के दादा गुरु महंत दिग्विजयनाथ का भी राम मंदिर आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान था। साल 1937 में महंत दिग्विजयनाथ हिंदू महासभा में शामिल हो गए और राम मंदिर के लिए हिंदुओं को एकजुट करना शुरू कर दिया। सन 1949 में उन्होंने अयोध्या में स्वयंसेवकों की एक टीम का नेतृत्व किया।

जाति से ऊपर सामाजिक समरसता

योगी आदित्यनाथ की राजनीति को समझने के लिए गोरक्षपीठ की सामाजिक भूमिका को समझना जरूरी है। उनके गुरु महंत अवेद्यनाथ ने 1980 के दशक में छुआछूत के खिलाफ देशभर में “सहभोज अभियान” चलाया था। वे दलित बस्तियों में जाकर लोगों के साथ भोजन करते थे और अन्य हिंदुओं को भी प्रेरित करते थे।

तत्कालीन गोरक्ष पीठाधीश्वर महंत अवेद्यनाथ काशी के ‘डोम राजा’ के घर संतों को लेकर गए और उनके साथ बैठकर सहभोज भी किया था। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, महंत अवेद्यनाथ ने राजनीति से लगभग 9 वर्ष दूर रहकर सामाजिक समरसता और छुआछूत विरोधी अभियान को पूरे देश में आगे बढ़ाया और इसके लिए लंबी यात्राएँ कीं।

12 सितंबर 2014 को महंत अवेद्यनाथ का देहावसान हो गया। इसके बाद 14 सितंबर 2014 को योगी आदित्यनाथ गोरक्षपीठ के उत्तराधिकारी से पीठाधीश्वर बने। वे अपने गुरू की इस परंपरा को और आगे बढ़ाया। गोरखनाथ मठ में सहभोज की परंपरा जारी रही, जिसमें साधु-संतों और आम लोगों के साथ भोजन किया जाता रहा है।

साल 2017 में 19 मार्च को योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने। इसके कुछ ही महीनों के बाद उन्होंने गोरखपुर में करीब 500 दलित लोगों के साथ भोजन करके सहभोज की अपनी गुरू परंपरा को आगे बढ़ाया। इस दौरान उन्होंने साफ कहा कि सहभोज का उद्देश्य जाति के आधार पर भेदभाव और छुआछूत को खत्म करना है।

साल 2022 में मकर संक्रांति के अवसर पर योगी आदित्यनाथ गोरखपुर की एक दलित बस्ती में ‘अमृतलाल भारती’ के घर पहुँचे और उनके परिवार के साथ खिचड़ी भोज किया। इसे विरोधियों ने चुनावी राजनीति का कार्यक्रम कहा, लेकिन यह उनके पीठ की चली आ रही परंपरा से जुड़ा सामाजिक संदेश था। 

इसी तरह, साल 2019 में गोरखनाथ मंदिर में उन्होंने छुआछूत को सामाजिक बुराई और पाप बताते हुए इसे समाप्त करने की बात कही थी। उसी भाषण में उन्होंने गोरक्षपीठ की सेवा परंपरा को शिक्षा और स्वास्थ्य के माध्यम से लोगों की सेवा से जोड़ा था। इसका असर उस इलाके में बहुत गहराई से दिखता है।

सेवा को साधना का हिस्सा बनाना

योगी आदित्यनाथ के लिए एक पीठाधीश्वर के रूप में धार्मिक नेतृत्व केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रहा है। गोरक्षपीठ लंबे समय से शिक्षा और स्वास्थ्य संस्थानों से जुड़ी रही है। योगी आदित्यनाथ भी सार्वजनिक रूप से कहते रहे हैं कि पीठ की दृष्टि में “जनसेवा ही ईश्वर सेवा” है। यही कारण है कि पीठ से जुड़े कई शैक्षणिक एवं चिकित्सा संस्थानों में हर साल हजारों बच्चों को मुफ्त या बेहद कम खर्च में शिक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाती हैं। 

गोरखनाथ मंदिर में जनता दर्शन की परंपरा भी इसी सेवा-राजनीति का हिस्सा बनी। मुख्यमंत्री बनने के बाद भी वे गोरखपुर प्रवास के दौरान जनता दर्शन में लोगों की समस्याएँ सुनते रहे हैं। वे हर महीने औसतन 2-4 बार गोरखपुर का दौरान करते हैं और जनता दर्शन के दौरान लोगों से मिलकर उनकी कठिनाईयाँ दूर करने का प्रयास करते हैं। 

वंचित समुदायों से उनका जुड़ाव केवल सहभोज तक नहीं रहा। अपने गुरु अवेद्यनाथ के मार्गदर्शन में वे गोरखपुर क्षेत्र के वानटांगिया और मुसहर समुदायों को मुख्यधारा में लाने की कोशिश अपने राजनीतिक जीवन के शुरुआती दौर से करते रहे हैं। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने वानटांगिया बस्तियों को राजस्व गाँव का दर्जा दिया। इसके बाद उनके गाँव में आवास, पेयजल, स्वास्थ्य और आजीविका से जोड़ने की योजनाएं आगे बढ़ीं।

हिंदुत्व: धार्मिक पहचान से राजनीतिक विचार तक

योगी आदित्यनाथ का सार्वजनिक जीवन शुरू से ही हिंदुत्व के विचारधारा से जुड़ा रहा। सन 1998 में 26 साल की उम्र में वे गोरखपुर से लोकसभा पहुँचे और राष्ट्रीय स्तर पर हिंदू धार्मिक मुद्दों को उठाया। संसद में उठाए उनके प्रमुख मुद्दों में गोहत्या पर प्रतिबंध, समान नागरिक संहिता,हिंदू तीर्थयात्रियों की सुरक्षा, लव जिहाद पर रोक जैसे विषय रहे।

साल 2002 में उन्होंने हिंदू युवा वाहिनी की स्थापना की। संगठन का घोषित एजेंडा गो-संरक्षण और हिंदुत्व से जुड़े मुद्दे थे। इस संगठन में उत्तर प्रदेश में बेहद शानदार काम किया। हालाँकि, इसकी कार्य-प्रणाली को लेकर राजनीतिक विरोधी सवाल भी उठाते रहे।

मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी ने हिंदुत्व को प्रशासनिक नीतियों और सांस्कृतिक परियोजनाओं से जोड़ा। उन्होंने अयोध्या में दीपोत्सव, काशी विश्वनाथ धाम, मथुरा-वृंदावन, विंध्याचल कॉरिडोर, संभल सहित अन्य धार्मिक स्थलों के विकास तथा धार्मिक पर्यटन को आर्थिक गतिविधि से जोड़कर एक नई पहचान दी। 

उत्तर प्रदेश सरकार के आँकड़ों के अनुसार, योगी सरकार की इन नीतियों के कारण राज्य में पर्यटकों की संख्या 2016 में लगभग 21 करोड़ से बढ़कर 2024 में 66 करोड़ हो गई। अयोध्या, काशी और प्रयागराज को धार्मिक पर्यटन के बड़े केंद्रों के रूप में विकसित करने की रणनीति ने प्रदेश की अर्थव्यवस्था को मजबूती दी। 

मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति का विरोध

योगी आदित्यनाथ की राजनीतिक पहचान का एक प्रमुख हिस्सा मुस्लिम तुष्टीकरण के विरोध से भी जुड़ा है। साल 2022 सहित कई मौकों पर उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन को आगे बढ़ाते हुए कहा था कि उनकी सरकार के काम का आधार “सबका साथ, सबका विकास” होगा, लेकिन तुष्टीकरण किसी का नहीं होगा।

मुख्यमंत्री बनने के बाद उनकी सरकार ने अवैध बूचड़खानों के खिलाफ कार्रवाई की। लव जिहाद पर रोक लगाने के लिए उन्होंने साल 2021 में गैरकानूनी धर्मांतरण निषेध कानून लागू किया। इसमें जबरन, धोखे, अनुचित प्रभाव या प्रलोभन से धर्मांतरण के खिलाफ कड़े प्रावधान किए गए। हिंदू लड़कियों को प्रलोभन से बचाने के लिए रोमियो स्क्वॉयड का गठन किया गया।

लंबे समय से हिंदू संतों द्वारा उठाई जा रही इन माँगों को योगी सरकार ने लागू किया तो विरोधी उन्हें मुस्लिम विरोधी बताने लगे। लेकिन, योगी सरकार की नीतियों को केवल “मुसलमानों के खिलाफ” बताना भी अधूरा होगा, क्योंकि नाथपंथ में मुस्लिमों के शामिल होने की भी लंबी परंपरा रही है।

मुख्यमंत्री योगी ने भी सार्वजनिक रूप से कई बार कहा कि सरकारी योजनाओं का लाभ किसी समुदाय के साथ भेदभाव किए बिना दिया जाएगा। मुस्लिम महिलाओं से जुड़े मामलों में तीन तलाक पीड़ित महिलाओं के लिए भी सरकारी सहायता और पुनर्वास की योजनाएँ लागू की गईं।

साल 2026 में सरकार ने ऐसी महिलाओं को आवास और स्वास्थ्य योजनाओं से जोड़ने की प्रक्रिया भी शुरू की। इसलिए, ये कहना अधिक उपयुक्त होगा कि योगी की राजनीति “तुष्टीकरण के विरोध” की है, जबकि उनकी सरकार की कल्याणकारी योजनाएँ हर जरूरतमंद तक पहुँचाने की है। 

एक मुख्यमंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ

एक मुख्यमंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ ने हर क्षेत्र में कार्य किया। उन्होंने राजनीतिक अंधविश्वास को तोड़ने से लेकर प्रदेश की सकल घरेलू उत्पाद बढ़ाने तक पर असीमित काम किया। उन्होंने कानून-व्यवस्था को मजबूत करने, आतंकियों एवं धर्मांतरण रैकेट का नेटवर्क तोड़ने पर फोकस किया।

इसके साथ ही प्रदेश के आर्थिक हालात को मजबूत करने की दिशा में नई औद्योगिक नीति से लेकर महिला सुरक्षा तक काम किया। इससे ना सिर्फ प्रदेश में निवेश को बढ़ावा मिला और उद्योगों की स्थापना हुई, बल्कि प्रदेश के लोगों की सालाना आय में भारी बढ़ोत्तरी भी हुई। 

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने से पहले योगी आदित्यनाथ पाँच बार सांसद रह चुके थे।  साल 1998 में वे 26 साल की उम्र में पहली बार गोरखपुर से लोकसभा सांसद चुने गए। इसके बाद 1999, 2004, 2009 और 2014 में भी उन्होंने गोरखपुर लोकसभा सीट जीती। साल 2017 में प्रदेश में वे 44 साल की उम्र में मुख्यमंत्री बने।

नोएडा का अंधविश्वास तोड़ा

योगी के राजनीतिक सफर का सबसे प्रतीकात्मक प्रसंग नोएडा से जुड़ा है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में लंबे समय तक यह अंधविश्वास रहा कि जो मुख्यमंत्री नोएडा जाता है, वह अगला चुनाव हार जाता है। अखिलेश यादव सहित कई मुख्यमंत्रियों ने इसी धारणा के कारण नोएडा से दूरी बनाए रखी।

लेकिन, योगी आदित्यनाथ ने दशकों से जारी इस अंधविश्वास को तोड़ा और कई बार नोएडा की यात्रा की और वहाँ रात्रि विश्राम भी किया। योगी आदित्यनाथ ने दिसंबर 2017 में नोएडा जाकर इस मिथक को तोड़ा। इसके बाद वे कई बार नोएडा और ग्रेटर नोएडा गए और 2022 में दोबारा मुख्यमंत्री भी बने।

इस घटना को राजनीतिक रूप से देखें तो यह घटना योगी आदित्यनाथ के व्यक्तित्व की एक विशेषता को सामने लाती है। इस घटना ने साफ कर दिया कि योगी आदित्यनाथ परंपरागत राजनीतिक अंधविश्वासों की जगह प्रशासनिक आवश्यकता और विकासवादी दृष्टिकोण को प्राथमिकता देते हैं।

अपराधियों पर जीरो टॉलरेंस

योगी सरकार की सबसे बड़ी पहचान कानून-व्यवस्था और अपने वादे को पूरा करने को लेकर रही है। सरकार ने अपराधियों के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट, संपत्ति जब्ती, बुलडोजर कार्रवाई, STF और पुलिस कार्रवाई को आक्रामक तरीके से इस्तेमाल किया। इसका असर प्रदेश की कानून-व्यवस्था पर स्पष्ट रूप से पड़ा और अपराध में कमी आई।

उत्तर प्रदेश पुलिस और योगी सरकार ने इस दौरान अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई, चार्जशीट और दोषसिद्धि को अपनी कानून-व्यवस्था नीति का प्रमुख हिस्सा बनाया। इसका राजनीतिक असर यह हुआ कि “कानून-व्यवस्था” योगी सरकार की सबसे मजबूत चुनावी पहचान बन गई। इसका स्पष्ट संदेश महिलाओं में गया।

महिला सुरक्षा को प्राथमिकता

योगी सरकार ने महिला सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। मिशन शक्ति उनकी प्रमुख योजनाओं में शामिल हुआ। साल 2020 में शुरू हुए मिशन शक्ति के जरिए पुलिस, महिला हेल्पलाइन, जागरूकता, आत्मरक्षा, सुरक्षा और महिला स्वावलंबन को एक साथ जोड़ने की कोशिश हुई। यह प्रयास काफी सफल रही।

साल 2017 में उत्तर प्रदेश पुलिस में महिला कर्मियों की संख्या करीब 10,000 बताई गई थी। वहीं, साल 2025-26 तक यह संख्या 44,000 से अधिक हो गई। इसके अलावा 60,200 से अधिक पुलिसकर्मियों की हालिया भर्ती में 12,000 से ज्यादा महिलाएँ भर्ती हुईं। इ

इस योगी सरकार ने FIR, जाँच, फास्ट-ट्रैक कोर्ट और दोषसिद्धि को अपनी सुरक्षा नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया। इनमें महिला पुलिसकर्मियों की संख्या में बढ़ोत्तरी ने महिलाओं में एक अलग तरह का विश्वास पैदा किया। इस सब नीतियों के कारण प्रदेश में महिला अपराध में भारी कमी आई है।

माफिया के खिलाफ कार्रवाई

योगी मॉडल का दूसरा बड़ा राजनीतिक प्रतीक “माफिया के खिलाफ कार्रवाई” है। गैंगस्टर एक्ट, अवैध संपत्ति की जब्ती और सरकारी जमीन पर कब्जे हटाने की कार्रवाई को बड़े पैमाने पर चलाया गया। इसी को राजनीतिक भाषा में “बुलडोजर मॉडल” कहा गया।

समर्थकों के लिए यह अपराधियों में भय पैदा करने वाला प्रशासनिक मॉडल है, जबकि आलोचकों ने कई बार सवाल उठाया कि संपत्ति गिराने की कार्रवाई में कानूनी प्रक्रिया का पूरा पालन हुआ या नहीं। हालाँकि, इस मॉडल ने अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी जैसे सत्ता पोषित माफियाों के साम्राज्य को ध्वस्त किया गया। 

मार्च 2025 में राज्य सरकार द्वारा जारी आठ साल के आँकड़ों के अनुसार, साल 2017 से अब तक 79,984 अपराधियों पर गैंगस्टर एक्ट के तहत कार्रवाई की गईॉ। वहीं 930 अपराधियों पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) लगाया गया। इसके साथ ही 20,221 वांछित अपराधियों को गिरफ्तार किया गया।

इस दौरान पुलिस मुठभेड़ों में 222 दुर्दांत अपराधी मारे गए। इस दौरान 8,118 अपराधी घायल हुए, जबकि माफिया और अपराधियों की अवैध संपत्तियों पर 14,246 करोड़ रुपये से अधिक की कार्रवाई की गई थी।

आतंकी नेटवर्क और स्लीपर सेल पर कार्रवाई

उत्तर प्रदेश आतंकवाद विरोधी दस्ते (UP ATS) और स्पेशल टास्टर फोर्स (STF) ने आतंकवाद, कट्टरपंथ, आईएसआई नेटवर्क, स्लीपर सेल और धर्मांतरण रैकेट के खिलाफ कई कार्रवाइयाँ की हैं। साल 2017 में लखनऊ में ATS की कार्रवाई में आतंकी सैफुल्लाह मारा गया था। 

ATS ने पाकिस्तान से जुड़े कई आतंकी स्लीपर-सेल और ISI से जुड़े कई जासूसी नेटवर्क को ध्वस्त किया। इतना ही नहीं, विदेशी फंडिंग लेकर देश भर में हिंदू महिलाओं एवं पुरुषों का सुनियोजित तरीके से धर्मांतरण करने वाले रैकेटों को भी नेस्तनाबूद किया गया।  

बीमारू की छवि से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्था

योगी सरकार के सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक प्रदेश की अर्थव्यवस्था का विस्तार है। आँकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2017-18 में उत्तर प्रदेश का GSDP करीब 14.76 लाख करोड़ रुपये था। वित्त वर्ष 2023-24 में बढ़कर 26.43 लाख करोड़ रुपये  और वित्त वर्ष 2024-25 में यह बढ़कर 29.78 लाख करोड़ रुपये हो गया। 

प्रदेश की सिर्फ सकल घरेलू उत्पाद में ही बढ़ोत्तरी नहीं हुई है, बल्कि प्रति व्यक्ति आय भी बढ़ी है। उत्तर प्रदेश सरकार के आठ वर्ष के आकलन के अनुसार वित्त वर्ष 2016-17 में सालाना प्रति व्यक्ति आय करीब 46,000 रुपये थी, जो वित्त वर्ष 2024-25 में बढ़कर 1,24,000 से अधिक हो गई।

इसी तरह, राज्य का बजट भी वित्त वर्ष 2018-19 में 4.29 लाख करोड़ रुपये था, जो बढ़कर वित्त वर्ष 2025-26 में 8.09 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गया। वित्त वर्ष 2026-27 के बजट दस्तावेज में GSDP करीब 39.8 लाख करोड़ रुपये अनुमानित किया गया है।

निवेश को जमीन पर उतारा

योगी आदित्यनाथ इस बात को जानते थे कि हिंदू की लड़ाई पहचान की लड़ाई है, लेकिन राज्य के लोगों को सुखी करने के लिए उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत करना होगा। इसलिए उन्होंने एक तरफ हिंदूवादी विचारधारा को आगे बढ़ाया तो दूसरी तरफ अपनी विकासवादी दृष्टिकोण से प्रदेश को नए रूप में गढ़ा।

योगी आदित्यनाथ ने इन्वेस्टर्स समिट और ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट के जरिए उत्तर प्रदेश ने बड़े पैमाने पर निवेश प्रस्ताव जुटाए। राज्य सरकार के आठ वर्ष के आधिकारिक आकलन में लगभग 45 लाख करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव और करीब 15 लाख करोड़ रुपये के प्रस्तावों के क्रियान्वयन किया गया है।

इन निवेशों के कारण उत्तर प्रदेश के माली हालत बदल गई है। आज उत्तर प्रदेश इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग, रक्षा उत्पादन (डिफेंस कॉरिडोर) और पारंपरिक स्थानीय उत्पादों का एक प्रमुख हब बन गया है। इसके कारण प्रदेश में बड़े पैमाने पर नौकरियों का सृजन हुआ।

मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग का केंद्र

नोएडा-ग्रेटर नोएडा क्षेत्र को मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग का बड़ा केंद्र बनाने में योगी सरकार की औद्योगिक नीतियों की भूमिका रही है। Invest UP के अनुसार भारत में निर्मित मोबाइल फोन में उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी करीब 40% है। वहीं, भारत में मोबाइल कंपोनेंट निर्माण इकाइयाँ का 55% यूपी में हैं।

Samsung का नोएडा संयंत्र 2018 में शुरू हुआ और इसे दुनिया की सबसे बड़ी मोबाइल फोन विनिर्माण इकाइयों में से एक बताया गया है। Samsung संयंत्र में करीब 4,825 करोड़ रुपये का निवेश हुआ था। इसके अलावा, देश के इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स का 55% उत्पादन भी यूपी में हो रहा है।

Dixon और अन्य कंपनियों ने नोएडा में अपना विस्तार किया। इससे मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स की सप्लाई चेन मजबूत हुई। इसका महत्व इसलिए भी बड़ा है, क्योंकि यह केवल एक कारखाना नहीं, बल्कि कंपोनेंट, असेंबली, लॉजिस्टिक्स और निर्यात का पूरा औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र तैयार करता है।

रक्षा उत्पादन का हब

उत्तर प्रदेश डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर के तहत राज्य के लखनऊ, कानपुर, झाँसी, अलीगढ़, आगरा और चित्रकूट में रक्षा उपकरणों का निर्माण किया जा रहा है। अलीगढ़ छोटे हथियारों के लिए और लखनऊ ब्रह्मोस मिसाइल निर्माण के लिए जाना जा रहा है। इस तरह यूपी देश का प्रमुख रक्षा उत्पादन हब बन रहा है।

Invest UP के अनुसार, इस कॉरिडोर में करीब 5,000 हेक्टेयर भूमि चिन्हित है और लगभग 50,000 करोड़ रुपये के निवेश तथा 2.5 लाख रोजगार का लक्ष्य रखा गया है।  इन जगहों पर रक्षा क्षेत्र में ब्रह्मोस, ड्रोन, तोप, एयरोस्पेस और रक्षा इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों में परियोजनाएँ विकसित हो रही हैं।

टेक्सटाइल्स उद्योग

योगी सरकार ने उत्तर प्रदेश को वैश्विक टेक्सटाइल (वस्त्र) हब बनाने के लिए काम कर रही है। प्रदेश को केवल कच्चे माल या पारंपरिक हस्तशिल्प का राज्य बनाए रखने के बजाय कपड़ा और गारमेंटिंग की पूरी वैल्यू चेन विकसित करने पर सरकार जोर दे रही है। 

राज्य की Textile & Garmenting Policy में पूँजीगत सब्सिडी, बिजली शुल्क में छूट, रोजगार सब्सिडी और निर्यात के लिए फ्रेट रिइम्बर्समेंट जैसी सुविधाएँ दी गई हैं। PM मित्र पार्क के तहत लखनऊ और हरदोई में 1,000 एकड़ का एकीकृत टेक्सटाइल इकोसिस्टम विकसित करने की योजना है।

सरकार ने साल 2025 तक पिछले पाँच वर्षों में 123 टेक्सटाइल कंपनियों के करीब 2,492 करोड़ रुपये निवेश और लगभग 19,752 रोजगार सृजन की जानकारी दी थी। साल 2026 में सरकार ने उत्तर प्रदेश को वैश्विक टेक्सटाइल हब बनाने की दिशा में नए निवेश प्रस्तावों पर जोर दिया है और टेक्सटाइल्स कॉन्कलेव आयोजित किया है।

एक जनपद, एक उत्पाद 

योगी सरकार की आर्थिक नीतियों में एक जनपद एक उत्पाद यानी ODOP को सबसे अलग पहचान मिली। जनवरी 2018 में शुरू की गई इस पहल का मकसद प्रदेश के हर जिले की पारंपरिक ताकत, हुनर और उत्पाद को वैश्विक पहचान देना था। इसके लिए राज्य के सभी 75 जिलों के लिए विशिष्ट उत्पादों की पहचान की गई।

वाराणसी की बनारसी सिल्क, लखनऊ की चिकनकारी और जरी-जरदोजी, भदोही के कालीन, मुरादाबाद का पीतल, फिरोजाबाद का काँच, कन्नौज का इत्र, सहारनपुर की वुड क्राफ्ट और मेरठ के खेल उत्पाद जैसे स्थानीय उत्पादों को जिला-विशेष पहचान के साथ बाजार देने की कोशिश की गई।

ODOP को केवल प्रचार अभियान तक सीमित नहीं रखा गया। इसके तहत कारीगरों को प्रशिक्षण और टूलकिट, वित्तीय सहायता, बाजार उपलब्ध कराने और कॉमन फैसिलिटी सेंटर जैसी सुविधाओं का प्रावधान किया गया। इन केंद्रों में परीक्षण प्रयोगशाला, डिजाइन और प्रशिक्षण केंद्र, कच्चे माल की सुविधा, उत्पादन, पैकेजिंग, लेबलिंग और बारकोडिंग जैसी साझा सुविधाएँ विकसित करने का प्रावधान है।

एक जनपद, एक खेल और एक स्टेडियम 

योगी सरकार ने आर्थिक विकास के साथ खेलों को भी जिला-स्तर तक ले जाने की कोशिश की। दिसंबर 2022 में One District One Sport यानी एक जनपद एक खेल (ODOS) कार्यक्रम शुरू किया गया। इसका उद्देश्य प्रत्येक जिले की प्रतिभा को एक या अधिक खेलों के लिए पहचान और प्रशिक्षित करना था।

इसके तहत स्थानीय खेल प्रतिभा को कम उम्र में पहचान कर उसे प्रशिक्षण देने के बाद राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुँचाने की है। बागपत और गोरखपुर में कुश्ती तथा बरेली और लखनऊ में हॉकी को प्राथमिकता दी गई थी। सरकार ने प्रशिक्षकों की नियुक्ति और खेल सुविधाओं को मजबूत करने की दिशा में भी कदम उठाए।

सरकार ने हर जिले में एक स्टेडियम विकसित करने का लक्ष्य रखा। इसके साथ ही ब्लॉक स्तर के मिनी स्टेडियम और  ग्राम पंचायत स्तर पर खेल का मैदान विकसित करने पर भी जोर दिया है। इसके अलावा, खेल विश्वविद्यालय बनाकर प्रदेश में खेलों के लिए नीचे से ऊपर तक एक ढाँचा तैयार किया गया है। 

बुंदेलखंड को मुख्यधारा से जोड़ना

उत्तर प्रदेश के विकास की सबसे बड़ी चुनौती  पूर्वांचल और बुंदेलखंड को आर्थिक मुख्यधारा से जोड़ना रहा है। योगी सरकार ने एक्सप्रेस-वे जरिए एक महत्वपूर्ण पहल की। लगभग 296.07 किलोमीटर लंबा यह एक्सप्रेस-वे चित्रकूट, बाँदा, महोबा, हमीरपुर, जालौन, औरैया और इटावा को जोड़ता है।  

इसके साथ पूर्वांचल एक्सप्रेसवे और 91.35 किलोमीटर लंबे गोरखपुर लिंक एक्सप्रेसवे जैसे प्रोजेक्ट पूर्वी उत्तर प्रदेश को राष्ट्रीय बाजारों से जोड़ा गया। इसके अलावा, बुंदेलखंड में सूखे को दूर करने के लिए केन-बेतवा लिंक परियोजना को गति दी गई है।

बुंदेलखंड में जगह-जगह तालाब एवं कुँआ खुदवाए गए। अमृत सरोवर अभियान और चेक डैम शुरू किया गया। आज बुंदेलखंड में भूजल स्तर में भी काफी सुधार देखने को मिला है। आने वाले कुछ वर्षों में वहाँ सूखे की स्थिति से आसानी से निपटा जा सकेगा।

वानटांगिया को सम्मान

योगी के राजनीतिक जीवन की शुरुआत से ही वानटांगिया समुदाय से उनका संपर्क रहा। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने वानटांगिया बस्तियों को राजस्व गाँव का दर्जा दिया। इससे वनटांगिया को सरकारी योजनाओं का फायदा मिलना शुरू हुआ। 

राज्य सरकार के अनुसार गोरखपुर, गोंडा, महाराजगंज, बहराइच और लखीमपुर खीरी में फैली वानटांगिया बस्तियों में आवास, पेयजल, स्वास्थ्य और आजीविका से जुड़ी योजनाएँ अब लागू कर दी गई हैं। यह योगी मॉडल का वह हिस्सा है जो केवल कानून-व्यवस्था की कठोर छवि से अलग दिखाई देता है।

इंसेफेलाइटिस: बीमारी पर निर्णायक प्रहार

पूर्वी उत्तर प्रदेश, विशेषकर गोरखपुर, दशकों से जापानी इंसेफेलाइटिस और Acute Encephalitis Syndrome की त्रासदी झेलता रहा। साल 2017 में उत्तर प्रदेश में यह महामारी की तरह था। उस साल इस बीमारी के 4,724 मामले सामने आए थे और इससे 654 मौतें हुई थीं।

योगी सरकार ने सत्ता में आने के बाद इस पर नियंत्रण की प्राथमिकता दी। उन्होंने अस्पतालों को उन्नत किया। टीकाकरण, स्वच्छता, पेयजल, घर-घर जागरूकता अभियान, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को मजबूत करने जैसे कई महत्वपूर्ण कदम उठाए। साल 2023 के बाद उत्तर प्रदेश में इंसेफेलाइटिस से कोई मृत्यु दर्ज नहीं हुई। 

योगी आदित्यनाथ पर जनता का भरोसा

योगी आदित्यनाथ की राजनीतिक सफलता को हिंदुत्व के विकासवादी दृष्टिकोण में छिपा है। योगी सरकार ने एक तरफ अयोध्या, काशी, मथुरा, दीपोत्सव, धार्मिक पर्यटन और सांस्कृतिक पहचान को राजनीतिक एजेंडे के केंद्र में रखा। दूसरी तरफ एक्सप्रेसवे, एयरपोर्ट, डिफेंस कॉरिडोर, मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग, निवेश, टेक्सटाइल और औद्योगिक नीति को विकास के एजेंडे में शामिल किया।

इसके साथ कानून-व्यवस्था पर कठोर रुख ने योगी आदित्यनाथ अपने समर्थकों के बीच “मजबूत प्रशासक” की छवि दी। गरीबों तक आवास, राशन, LPG, किसान सहायता और दूसरी योजनाओं की पहुँच ने सामाजिक आधार को विस्तृत किया। यही वो कारण है कि योगी आदित्यनाथ ने यूपी की राजनीति में कई रिकॉर्ड स्थापित कर दिए। 

कार्यकाल पूरा कर सत्ता में वापसी का रिकॉर्ड 

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद का इतिहास राजनीतिक अस्थिरता से भरा रहा है। सीएम योगी से पहले सपा के अखिलेश यादव (2012-2017), बसपा की मायावती (2007-2012) और कॉन्ग्रेस संपूर्णानंद (1954-1960) को छोड़कर कोई भी मुख्यमंत्री अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया है।

योगी आदित्यनाथ ने 2017 से 2022 तक लगातार पाँच वर्ष पूरे किए और फिर साल 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में जीतकर सत्ता में वापसी की। यह अपने आप में एक बड़ा रिकॉर्ड था।  

साल 2022 का चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण था, क्योंकि 37 वर्षों के बाद उत्तर प्रदेश में किसी सत्तारूढ़ दल ने लगातार दूसरी बार सरकार बनाई थी। इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने 403 सदस्यीय विधानसभा में 255 सीटें जीती थीं और योगी आदित्यनाथ फिर से मुख्यमंत्री बने थे।

सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड

योगी आदित्यनाथ ने 14 सितंबर जुलाई 2026 को उत्तर प्रदेश के इतिहास में सबसे लंबे समय तक लगातार मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया। उन्होंने गोविंद बल्लभ पंत का 8 वर्ष 4 महीने 7 दिन का रिकॉर्ड पीछे छोड़ दिया। योगी आदित्यनाथ का लगातार कार्यकाल 9 वर्ष 5 महीने 26 दिन का हो चुका है।

यह रिकॉर्ड केवल इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि उन्होंने ज्यादा दिन सत्ता में बिताए। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह उनके नेतृत्व में भाजपा सरकार की राजनीतिक स्थिरता, उन पर विश्वास और 2022 में सत्ता में वापसी रही है। प्रदेश के राजनीतिक इतिहास में जहाँ मुख्यमंत्री बदलते रहे, वहाँ योगी लगातार दो चुनावी जनादेश के साथ पद पर बने हुए हैं।