उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में स्थित ऐतिहासिक स्वरूप रानी अस्पताल का नाम बदलकर काकोरी कांड के महानायक ठाकुर रोशन सिंह के नाम पर करने की माँग की जा रही है। इसके लिए धर्मनगरी में जगह-जगह होर्डिंग्स और पोस्टर लगाए गए हैं। इस अस्पताल का नाम पंडित जवाहरलाल नेहरू की माँ स्वरूप रानी नेहरू के नाम पर है। इसी जगह पर ठाकुर रोशन सिंह को अंग्रेजों ने 19 दिसंबर 1927 को फाँसी दे दी थी।

चंबल फाउंडेशन और महुआ डाबर संग्रहालय की ओर से की जा रही यह माँग कोई राजनीतिक माँग नहीं है। यह माँग एक ऐसे शहीद को सम्मान देने की माँग है, जिसने देश के लिए अंग्रेजों के सामने झुकने के बजाय अपने देश के लिए मरना चुना। यह माँग ऐसे समय में की जा रही है, जब 9 अगस्त 2025 को काकोरी एक्शन के 100 साल पूरे हुए हैं।

महुआ डाबर संग्रहालय के निदेशक डॉक्टर शाह आलम राना ने बताया कि इस आंदोलन में अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह के पड़पोते प्रियांशु ठाकुर और उनके चाचा शरद सिंह धरना स्थल पर पहुँचकर अपना समर्थन देंगे। राना इस अस्पताल का नाम बदलकर ‘अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह चिकित्सालय’ करने के आंदोलन में शामिल होने का आमंत्रण ठाकुर रोशन सिंह के परिजनों को दिया गया है।  

यह माँग ऐसे समय में आई है, प्रयागराज में शनिवार (8 अगस्त 2026) को कॉन्ग्रेस छात्रों की गूंज कार्यक्रम करने जा रही है। इस कार्यक्रम में राहुल गाँधी शामिल होने वाले हैं। माना जा रहा है कि अस्पताल की माँग करने वाला राहुल गाँधी के सामने पर इस पर प्रदर्शन करेगा। माँग कर्ताओं ने इसके लिए अनिश्चिकालीन धरना भी शुरू किया है।

सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के प्रमुख और उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने भी इस माँग का समर्थन किया है। उन्होंने कहा, “हमें स्वरूपरानी जी के नाम से कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन हमारा मानना है कि ठाकुर रोशन सिंह के योगदान और बलिदान का सम्मान किया जा चाहिए। पिछली गलतियां हुई है, जिसे ठीक करने का यही सही समय है।”

राजभर ने कहा कि नेहरू परिवार के नाम पर प्रयागराज में 40 से अधिक संस्थान हैं तो किसी के अपमान और सम्मान पर बात नहीं आएगी नहीं। राजभर ने कहा कि इस विषय पर वह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात करेंगे और अस्पताल का नाम फाँसी के तख्त पर झुलने वाले महापुरुष के नाम पर रखने की माँग करेंगे।

गाँधी परिवार के नाम पर 450+ स्थान, संस्थान, पुरस्कार एवं योजनाएँ

आजादी के बाद से लगभग 70 सालों तक देश पर कॉन्ग्रेस एवं गाँधी परिवार का कब्जा रहा। इस दौरान देश में बनने वाली स्थान, योजनाएँ, पुरस्कार और संस्थानों के नाम गाँधी परिवार के नाम पर रखे जाने लगे। कहा जाता है कि देश में 450 अधिक ऐसे स्थान, सड़कें, योजनाएँ, पुरस्कार और संस्थान हैं जो गाँधी परिवार के नाम हैं। इनमें पंडित मोतीलाल नेहरू, उनकी पत्नी स्वरूप रानी, पंडित जवाहरलाल नेहरू, उनकी पत्नी कमला नेहरू, बहन विजयलक्ष्मी पंडित, बेटी इंदिरा गाँधी, राजीव गाँधी, संजय गाँधी आदि शामिल हैं।

विश्व संवाद केंद्र के अनुसार, गाँधी परिवार के नाम पर 52 केंद्रीय/राज्य स्तरीय योजनाएँ, 28 खेल/टुर्नामेंट/ट्रॉफियों के नाम, 19 स्टेडियम, 5 हवाई अड्डे, 98 विश्वविद्यालय एवं शैक्षणिक संस्था, 51 पुरस्कार, 15 छात्रवृत्ति/फेलोशिप, 15 राष्ट्रीय उद्यान/अभयारण्य/संग्रहालय, 39 अस्पताल/मेडिकल कॉलेज, 37 संस्थान/सम्मान/महोत्सव, 74 सड़कें/भवन/संस्थान हैं।

स्वरूप रानी अस्पताल पहले था जेल

आजादी से पहले इस जेल का नाम  मलाका जेल था। उस समय संयुक्त प्रांत का, जिसमें उत्तर प्रदेश भी शामिल था, का यह सबसे कुख्यात जेल था। इसे संयुक्त प्रांत का ‘कालापानी’ कहा जाता था। अंग्रेज इस जेल में क्रांतिकारियों को कैद रखते थे और उन्हें तरह-तरह से यातना देते थे।

आजादी के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू देश के प्रधानमंत्री बने तो प्रयागराज की मलाका जेल को बगल में ही स्थित नैनी स्थानांतरित कर दिया गया। मलाका जेल को तोड़कर उस भूमि को बाद में अस्पताल निर्माण के लिए दे दिया गया।  शासन में इस जेल को तोड़कर अस्पताल बना दिया गया और इस अस्पताल का नाम उनकी माँ स्वरूप रानी के नाम पर रख दिया गया। 

काकोरी कांड की कहानी

मातृभूमि के लिए लड़ने वाले क्रांतिकारियों की 1925 आते-आते आर्थिक हालत बेहद खराब हो गई थी। उनके पास कपड़े तक नहीं थे। देश के लिए कर्ज में डूब गए थे। दूसरी तरफ पंडित जवाहरलाल नेहरू जैसे लोग अंग्रेजों के साथ नरमपंथी रवैया अपनाकर राजनीति की मुख्यधारा में आ गए थे। इनके मन में क्रांतिकारियों के लिए कोई सहानुभूति नहीं थी।  

जब पैसों और हथियारों की कमी पड़ गई तो हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन नाम से क्रांतिकारी संगठन चलाने वाले और चंद्रशेखर आजाद के गुरू ठाकुर राम प्रसाद सिंह तोमर ‘बिस्मिल’, जिन्हें प्यार से लोग पंडित राम प्रसाद बिस्मिल भी कहते हैं, ने सरकारी खजाना लूटने की योजना बनाई। ‘बिस्मिल’ ने अपनी आत्मकथा में लिखा है, “मैंने गौर किया था कि गार्ड के डिब्बे में रखे लोहे के संदूक में टैक्स का पैसा होता है। एक दिन मैंने लखनऊ स्टेशन पर देखा कि गार्ड के डिब्बे से कुली लोहे के संदूक को उतार रहे हैं। मैंने नोट किया कि उसमें न तो ज़ंजीर थी और न ही ताला लगा हुआ था। मैंने उसी समय तय किया कि मैं इसी पर हाथ मारूँगा।”

इस मिशन के लिए राम प्रसाद सिंह बिस्मिल ने अपने और नौ क्रांतिकारियों को चुना। इनमें ठाकुर रोशन सिंह, अशफाक उल्लाह खाँ, राजेंद्र लाहिड़ी, सचींद्र बख्शी, मुकुंदी लाल, बनवारी लाल भार्गव, मंमथनाथ गुप्त, मुरारी लाल शर्मा और चंद्रशेखर आजाद शामिल थे। बिस्मिल ने इस सरकारी खजाने को लूटने के लिए काकोरी नाम के एक छोटे से स्टेशन को चुना। यह लखनऊ से आठ किलोमीटर दूर शाहजहाँपुर रेल मार्ग पर स्थित था। इस खजाने को लूटने के लिए सन 1925 में 8 अगस्त का दिन तय किया गया। इस घटना को अंजाम देने से पहले ये लोग काकोरी जाकर वहाँ का जायजा लिया। हालाँकि, यह मिशन नाकाम हो गया, क्योंकि ये क्रांतिकारी जैसे ही प्लेटफॉर्म पर पहुँचे, वह ट्रेन वहाँ से निकल चुकी थी।

अगले दिन 9 अगस्त को सभी लोग फिर काकोरी के लिए निकले। उन्हें चंद्रशेखर आजाद और अशकाक उल्लाह ने समझाने की कोशिश की, लेकिन बिस्मिल नहीं माने। इसके बाद चंद्रशेखर आजाद और अशफाक चुपचाप अपने नेता की बात मान गए। इन लोगों के पास चार माउजर और रिवॉल्वर थे। इन्होंने तय किया था कि वे खजाना लूटने के दौरान किसी को नुकसान नहीं पहुँचाएँगे। इन लोगों ने अलग-अलग ग्रुप में फर्स्ट और सेकेंड क्लास में ट्रेन में चढ़ने की योजना बनाई थी और काकोरी के पास ट्रेन की चेन खींचकर रोकने का प्लान तय किया था। अब तक सब कुछ तय प्लान के तहत ही हो रहा था। ट्रेन रोक दी गई और खजाने को लूट लिया गया। इसमें लगभग 4,679 रुपए हाथ लगे।

इस लूट की चर्चा पूरे देश में हो रही थी और देशवासी इन नवजवनों की साहस को सलाम कर रहे थे। उधर, अंग्रेज अधिकारी इस लूट में शामिल लोगों की तलाश कर रहे थे। हालाँकि, उन्हें कोई सबूत नहीं मिल रहा था। इसी बीच इन क्रांतिकारियों में से किसी की चादर ट्रेन में ही छूट गई। उससे पता चला कि ये काम हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़े क्रांतिकारियों का है। इसके बाद अंग्रेजी सरकार ने व्यापक रूप से क्रांतिकारियों की गिरफ्तारियाँ कीं। सरकार ने काकोरी हमले में शामिल लोगों की गिरफ़्तारी के लिए 5000 रुपए का इनाम रखा था। इससे संबंधित विज्ञापन सभी रेलवे स्टेशन और थानों पर चिपकाए गए थे।

ब्रिटिश सरकार ने तीन महीने में करीब 40 लोगों को पकड़ लिया। चंद्रशेखर आजाद को छोड़कर इस शामिल सभी 9 क्रांतिकारी पकड़े गए। सबसे अंत में राम प्रसाद सिंह तोमर बिस्मिल गिरफ्तार हुए थे। इन सभी लोगों पर लूट और हत्या का मुकदमा चलाया गया, क्योंकि खजाना लूटने के दौरान फायरिंग में एक मौत हो गई थी। मुकदमे के दौरान बिस्मिल का साथी बनवारी लाल भार्गव गद्दारी कर गया और वह ईनाम की राशि और फाँसी से बचने के लिए सरकारी गवाह बन गया।

अप्रैल 1927 में इस मामले में फैसला सुनाया गया और राम प्रसाद सिंह बिस्मिल, ठाकुर रोशन सिंह, अशफाक उल्लाह खाँ और राजेंद्र लाहिड़ी को फाँसी की सजा सुनाई गई। इसके बाद 19 दिसंबर 1927 को राम प्रसाद सिंह बिस्मिल को गोरखपुर, ठाकुर रोशन सिंह को प्रयागराज के मलाका जेल और अशफाक उल्लाह खाँ को फैजाबाद जेल में फाँसी दे दी गई। राजेंद्र लाहिड़ी को इससे दो दिन पहले यानी 17 दिसंबर को गोंडा जेल में फाँसी दे दी गई थी। मन्मनाथ गुप्त उस समय 14 साल के थे। इसलिए उनकी फाँसी को उम्रकैद में बदल दिया गया। आगे चलकर उन्हें 1937 में रिहा कर दिया गया।

अपनी फाँसी से दो दिन पहले ही राम प्रसाद सिंह तोमर ‘बिस्मिल’ अपनी आत्मकथा को पूरा किया था। उनके और साथियों के साथ की गई छल को लेकर उन्होंने इस किताब में लिखा है, “दुर्भाग्यवश हमारे बीच भी एक साँप रह रहा था। वो उस शख़्स का बहुत क़रीबी दोस्त था, जिस पर मैं आँख मूँद कर विश्वास करता था। मुझे बाद में पता चला कि ये शख़्स न सिर्फ़ काकोरी टीम की गिरफ़्तारी, बल्कि पूरे संगठन को खत्म करने के लिए ज़िम्मेदार था।” हालाँकि, अपने दोस्त के प्रति आदिर दिखाते हुए बिस्मिल ने उसका नाम नहीं छापा, लेकिन प्राची गर्ग ने अपनी किताब ‘काकोरी द ट्रेन रॉबरी देट शुक द ब्रिटिश राज’ में उस शख्स का नाम बताया है। वह शख्स था बनवारी लाल भार्गव।

प्राची ने अपनी किताब में लिखा है, “बनवारी लाल भार्गव हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्य था। काकोरी ट्रेन लूट में उसकी भूमिका हथियार सप्लाई करने की थी। अंग्रेजों ने मुकदमा चलाया तो वह फाँसी से बचने और आर्थिक सहायता के एवज़ में भार्सग सरकारी गवाह बन गया।” इस तरह देश के क्रांतिवीरों ने आजादी के लिए अपने आप को न्योछावर कर दिया। हालाँकि, बिस्मिल की फाँसी के बाद उनका परिवार बेहद गरीबी और भूखमरी में तिलतिल कर मरा और पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भीमराव अंबेडकर जैसे अपने विरोधियों को साइड लगाने में लगे रहे। उन्होंने अन्य क्रांतिकारियों की कभी सुध नहीं ली, सिवाय राजनीति के।