उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण चेहरा के रूप में भाजपा में आई रीता बहुगुणा जोशी आजकल पार्टी से खिन्न चल रही हैं। वजह है उनके बेटे मयंक जोशी को यूपी विधानसभा चुनावों में पार्टी का टिकट नहीं मिलना। भाजपा से टिकट नहीं मिलने पर वह समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव से अपने बेटे के टिकट के लिए मोलभाव करने लगीं।

रीता बहुगुणा को उम्मीद थी कि अखिलेश यादव को ब्राह्मणों की जरूरत है और वे जगह-जगह परशुराम की मूर्ति लगवा रहे हैं तो उनके बेटे को भी आसानी से टिकट मिल जाएगी। हालाँकि, अखिलेश यादव भी बड़े खिलाड़ी निकले। वो रीता बहुगुणा जोशी को आगे-पीछे घूमाते रहे।

बहुत दिनों तक टाल-मटोल होती रही और उनके बेटे के नाम की घोषणा सपा से नहीं हुई। अंत में रीता ने अपने पक्ष के कुछ सपा नेताओं के जरिए लॉबिंग करने की कोशिश की, लेकिन अखिलेश यादव ने कोई खास भाव नहीं दिया। समाजवादी पार्टी का चक्कर लगाने की बात भाजपा के ही कैंट से विधायक सुरेश तिवारी ने उन पर लगाया है।

जब मयंक को सपा में जगह नहीं मिला तो रीता ने अपने बेटे के लिए समाजवादी पार्टी से टिकट हासिल करने के प्रयासों को बेबुनियाद बता दिया। अंत में भावनात्मक कार्ड खेला और कहा कि अगर भाजपा उनके बेटे को लखनऊ कैंट से टिकट देती है तो वह संसद से इस्तीफा देने को भी तैयार हैं। 

जनाधार विहीन रीता बहुगुणा जोशी साल 2016 में भाजपा में शामिल हुई थीं। तब उन्हें केंद्र में एक बहुत बड़े चेहरे के रूप में प्रोजेक्ट किया गया था। फिर 2017 के विधानसभा चुनावों में भाजपा के जीतने के बाद मीडिया के कुछ वर्ग ने उन्हें प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट किया था।

हालाँकि, प्रदेश में कैबिनेट का दर्जा देकर उन्हें सीमित कर दिया गया। उसके बाद उन्हें इलाबाहाद से सांसद के लिए चुनाव लड़वाया गया। अभी फिलहाल उनके पास को पोर्टफोलियो नहीं है और वह सिर्फ सांसद हैं। उम्र और आगे का भविष्य देखकर रीता ने अपने बेटे मयंक जोशी को राजनीति में सेट करने के लिए सारे पैंतरे अजमा लिए।

बता दें कि उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हेमवंती नंदन बहुगुणा की बेटी और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की बहन रीता बहुगुणा को उम्मीद थी कि कॉन्ग्रेस उन्हें प्रदेश में मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बनाएगी, लेकिन दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का यूपी में आगमन से वह समझ गईं कि उनका रास्ता हाईकमान ने बंद कर दिया।

इसके बाद वह सर्जिकल स्ट्राइक आदि मुद्दों पर पार्टी से अलग रुख दिखाकर बाजेपी के करीब आने की कोशिश करने लगीं। अंत वह अक्टूबर 2016 में तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के नेतृत्व में पार्टी में शामिल हो गईं। रीता को उम्मीद थी कि 2017 के चुनावों में भाजपा उन्हें मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बना सकती हैं।

मीडिया में उस वक्त उन्हें प्रदेश का ब्राह्मण चेहरा और ब्राह्मणों को लुभाने की कोशिश बताते हुए जोर-शोर से प्रचार-प्रसार भी किया गया था। कॉन्ग्रेस की डूबती नैया को देखकर भाजपा में आने वाली जोशी कभी भाजपा और मोदी-शाह की मुखर आलोचक थीं। गुजरात दंगों को लेकर भी वह कॉन्ग्रेस नेतृत्व के साथ मिलकर सवाल उठाती रही हैं।

मई 2015 में रीता बहुगुणा ने पीएम नरेंद्र मोदी पर लोगों के कल्याण के लिए पर्याप्त काम नहीं करने का आरोप लगाया था और कहा था कि लोगों पर ध्यान देने के बजाय वह 53 दिन विदेश में बिताने चले गए। उन्हने सुझाव दिया था कि पीएम मोदी को ब्रेक लेना चाहिेए और भारत के लोगों के बारे में सोचना चाहिए।

वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर भी खासा हमलावर रही हैं। रीता ने संघ को फासिस्ट विचारधारा का वाहक बताया बताया था। उन्होंने कहा था कि सत्ता हासिल करने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ देश का बँटवारा करने पर तुला है। उन्होंने यहाँ तक कह दिया था कि पीएम मोदी संघ के उसी विध्वंसक एजेंडे को आगे बढ़ा रहे हैं।

उत्तर प्रदेश के दादरी में बछिया को चुराकर उसकी हत्या कर गोमांस खाने के विरोध में हुई अखलाक की दुर्भाग्यपूर्ण हत्या में भी उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सवाल उठाया था। उस वक्त प्रदेश में प्रदेश में अखिलेश यादव की सरकार थी। यह जानते हुए भी कि कानून-व्यवस्था का मामला राज्य का मसला है, उन्होंने पीएम मोदी को घेरा था।

रीता बहुगुणा जोशी ने कहा था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दादरी मामले से अपना पल्ला नहीं झाड़ सकते। उन्होंने प्रधानमंत्री के कथनी और करनी में भी अंतर बताया था। इसके पहले वह देश के सबसे बड़े प्रदेश की चार बार मुख्यमंत्री रह चुकी दलित महिला मायावती को लेकर भी आपत्तिजनक टिप्पणी कर चुकी हैं।

साल 2009 में प्रदेश की तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती को लेकर एक आपत्तिजनक टिप्पणी में रीता बहुगुणा ने कहा था, “किसी के साथ बलात्कार हो जाता है तो मायावती 25 हजार रुपए देती हैं। एक बलात्कार और एक मर्डर पर उन्होंने एक को 25 हजार और एक को 75 हजार रुपए दिए। मैं कहती हूँ तो कह दो कि हो जाए तेरा बलात्कार तो मैं दे दूँ एक करोड़।”

इस बयान के बाद रीता बहुगुणा जोशी की चारों तरफ आलोचना होने लगी। पार्टी के ही दलित नेता उन पर ब्राह्मवादी सोच रखने का आरोप लगाने लगे। एक दलित महिला मुख्यमंत्री को लेकर इस तरह बयान देने के रीता बहुगुणा बैकफुट पर चली गईं। इसी दौरान उनके घर पर आगजनी की घटना होती है।

उन्होंने आरोप लगाया कि बसपा के तत्कालीन विधायक जितेंद्र सिंह बबलू ने उनके घर में आग लगाई है। इस घटना को गंभीर मानते हुए मायवती ने बबलू को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। तब तक रीता बहुगुणा के खिलाफ उपजा गुस्सा शांत हो गया था। आगजनी की घटना के बाद लोगों ने उनके प्रति थोड़ी सहानुभूति भी देखने को मिली।

हालाँकि, उस दौरान यह भी आरोप लगे कि उन्होंने अपने बयान को लेकर हो रही आलोचना से ध्यान मोड़ने के लिए इस घटना को खुद ही अंजाम दिलाया था। उधर बबलू का भी कहना था कि उस दिन घटनास्थल पर वह थे ही नहीं। उनके खिलाफ जोशी ने झूठा आरोप लगाया था।