उत्तर प्रदेश में चुनाव आ रहे हैं और विवाद ना हो ये तो संभव ही नहीं।  योगी आदित्यनाथ, जोकि एक सख्त और कुशल प्रशासक के रूप में अपनी छवि बना चुके हैं उन्हें एक ऐसे समुदाय से नाराजगी और गुस्से का सामना करना पड़ रहा है जो लगभग पूरी तरह उन्ही के साथ ही लामबद्ध है।

जी, हां हम बात कर रहे हैं प्रदेश के क्षत्रिय समुदाय की जिनकी जनसंख्या में प्रदेश में लगभग 9 से 10 प्रतिशत है तथा इसमें यदि कुछ अन्य राजपूत जातियों जैसे रवा राजपूत, मधि क्षेत्र के चौहान तथा किरार आदि  को भी जोड़ दिया जाये तो ये लगभग 14 प्रतिशत हो जाते हैं।

विधानसभा चुनावों से कुछ महीने पहले, ग्रेटर नोएडा के दादरी पीजी कॉलेज में एक छोटा सा प्रतिमा-अनावरण कार्यक्रम गूजर और क्षत्रिय  समुदायों के बीच एक ऐतिहासिक बहस का केंद्र बन गया है। इसने योगी आदित्यनाथ को एक नया सिरदर्द दे दिया है। क्षत्रिय समुदाय संख्याबल, धनबल और बाहुबल से सबसे सम्पन्न है।

आज भी जमीन से जुड़े होने के कारण गांव समाज में उन्हें ठाकुर साहब कहा जाता है। गाँव और इलाके में उनका प्रभाव भी होता है। चुनाव के समय ऐसे मजबूत समाज को नाराज़ करना योगी आदित्यनाथ के लिए आत्मघाती हो सकता है। पिछले विधानसभा चुनाव में लगभग 89% क्षत्रियों ने भाजपा के पक्ष में वोट किया था।

मिहिर भोज को लेकर क्या कहते हैं इतिहासकार?

क्षत्रिय इतिहास के जानकार सचिन सिंह गौड़ के अनुसार, “837 ईस्वी का बाउक पड़िहार का मंडोर का अभिलेख, 861  ईस्वी के घटियाला के 2 शिलालेख… इन सभी में प्रतिहार अपने को सूर्यवंशी क्षत्रिय बताते हैं और भगवान श्रीराम के भाई लक्ष्मण जी का वंशज बताते हैं। सम्राट मिहिरभोज की ग्वालियर प्रशस्ति के अनुसार प्रतिहार रावण को मारने वाले श्रीराम के भाई लक्ष्मण जी के वंशज है जो स्वयं श्रीराम के प्रतिहार थे।”

संस्कृत के प्रकांड विद्वान जैन समाज के कवि राजशेखर जो प्रतिहार वंश के सम्राट मिहिरभोज, महेन्द्रपाल और महिपाल के दरबारी कवि थे वो भी प्रतिहार राजपूतों को रघुकुल तिलक और रघुवंश मुक्तामणि कहा है। इसी प्रकार 813 ईस्वी के बालादित्य गुहिल में उनकी युद्ध वीरता, शौर्य-पराक्रम के साथ कला प्रेम की तुलना रघुवंशी कुकुस्थ से की गयी है।  

कुकुस्त प्रतिहार नागभट प्रतिहार प्रथम का भतीजा था, जो बाद में भीनमाल का शासक हुआ। इसी प्रकार चौहानों के शेखावाटी के हर्षनाथ मंदिर 973 ईस्वी की विग्रहराज प्रशस्ति में प्रतिहार सम्राट को चक्रवर्ती रघुवंशी कहा है।

सन 956 ईस्वी का ओसिया के महावीर मंदिर का अभिलेख वत्स राज को परिहार को श्रीराम के भाई लक्ष्मण जी का वंशज कहता है। प्रतिहारों तथा अन्य राजवंशों के सभी अभिलेख तथा साहित्यिक स्त्रोत यह स्पष्ट घोषणा करते हैं कि प्रतिहार राजपूत भगवान श्रीराम के भ्राता लक्ष्मण जी के वंशज हैं तथा सूर्यवंशी क्षत्रिय हैं। 

गौड़ आगे कहते हैं, “वर्तमान में एक षड्यंत्र के तहत प्रतिहार राजपूतों को आधुनिक इतिहासकारो ने गुर्जर लिखना शुरू किया, जबकि प्रतिहारों ने कभी भी स्वयं को गुर्जर प्रतिहार नहीं कहा है। राष्ट्रकूटों और चालुक्यों ने अवश्य प्रतिहार क्षत्रियों को अपने अभिलेखों में प्रतिहार कहा है, लेकिन उससे उनका अर्थ जाति से नहीं बल्कि स्थान से है।”

इतिहासकार के एम् मुंशी ने अपनी पुस्तक “ग्लोरीज देट गुर्जरदेश” में इस विषय का विस्तृत विवेचन किया है और यह सिद्ध किया है कि गुर्जर देश के स्वामी होने के कारण प्रतिहार राजपूतों को उनके विरोधियों ने उन्हें गुर्जर प्रतिहार कहा है। कालांतर में जब चालुक्य गुजरात के शासक बने तब उनके साथ भी गुर्जर शब्द जुड़ गया। बाद में जब तुर्क गुजरात के अधिपति बने तब उनको भी गुर्जर कहा जाने लगा।

गुजरात के सुल्तान मुज़फ़्फ़र शाह के एक शिलालेख में उनको गुर्जराधिपति बताया गया है। इसके अतिरिक्त स्कंदपुराण में गुर्जर क्षत्रियों के अलावा गुर्जर ब्राह्मण और गुर्जर वैश्य के भी उल्लेख मिलते हैं। प्रसिद्ध इतिहासकार सीवी वैद्य, महापंडित गौरीशंकर ओझा तथा दशरथ शर्मा जैसे अनेक विद्वान गुर्जर प्रतिहार का अर्थ गुर्जर देश के प्रतिहार या  स्वामी बताते हैं।

सम्राट मिहिर भोज की जाति को लेकर गरमाई सियासत

सम्राट मिहिर भोज नौवीं शताब्दी के महानतम राजा थे, जिन्होंने अपनी तलवार और सक्षम प्रशासन के बल पर इस्लामी आक्रमणकारियों को सिन्ध पार नहीं करने दिया था। उनकी प्रतिमा के अनावरण को लेकर विवाद तब शुरू हुआ जब प्रतिमा की पट्टिका पर गुर्जर सम्राट लिखा गया। गूजर समुदाय का दावा है कि सम्राट मिहिर भोज गूजर हैं, क्योंकि कुछ इतिहास की पाठ्यपुस्तकें उन्हें गुर्जर-प्रतिहार वंश से संबंधित बताती हैं।

क्षत्रिय समुदाय इससे नाराज है क्योंकि यह साबित करने के लिए पर्याप्त ऐतिहासिक साक्ष्य और सबूत हैं जो बताते हैं कि मिहिर भोज शाही प्रतिहार क्षत्रिय  वंश से संबंधित थे। इतिहास के उस दौर मे ‘गुर्जर’ शब्द हमेशा एक भूभाग (राजस्थान और गुजरात के कुछ हिस्सों)के लिये प्रयोग किया जाता था ना कि किसी जाति विशेष के लिये।

क्षत्रियों  को कॉलेज में स्थापित मूर्ति से कोई समस्या नहीं है क्योंकि सम्राट मिहिर भोज एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक व्यक्तित्व हैं; उनका गुस्सा विशेष रूप से प्रतिहार क्षत्रिय सम्राट को पट्टिका में गलती से ‘गुर्जर’ कहे जाने पर है। वे इसे अपने इतिहास के विनियोग के रूप में देखते हैं।

नाराज़गी का सबसे बड़ा कारण यह है कि योगी आदित्यनाथ, जो राजपूत युवाओं में भी बहुत लोकप्रिय हैं, ने सम्राट मिहिर भोज की मूर्ति का अनावरण किया, जिन्हें गुर्जर के रूप में चित्रित किया गया है। पिछले कुछ दशकों से यही माना जाता है कि राजपूत समुदाय अंदरूनी कलह के कारण विभाजित रहता है, परंतु इस घटना ने दिखा दिया का आज का राजपूत युवा अपने अतीत को छोड़ कर एकजुट होने को तैयार है।

राजपूत युवाओं की सामूहिक ताकत तब दिखी, जब युवाओं ने ट्वविटर जैसे सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म पर 17 सितंबर को #SaveRajputHistoryFromBJP, 19 सितंबर को #RajputsBoycottBJP और 21 सितंबर को #BJP_Against_Rajputs जैसे हैशटैग टॉप ट्रैन्ड्स मे शामिल कर दिया।

इन तीनों हैशटैग पर 3-3 लाख से अधिक ट्वीट्स किये गये। ऑनलाइन आंदोलन की सुगबुगाहट ज़मीन पर भी दिखी जब कई राजपूत संगठनों ने दादरी में शक्ति प्रदर्शन की कोशिश की। हालाँकि, स्थानीय प्रशासन ने स्थिति पर काबू पाने में कामयाबी हासिल कर ली थी।

कुछ समाचार एजेंसियों से पता चलता है कि 22 सितंबर को होने वाले आयोजन के 30 किलोमीटर के दायरे में आने वाले अधिकांश राजपूत गांवों में पुलिस ने कड़ी निगरानी रखी थी। यह भाजपा के लिए चिंता का विषय होना चाहिए, खासकर चुनावी मौसम के दौरान, जब विपक्षी दल भाजपा पर निशाना साधने के लिये भावनात्मक मुद्दों की तलाश कर रहे हैं।

विभिन्न अनुमानों के अनुसार, पश्चिमी यूपी में गूजर लगभग 2% मतदाता हैं और वे नोएडा और अविभाजित मुजफ्फरनगर जिलों में 6-8 सीटों को प्रभावित कर सकते हैं। राज्य में क्षत्रिय वोट लगभग 14% है और समान रूप से फैला हुआ है। क्षत्रिय बड़े मतदान पैटर्न पर प्रभाव डालते हैं। यही वजह है कि उन्हें राजनीतिक दलों द्वारा अधिक टिकट दी जाती हैं।

पिछले कुछ समय से देखा गया है कि अधिकांश समुदाय राजनीतिक सत्ता मे बड़ा हिस्सा पाने के लिये अपनी संख्या बढ़ा-चढ़ा कर बताते हैं। किंतु अगर हम भारत मे हुई जाति आधारित अंतिम जनगणना रिपोर्ट के हिसाब से देखें तो वास्तविक संख्या बनाम दावा की गई संख्या साफ हो जाती है। 1931 की जाति जनगणना में तत्कालीन युनाईटेड प्रॉविंसेस (अब उत्तर प्रदेश) में गूजरों की जनसंख्या 0.7% और राजपूतों की जनसंख्या 7.2% थी।

भले ही योगी आदित्यनाथ राज्य भर में एक लोकप्रिय नेता के रूप मे उभरे हैं, लेकिन भाजपा का चुनावी गणित अब भी बिगड़ सकता है। गाज़ियाबाद और सहारनपुर के बीच पश्चिमी यूपी की लगभग 120 सीटों पर राजपूत वोट भाजपा की धार को कुंद  कर सकता है।

यह योगी आदित्यनाथ के लिए विडंबना होगी कि जिन्हें केवल एक क्षत्रिय  नेता के रूप में ब्रांडेड किया जाता है और अक्सर मुख्यधारा की मीडिया उनको राजपूतों के लिए एक सॉफ्ट कॉर्नर रखने के लिये उनकी आलोचना करती है, उन्हें उसी समुदाय के आक्रोश का सामना करना पड़ रहा है। शायद इस पहलू पर मीडिया कवरेज की कमी का एकमात्र कारण यह है कि यह मुद्दा उनके लोकप्रिय नैरेटिव में फिट नहीं बैठता है।