जैसा झटका इस समय बिहार के बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव से भाजपा को लगा है, वैसा ही झटका कभी लालू प्रसाद यादव को वैशाली लोकसभा उपचुनाव के समय लगा था। ये बात है 1994 के वैशाली लोकसभा उपचुनाव की। ये वो समय था जब पूरे बिहार में (झारखण्ड समेत) लालू यादव की तूती बोलती थी। लालू यादव जो भी दांव चलते थे, उससे जीत उन्हीं की होती।

ये वो समय भी था जब लालू यादव कभी ‘भूरा बाल साफ करो’ तो कभी ‘ब्राह्मण खाय हलुआ, हरिजन खाए अलुआ… ई बर्दाश्त करे ललुआ’ जैसे नारे लगातार दे रहे थे। ऐसे समय में एक भाषण देने के दौरान उन्होंने जेनऊधारियों को लेकर आपत्तिजनक बातें कहीं। खुले तौर से कहा कि वह गरीब गुरबा और पिछड़े को समाज में सम्मान दिलाने के लिए जेनऊधारियों को हर तरह से सबक सिखाएंगे। वह जेनऊ वगैरह को कुछ नहीं मानते हैं।

बता वैशाली की है। जनता दल के सांसद शिवशरण सिंह की आकस्मिक मौत हो गई, जिसके चलते वैशाली लोकसभा सीट पर 1994 में उपचुनाव कराने की स्थिति बन गयी। ये लालू का दौर तो था ही, लेकिन ये आनंद मोहन का भी दौर था। ये वो दौर भी था जब पिछड़े वर्ग की बढ़ती गुंडई और दबंगई के सामने आनंद मोहन सवर्ण समाज की ढाल बने हुए थे। इसी समय उन्होंने बिहार पीपुल्स पार्टी (BPP) बनाई। उस दौर में इस पार्टी से समूचे बिहार के फॉरवर्ड जुड़ रहे थे।

वैशाली लोकसभा सीट पर उपचुनाव की घोषणा हुई तो लालू प्रसाद यादव की राजनीति को चुनौती देने के लिए आनंद मोहन ने बिहार पीपुल्स पार्टी के बैनर तले अपनी पत्नी लवली आनंद को चुनाव में उतारा। वहीं दूसरी तरफ पूर्व मुख्यमंत्री सत्येंद्र नारायण सिन्हा की पत्नी किशोरी सिन्हा कांग्रेस के टिकट पर भाग्य आजमा रही थीं। किशोरी सिन्हा को लालू प्रसाद यादव का आशीर्वाद मिला था।

सत्ता के नशे में मदमस्त लालू को लग रहा था किशोरी सिन्हा आसानी से जीत जाएँगी और लवली आनंद कड़ा मुकाबला नहीं दे पाएंगी। लेकिन वैशाली उपचुनाव स्थानीय मुद्दों पर लड़ा ही नहीं गया बल्कि ये चुनाव लड़ा गया लालू प्रसाद यादव के अति वर्चस्व को खत्म करने के मुद्दे पर। पूरे चुनाव प्रचार में आनंद मोहन और उनकी पत्नी व प्रत्याशी लवली आनंद सवर्णों को एक होने का आह्वान करते रहे।

चुनाव के बाद वोटों की गिनती मुजफ्फरपुर के एलएस कॉलेज में हो रही थी। उन दिनों बैलेट पेपर पर चुनाव होने के चलते परिणाम में टाइम लगता था। शाम को खबर आयी कि लवली आनंद चुनाव जीत गयीं हैं। उड़ते अबीर गुलाल के बीच आनंद मोहन जिंदाबाद’ और ‘लवली आनंद जिंदाबाद’ के नारों से पूरा इलाका गुंजायमान हो गया।

उत्साहित और आत्म विश्वास से लबरेज आनंद मोहन सिंह ने प्रेस के सामने घोषणा की कि 6 महीने बाद होने वाले चुनाव में हम मुख्यमंत्री बनने वाले हैं। ऊँची जातियों में मेसेज गया कि आनंद मोहन सिंह ही उन्हें लालू के जंगलराज से मुक्ति दिला सकते हैं। पूरे बिहार में बिहार पीपल्स पार्टी की सदस्य्ता तेजी से बढ़ने लगी।

जनवरी 1995 में बिहार विधानसभा के आम चुनाव होने थे। बिहार में आनंद मोहन की लोकप्रियता दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती जा रही थी। हालांकि इस चुनाव रिजल्ट के कुछ ही महीने बाद भूमिहारों के बड़े बाहुबली छोटन शुक्ला का मर्डर हो गया। इसके बाद उनकी शव यात्रा में गोपालगंज के डीएम जी कृष्णैया की भीड़ के हाथों हत्या हो गई। जी कृष्णैया की हत्या के लिए आनंद मोहन सिंह को जिम्मेदार माना गया कि उन्होंने भीड़ को उकसाया।

हालाँकि आनंद मोहन सदा इस बात से इंकार करते रहे। उनके अनुसार उन्होंने कोर्ट में सिद्ध कि उस दिन वो कथित जगह थे ही नहीं। इस मुक़दमे में नाम आने के बाद आनंद मोहन की राजनीतिक यात्रा गड़बड़ाती ही चली गई। कहा जाता है कि आनंद मोहन की बढ़ती लोकप्रियता लालू से बर्दाश्त नहीं हो रही थी। कहते हैं कि उनके विरोधियों ने ही उन्हें इस मुक़दमे में फंसाया था।