प्रतिहार राजवंश, जिसने भारत को अरब आक्रमणकारियों से लंबे समय तक बचाए रखा
भारत के इतिहास में कई वंश बहुत महत्वपूर्ण रहे हैं, उनके साम्राज्य बड़े विस्तृत थे और उन्होंने साहित्य का भी बहुत प्रसार किया। भारत के महान साम्राज्यों में प्रतिहार क्षत्रियों का भी एक महत्वपूर्ण और विशाल साम्राज्य रहा। प्रतिहार साम्राज्य मौर्य और गुप्त साम्राज्यों जितना विस्तृत अवश्य नहीं था लेकिन उसकी चुनौतियां इनसे कहीं बड़ी अवश्य थीं जिनका प्रतिहार वंश के महान शासकों ने कुशलता से सामना किया। उपरोक्त सभी साम्राज्यों के शत्रु एक तरफ ही थे या कम शक्तिशाली थे लेकिन प्रतिहारो के शत्रु प्रत्येक दिशा में थे। पश्चिम में अरब आक्रांताओ जैसे दुर्दांत शत्रु तो दक्षिण में राष्ट्रकूट जैसी महाप्रबल चुनौती वहीँ पूर्व में पाल थे जो निरंतर प्रतिहारो पर आक्रमण करते थे। स्वयं अरब यात्रियों ने अपने वृतांत में लिखा है कि प्रतिहारो को चारो दिशाओं में लाखो की सेनाएं रखनी पड़ती थीं। इस प्रकार यदि प्रतिहारो की शक्ति का तुलनात्मक अध्ययन किया जाये तो ये मौर्य और गुप्त साम्राज्य से अधिक सिद्ध होती है।
प्रतिहार क्षत्रियों की उत्त्पति
837 ईस्वी का बाउक पड़िहार का मंडोर का अभिलेख 861 ईस्वी के घटियाला के 2 शिलालेख सभी में प्रतिहार अपने को सूर्यवंशी क्षत्रिय बताते हैं और भगवान श्रीराम के भाई लक्ष्मण जी का वंशज बताते हैं। सम्राट मिहिरभोज की ग्वालियर प्रशस्ति के अनुसार प्रतिहार रावण को मारने वाले श्रीराम के भाई लक्ष्मण जी के वंशज है जो स्वयं श्रीराम के प्रतिहार थे। संस्कृत के प्रकांड विद्वान जैन समाज के कवी राजशेखर जो प्रतिहार वंश के सम्राट मिहिरभोज , महेन्द्रपाल , और महिपाल के दरबारी कवी थे वो भी प्रतिहार राजपूतो को रघुकुल तिलक , रघुवंश मुक्तामणि कहा है। इसी प्रकार 813 ईस्वी के बालदित्य गुहिल का अभिलेख सुमंत्र भट्ट की युद्ध वीरता , पराक्रम शौर्य के साथ कला प्रेम की तुलना रघुवंशी कुकुस्थ से की गयी है। कुकुस्त प्रतिहार नागभट प्रतिहार प्रथम का भतीजा था जो बाद में भीनमाल का शासक हुआ। इसी प्रकार चौहानो के शेखावाटी के हर्षनाथ मंदिर 973 ईस्वी की विग्रहराज प्रशस्ति में प्रतिहार सम्राट को चक्रवर्ती रघुवंशी कहा है। 956 ईस्वी का ओसिया के महावीर मंदिर का अभिलेख वत्स राज को परिहार को श्रीराम के भाई लक्ष्मण जी का वंशज कहता है। प्रतिहारो तथा अन्य राजवंशो के सभी अभिलेख तथा साहित्यिक स्त्रोत यह स्पष्ट घोषणा करते हैं कि प्रतिहार राजपूत भगवान श्रीराम के भ्राता लक्ष्मण जी के वंशज हैं तथा सूर्यवंशी क्षत्रिय हैं।
प्रतिहारो के साथ जुड़े गुर्जर शब्द की विवेचना
वर्तमान में एक षड्यंत्र के तहत प्रतिहार राजपूतो को आधुनिक इतिहासकारो ने गुर्जर लिखना शुरू किया जबकि प्रतिहारो ने कभी भी स्वयं को गुर्जर प्रतिहार नहीं कहा है। राष्ट्रकूटों और चालुक्यों ने अवश्य प्रतिहार क्षत्रियों को अपने अभिलेखों में प्रतिहार कहा है लेकिन उससे उनका अर्थ जाति से नहीं बल्कि स्थान से है। इतिहासकार के एम् मुंशी ने अपनी पुस्तक ग्लोरीज देट गुर्जरदेश में इस विषय का विस्तृत विवेचन किया है और यह सिद्ध किया है कि गुर्जर देश के स्वामी होने के कारण प्रतिहार राजपूतो को उनके विरोधियों ने उन्हें गुर्जर प्रतिहार कहा है। कालांतर में जब चालुक्य गुजरात के शासक बने तब उनके साथ भी गुर्जर शब्द जुड़ गया बाद में जब तुर्क गुजरात के अधिपति बने तब उनको भी गुर्जर कहा जाने लगा। गुजरात के सुल्तान मुज़फ़्फ़रशाह के एक शिलालेख में उनको गुर्जराधिपति बताया गया है। इसके अतिरिक्त स्कंदपुराण में गुर्जर क्षत्रियो के अलावा गुर्जर ब्राह्मण गुर्जर वैश्यों के भी उल्लेख मिलते हैं। प्रसिद्ध इतिहासकार सी वी वैद्य , महापंडित गौरीशंकर ओझा तथा दशरथ शर्मा जैसे अनेक विद्वान गुर्जर प्रतिहार का अर्थ गुर्जर देश के प्रतिहार या स्वामी करते हैं।
जहाँ तक वर्तमान गूजर जाति की बात है प्राचीन इतिहास के जानकारों के अनुसार गूजर मध्य एशिया के कॉकेशस क्षेत्र जो वर्तमान में आर्मेनिया और जॉर्जिया है से आए थे। कुछ इतिहासकार इन्हे हुन तो कुछ इन्हे कुषाण भी मानते हैं। स्वयं गुजर भी अपने आप को हुन मिहिरकुल तथा कुषाण कनिष्क दोनों से जोड़ते हैं। ऐतिहासिक अध्ययनों से गूजर जाति का स्पष्ट इतिहास नहीं पता चलता है।
(लेखक: सचिन सिंह गौड़)