महर्षि मनु द्वारा लिखित मनुस्मृति को लेकर देश में बवाल मचा हुआ है। कोई इसे दलितों-पिछड़ों के खिलाफ बता रहा है तो कभी इसे धार्मिक ग्रंथ बता रहा है। हालाँकि, यह सच है कि जब से इस सृष्टि में मानव रहना शुरू हुए थे, तब उनके सामाजिक व्यवहार को लेकर मनुस्मृति की रचना की गई थी। मनुस्मृति को हिंदू समाज में वही दर्जा प्राप्त है, जो रामचरितमानस को प्राप्त है। अर्थात, मनुस्मृति किसी धर्मग्रंथ से कम नहीं है। माना जाता है कि मनुस्मृति को 14वें मनु इन्द्रसावर्णि ने सूत्रबद्ध किया था। आज हम मनुस्मृति को लिखने वाले महाराज मनु की चर्चा करेंगे।

इस जगत में अनगित लोक और सृष्टियाँ हैं तथा उनके लिए अनगित ब्रह्मा हैं। एक बार भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण ने ब्रह्मा से कहा, “हे ब्रह्मदेव! इस जगत में केवल आप ही एक ब्रह्मा नहीं हैं। जगत में अनंत ब्रह्मांड हैं और वहाँ आप जैसे अनंत ब्रह्मदेव मौजूद हैं। इन सभी का अपना-अपना कार्य है।” इसी तरह इस सृष्टि में कई मनु हुए हैं। पुराणों में 14 मनु बारे में कहा गया है। उनके अलग-अलग कार्य रहे हैं। उनकी अवधि भी अलग-अलग रही है, जिसे मन्वंतर कहा गया है। इस तरह उनके नाम भी अलग-अलग रहे हैं। हालाँकि, अज्ञानता के कारण हम यही मानते हैं कि मनु सिर्फ एक ही हुए हैं, जो कि पूरी तरह मिथ्या है यानी जो ना सत्य है और ना ही असत्य है। ये सभी मनु किसी ना किसी तरह से एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। दैहिक और सामयिक ना सही, लेकिन आध्यात्मिक एवं मानसिक रूप से जरूर जुड़े हैं।

हिंदू धर्मग्रंथों में कहा गया है कि इस जगत में कई मनु हुए हैं। इनमें सबसे पहला मनु ‘स्वयंभू मनु’ थे। स्वयंभू का अर्थ होता है, जो स्वयं उत्पन्नन हुआ हो यानी जिसे किसी ने उत्पन्न नहीं किया हो। स्वयंभू मनु को संसार का प्रथम पुरुष माना जाता है। कहा जाता है कि ब्रह्मा ने जब सृष्टि की रचना की तो उन्हें इसके विस्तार की चिंता होने लगी। इसके बाद उन्होंने भगवान विष्णु का ध्यान किया। इसके बाद ब्रह्मा के सामने एक दिव्य ‘काया’ आकर खड़ी हो गई। भगवान विष्णु के अंश से प्रस्तुत यह दिव्य काया स्वयंभू मनु कहलाए। अब मानव जाति की उत्पत्ति के लिए एक स्त्री की जरूरत थी। तब ब्रह्मा ने अपने तपोबल से एक स्त्री को उत्पन्न किया, जिसे शतरूपा कहा गया है। इन दोनों को प्रथम पुरुष और प्रथम स्त्री माना जाता है। मनु की संतान होने से मनुष्य को मानव कहा गया है। स्वयंभू मनु को ब्रह्मा का मानस पुत्र भी कहा जाता है।

शतरूपा का जन्म आपव नामक प्रजापति के धर्म से कन्या के रूप में जन्म हुआ था। यही आपव स्वयंभू मनु कहलाए। स्वयंभू मनु और शतरूप के उनके पुत्र का नाम वीर था। वीर ने प्रजापति महर्षि कर्दम की कन्या काम्या से विवाह किया था। उनके दो पुत्र- प्रियव्रत और उत्तानपाद हुए। वहीं, कुछ शास्त्रों में स्वयंभू मनु की पाँच संतानें बताई गई हैं। दो पुत्र- प्रियव्रत और उत्तानपाद तथा पुत्री- आकूति, देवहूति और प्रसूति। कहा जाता है कि स्वयंभू मनु और शतरूपा ने इतने धार्मिक और प्रजा वत्सल थे कि भगवान विष्णु ने स्वयं आकर वरदान दिया था कि स्वयंभू मनु और शतरूपा त्रेता युग में महाराज दशरथ और महारानी कौशल्या के रूप में जन्म और वे इनके पुत्र भगवान राम के रूप में अवतरित होंगे।

स्वयंभू मनु के ज्येष्ठ पुत्र प्रियव्रत भगवान के परम भक्त थे। उन्होंने परम तत्व को जान लिया था। वे गंधमादन पर्वत पर रहकर भगवान का चिंतन करना शुरू कर दिया। ब्रह्मा के समझाने पर वे गृहस्थाश्रम में प्रवेश कर राज्य संभाला और विश्वकर्मा की पुत्री बर्हिष्मती से विवाह किया। इस शादी से उन्हें 10 पुत्र और एक पुत्री हुई। पुराणों के अनुसार, महाराजा प्रियव्रत ने ही पृथ्वी पर द्वीप बनाए, जिन्हें सप्तद्वीप कहा जाता है। इन सातों द्वीपों का शासक उन्होंने अपने एक-एक पुत्र को बना दिया और बाकी के तीन पुत्र संन्यास ले लिए।

कितने मनु हुए?

कुल 14 मनु हुए हैं। इनके काल अलग-अलग रहे हैं। स्वयंभू मनु के बाद उनके ही कुल में बाकी के सारे 13 मनु हुए। दूसरे मनु स्वरोचिष हुए। तीसरे उत्तम, चौथे तामस, पांचवें रैवत, छठे चाक्षुष, सातवें वैवस्वत मनु, आठवें सावर्णि, नौवें दक्षसावर्णि, दसवें ब्रह्मसावर्णि, ग्यारहवें धर्मसावर्णि, बारहवें रुद्रसावर्णि, तेरहवें रौच्य या देव सावर्णि और चौदहवें भौत या इन्द्रसावर्णि हुए। हालाँकि, महाभारत में 8 मनुओं का जिक्र मिलता है। वहीं, कुछ शास्त्रों में कहा गया है कि अंतिम 6 मनु अभी पृथ्वी पर आने बाकी हैं। यही 14 मन्वंतर बार-बार दोराए जाते हैं।

स्वयंभू मनु के काल में ही सप्तर्षि भी हुए। कहा जाता है कि प्रलय के समय मनु ने इन सप्तर्षियों को बचाया था। एक मनु की आयु की मन्वंतर कहा जाता है। इस तरह अभी तक कुल 14 मन्वंतर हुए हैं। हर मन्वंतर के खत्म होने के साथ ही प्रलय होती है और फिर नई सृष्टि की रचना होती है। 14 मन्वंतर को मिलाकर एक कल्प बनता है। विष्णु पुराण के अनुसार, एक मन्वंतर की अवधि 71 चतुर्युगी के बराबर होता है। 30 करोड़ 67 लाख 20 वर्ष की होती है। यह भी कहा जाता है कि वैवस्वत मनु का मन्वंतर बीत चुका है और सावर्णि मनु की अंतर्दशा चल रही है।

मनुस्मृति का अस्तित्व

माना जाता है कि मनुस्मृति बेहद प्राचीन है। पूर्व कल्प में हुए अंतिम मनु इन्द्रसावर्णि ने मनु स्मृति को संहिता बद्ध किया था। इसे मनु संहिता भी कहा जाता है। कहा जाता है कि मनु स्मृति का अवतरण श्रावण मास के कृष्ण पक्ष के अष्टमी तिथि को हुआ था। कुछ धर्म के विद्वानों का मानना है कि मनु स्मृति को स्वयंभू मनु द्वारा विरचित किया गया था। यह स्मृति परंपरा के तहत आगे बढ़ती रहती और इंद्रसावर्णि ने इसे परिष्कृत करते हुए लिपिबद्ध किया। इसे रामायाण और महाभारत से भी प्राचीन माना जाता है। महाभारत में तो मनु का बार-बार जिक्र मिलता है, लेकिन महाभारत से प्राचीन होने के बावजूद रामायण में मनु का जिक्र नहीं मिलता है। हालाँकि, यह भी कहा जाता है कि रामायण और महाभारत में कुछ श्लोक ऐसे हैं, जो मनु स्मृति से ज्यों के त्यों लिए गए हैं।

कहा जाता है कि 1932 में जापान के बम गिराने के बाद चीन के दीवार का हिस्सा टूट गया और उसमें से एक लोहे का संदूक निकला। उसमे चीनी भाषा की प्राचीन पांडुलिपियाँ पड़ी थीं। ये पांडुलिपियाँ सर ऑगस्टस रिट्ज जॉर्ज के हाथ लग गईं और इसे उन्होंने ब्रिटिश म्यूजियम में रखवा दिया। इन पांडुलिपियों को सर एंथनी ग्रेम ने चीनी भाषा के जानकारों से पढ़वाई तो उसमें मनु स्मृति का जिक्र मिला।

कहा जाता है कि उन पांडुलिपियों में लिखा था कि शीन जे वांग ने अपने शासनकाल में सभी प्राचीन पांडुलिपियों को नष्ट करने का आदेश दिया था। तब इन पांडुलिपियों को किसी ने उस समय बन रहे चीन की दीवार की नींव में रख दिया था। उसमें लिखा था कि भारत में मनु का धर्मशास्त्र सर्वाधिक अनुकरणीय है। यह ग्रंथ संस्कृत में लिखी गई है 10,000 साल से भी पुरानी है। उसमें यह भी कहा गया था कि मनु के इस धर्म शास्त्र में 680 श्लोक हैं। हालाँकि, वर्तमान में 2400 श्लोक हैं। माना जाता है कि समय काल के साथ वास्तविक मनु स्मृति में कई तरह की मिलावट की गई हैं और उनमें कई श्लोकों को जोड़ा गया है। संभवत: इन्हीं मिलावटी श्लोकों पर विवाद हो रहा है। हालाँकि, स्मृति एवं श्रवण परंपरा में इस तरह की आशंका पहले से बनी रहती है, इसके बावजूद मनुस्मृति का महत्व कम नहीं हो जाता।