साधु संतों की सबसे बड़ी संस्था अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद (Akhil Bhartiya Akhada Parishad) के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि (Narendra Giri) की मौत को लेकर सवालों के घेरे में रहे आदित्य मिश्रा (Aditya Mishra) की संदिग्ध परिस्थितियों में सड़क दुर्घटना में मौत हो गई है। शव बरेली में मिला है। मिश्रा के परिजनों का कहना है कि उसकी हत्या भी हो सकती है। 

महंत नरेंद्र गिरि और आदित्य मिश्रा (साभार: पत्रिका)

 

परिजनों का कहना है कि मिश्रा अपनी इनोवा कार से एक परिचित की बारात में प्रयागराज से देहरादून गया था। पहले उसे ट्रेन से जाना था, लेकिन बाद में उसने ट्रेन का टिकट कैंसिल कराकर रोड से जाने का  फैसला लिया। मिश्रा के साथ उसका बेटा हर्ष, एक करीबी मित्र अशोक उर्फ चच्चू पांडे, गनर पुनीत तिवारी और चच्चू पांडे का बेटा सचिन पांडे थे। इस हादसे में मिश्रा और चच्चू पांडे की मौत हो गई है, जबकि अन्य लोगों की हालत गंभीर है। 

महंत नरेंद्र गिरि ने पहले मिश्रा को प्रयागराज में लेटे हुए हनुमान मंदिर परिसर में एक दुकान दे रखी थी, लेकिन बाद में मिश्रा द्वारा पैसे में हेरफेर करने के कारण महंत उससे नाराज हो गए थे। उसके बाद महंत गिरी ने मिश्रा से लड्डू की दुकान खाली करा ली थी। महंत नरेंद्र गिरि ने पिछले साल 20 सितंबर को खुदकुशी से पहले लिखे गए सुसाइड नोट में भी मिश्रा का नाम भी लिया था और कहा था कि उन्हें मिश्रा से 20 लाख रुपए लेने थे।

लड्डु का दुकान चलाते-चलाते मिश्रा कई विभागों में ठेकेदारी करने लगा था। उसने अवैध रूप से शादियाँ भी की थीं।  इस रिश्ते को लेकर ससुराल से भी उसका विवाद चल रहा था। दुकान हटने के बाद परेड ग्राउंड में एक युवक पर हुए जानलेवा हमले में मिश्रा मुख्य आरोपी भी था। इसी मामले में उसे जेल भी हुई थी और वह लगभग दस महीने तक जेल में रहा था। 

हालांकि, महंत नरेंद्र गिरी की मौत भी उसका बाघम्बरी मठ में आना जाना लगा रहता था। सवाल यह है कि मिश्रा को कौन लोग हैं जो सहायता दे रहे थे। यह सवाल उठाया जा रहा है कि महंत की आत्महत्या में उसका नाम आया था। मामले में सीबीआई टीम ने उनसे भी पूछताछ की थी, लेकिन अज्ञात कारणों से उसे छोड़ दिया गया था। ऐसे में सवाल ये भी उठ रहे हैं कि सबूत को मिटाने के लिए तो कहीं उसकी हत्या तो नहीं कर दी गई, ताकि बड़े और प्रभावी लोगों को बचाया जा सके।

महंत नरेंद्र गिरि के प्रभाव के चलते ही बीजेपी ने उसे जिले की कमेटी में मंत्री बनाया था। वह ग्राम प्रधान का चुनाव भी लड़ चुका था और इस बार विधानसभा चुनाव में भी टिकट चाहता था, लेकिन भाजपा ने उसे टिकट नहीं दिया।