सिर्फ अपनी जाति के आरोपी को जज ने दी जमानत, हाईकोर्ट ने चेताया: कहा- न्यायपालिका पर लगेगा दाग
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट (Madhya Pradesh High Court) ने एक आपराधिक मामले में स्वजातीय होने के कारण मुख्य आरोपित को जमानत देकर पक्षपात करने को लेकर मैहर के अतिरिक्त जिला जज प्रशांत शुक्ला को चेतावनी दी है। इसके साथ जज शुक्ला की सर्विस बुक में इस चेतावनी को अंकित करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि इससे न्यायापालिका पर जातिवाद का आरोप लगेगा और उसकी छवि धूमिल होगी।
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| मध्य प्रदेश हाईकोर्ट (साभार: बार एंड बेंच) |
हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस विवेक अग्रवाल ने मैहर की अधीनस्थ अदालत में अतिरिक्त सत्र न्ययाधीश (ADJ) के पक्षपातपूर्ण और जातिवादी रवैए पर आश्चर्य व्यक्त किया। इसके साथ ही जज शुक्ला की सर्विस बुक में चेतावनी अंकित करने के निर्देश दिए हैं।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश प्रशांत शुक्ला पर आरोप है कि उन्होंने एक मामले में मुख्य आरोपित अजय मिश्रा उर्फ गुड्डू मिश्रा को जमानत दे दी, जबकि उसके पास से चोरी का माल बरामद किया गया था। वहीं, इस मामले के सह-आरोपित को उन्होंने जमानत देने से इनकार कर दिया।
मैहर निवासी इंद्रजीत पटेल ने हाईकोर्ट में दूसरी बार जमानत अर्जी पेश की थी। याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में पेश एडवोकेट उमाशंकर जायसवाल ने दलील दी। अपने दलील में उन्होंने कहा कि मैहर के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश प्रशांत शुक्ला ने 12 फरवरी 2022 को चोरी के मुख्य आरोपित अजय उर्फ गुड्डू मिश्रा की जमानत अर्जी मंजूर कर ली थी, जबकि पुलिस को उसके कब्जे से चोरी की मोटरसाइकिल मिली थी।
अपने दलील में आगे जायसवाल ने कहा कि इस मामले याचिकाककर्ता सह-आरोपित था और उसके कब्जे से कुछ भी बरामद नहीं हुआ था। फिर से उसे जमानत देने से जज शुक्ला ने इनकार कर दिया।
उन्होंने कोर्ट को यह भी बताया कि मुख्य आरोपित अजय मिश्रा के खिलाफ छह आपराधिक प्रकरण लंबित हैं, जिनमें से एक में भी उसे सजा नहीं मिली है। जबकि, याचिकाकर्ता के खिलाफ 10 मामले दर्ज हैं और उसे भी किसी मामले में सजा नहीं मिली है।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के न्यायाधीश विवेक अग्रवाल ने पाया कि जज प्रशांत शुक्ला की अदालत में अजय मिश्रा की अपेक्षा याचिकाकर्ता इंद्रजीत पटेल का मामला जमानत के लिए अधिक मजबूत था। हाईकोर्ट ने पटेल की जमानत अर्जी मंजूर कर लिया।
इस मामले में दोनों आरोपितों पर IPC की धारा 380, 401, 414, 457 और 34 लगाया गया था। याचिकाकर्ता का कहना था कि उसने निचली अदालत में जमानत के लिए याचिका दायर की थी, लेकिन इसे खारिज कर दिया गया। वहीं, जज के स्वजातीय दूसरे आरोपित को जमानत दे दी गई।