स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर इस नश्वर संसार को आज (रविवार, 6 फरवरी) को छोड़ चुकी हैं। उनके पार्थिव शरीर को पंचतत्व में भेंट कर दिया गया। इस दुखद खबर पर देश दुनिया के तमाम लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी।

लता मंगेशकर (साभार: इंडिया टुडे)

आज उनके जीवन के कुछ महत्वपूर्ण हिस्से को याद करते हैं। साल 1963 में लता जी 33 साल की थीं। उस समय तक संगीत की दुनिया की सितारा बन चुकी थीं। कहा जाता है कि इसी दौरान उन्हें धीमा जहर देकर मारने की कोशिश की गई थी।

इस में लता जी ने कभी खुद बताया था। उन्होंने बताया था कि उस दौरान उन्हें बेहद कमजोरी महसूस हो रही थी। वह बेड से उठ नहीं पाती थीं। चलना तो बहुत मुश्किल काम था। फिर वह अस्पताल में भर्ती हुईं और लगभग तीन  महीने तक वह डॉक्टर की निगरानी में रहीं। इसके बाद वह अपने नॉर्मल कार्य के योग्य हो पाई थीं। डॉक्टरों ने पुष्टि की थी कि उन्हें धीमा जहर दिया गया था। 

उन्होंने बताया था कि उनका दृढ़ निश्चय और डॉक्टरों की दवा ने उन्हें इस मुश्किल दौर से निकाला था। उन्होंने बताया कि यह वो दौर था जिसके बारे में उनका परिवार बात करना पसंद नहीं करता था।

लता जी की मानें तो इलाज के बाद वे धीरे-धीरे ठीक हुईं। वे कहती हैं, “इस बात की पुष्टि हो चुकी थी कि मुझे धीमा जहर दिया गया था। डॉक्टर्स का ट्रीटमेंट और मेरा दृढ़ संकल्प मुझे वापस ले आया। तीन महीने तक बेड पर रहने के बाद मैं फिर से रिकॉर्ड करने लायक हो गई थी।”

लता जी ने बताया था कि सामान्य जिंदगी में लौटने में मजरूह सुल्तानपुरी ने अहम भूमिका निभाई थी। वे प्रतिदिन लता जी से मिलने आते थे और अपनी कविताएँ सुनाया करते थे। अपनी व्यस्त दिनचर्या में से प्रतिदिन समय निकाल कर लता से मिलते और उनके साथ कुछ समय बिताते थे। लता जी ने कहा था कि अगर मजरूह साहब नहीं होते तो वह इस सदमे से उबर नहीं पातीं।

लता जी ने यह भी बताया था कि उन्हें जिस व्यक्ति ने जहर दिया था, उसके बारे में पता चल गया था। लेकिन उन्होंने ऐक्शन इसलिए नहीं लिया, क्योंकि उसके खिलाफ उनके पास कोई सबूत नहीं था।