जनता की श्रद्धा के अनुसार देश की राजनीति भी बदलती है। इस बार के प्रयागराज महाकुंभ 2025 ने इसे साबित कर दिया है। जो नेता और राजनीतिक दल कल तक भगवान राम और हिंदुओं पर ताना कसते थे और सेक्युलरिज्म के झंडाबरदार बनते थे, वे भी इस बार कुंभ में परिवार के साथ डुबकी लगाते हुए नजर आए। चाहे कॉन्ग्रेस के बड़े-बड़े नेता हों या समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव, सबने खुद को हिंदू दिखाने के लिए गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम पर स्नान किया और बकायदा तस्वीरें भी शेयर कीं। ये नेता भारतीय राजनीति में मुस्लिम तुष्टिकरण और धर्मनिरपेक्षता का चैंपियन कहलाते हैं। इन सबमें में ताजा मामला बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान में NDA की सरकार में कैबिनेट मंत्री जीतनराम माँझी का है। उन्होंने अपने परिवार के साथ बुधवार (19 फरवरी) को त्रिवेणी में डुबकी लगाई और तस्वीरें भी सोशल मीडिया पर साझा कीं। भगवान को काल्पनिक बताने वाले माँझी ने स्नान के बाद कहा, “भारत भक्ति और संस्कृति की भूमि है, जिसे विश्वगुरु कहा जाता था। हम फिर से विश्वगुरु बनेंगे। महाकुंभ आस्था और एकता का प्रतीक बताया।”
कुंभ में स्नान करते जीतनराम माँझी (साभार: X)

 

इस दौरान माँझी ने राजनीतिक बयान भी दिया और कहा, “कुछ लोग हमारी आस्था में बाधाएँ डालने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन करोड़ों श्रद्धालुओं की उपस्थिति यह साबित करती है कि भारतीय संस्कृति अडिग और अमर है। श्रद्धालुओं की यह आस्था दुनिया को भारत की शक्ति दिखा रही है। मैंने यहाँ आकर बहुत अच्छा महसूस किया। यह भारतीय संस्कृति का भव्य प्रतीक है।” इतना ही नहीं, उन्होंने लालू यादव और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर भी कटाक्ष किया। माँझी ने लिखा, “लिजिए भाई, हमने भी कुंभ स्नान कर लिया। अब यदि किसी को पेट में दर्द हो रहा होगा तो हम उनका कुछ नहीं कर सकते। वैसे लालू प्रसाद यादव जी एवं ममता दीदी को कुछ ज़्यादा ही समस्या होगी।”
जीतनराम माँझी महाकुंभ में स्नान करने के बाद हिंदुत्व का गुणगान कर रहे हैं। साथ में लालू यादव और ममता बनर्जी को चिढ़ा भी रहे हैं, लेकिन ये जीतनराम हैं जिन्होंने कभी हिंदू धर्म की मर्यादा को तार-तार कर दिया था। उन्होंने कॉन्ग्रेस और उनकी सर्वेसर्वा सोनिया गाँधी की तरह भगवान राम के अस्तित्व पर ही सवाल उठा दिया था। जीतनराम माँझी एक तरफ भगवान श्रीरामचंद्र के अस्तित्व पर सवाल उठा रहे थे और दूसरी तरफ दुराचारी रावण को महान बता रहे थे। उन्होंने हिंदू धर्म को ही खराब बता दिया था। अब हिंदुत्व का गुणगान कर रहे हैं। राजनीति में जनता-जनार्दन की आस्था और श्रद्धा नेताओं को मजबूर कर देती है, कि वह उसकी आस्था एवं सांस्कृतिक संस्कार का आदर करे। जीतनराम ने इसी बखुबी समझा।
साल 2021 में हिंदू धर्म का मजाक उड़ाते हुए जीतनराम माँझी ने सत्‍यनारायण पूजा पर सवाल उठाए थे। पटना में मुसर भुइयां समाज की सभा उन्होंने विवादित टिप्पणी की थी। उन्होंने गाली देते हुए कहा था, “हमलोग के टोला में भी अब हर जगह सत्यनारायण भगवान की पूजा हो रही है। और पंडित …. (अपशब्द) आते हैं और कहते हैं हम नहीं खाएँगे बाबू, नगद ही दे दीजिए। पहले गरीबों के बीच यह पूजा देखने को नहीं मिलती थी, लेकिन आजकल यह खूब हो रही है।” माँजी ने बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर का हवाला देते हुए कहा था कि साल 1956 में जीवन के अंतिम दौर में हिंदू धर्म को खराब बताया था। सत्यनारायण भगवान की पूजा को लेकर आपत्तिजनक बयान देने के बयान पर माँझी ने कहा था कि जब वे सातवीं कक्षा में पढ़ते थे तो श्रावणी पूजा के दौरान एक मंदिर में गए थे। मंदिर में उनके दोस्त अंदर चले गए, लेकिन उन्‍हें बाँह पकड़कर निकाल दिया गया। उन्होंने कहा था, “उस दिन से हम समझ गए कि देवी-देवता हमारे नहीं, सब ई लोग के हैं। उस दिन से पूजा-पाठ नहीं करते हैं।”
बात सिर्फ यही खत्म नहीं हो जाती। रामचरितमानस और भगवान राम को लेकर भी जीतनराम माँझी ने आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। माँझी ने साल 2023 में कहा था, “हम रामायण को काल्पनिक मानते हैं। अगर रामायण की बात करें तो राम से ज्यादा कर्मठ रावण थे।” उन्होंने रावण को बुद्धिजीवी और राम को काल्पनिक बता दिया था। बिहार के विधानसभा में बोलते हुए माँझी ने कहा था, “भाजपा विधायकों को बिहार विधानसभा में हनुमान चालीसा का पाठ नहीं करना चाहिए। किसने कहा कि रावण राक्षस था? मेरा मानना ​​है कि रावण बुद्धिजीवी था और राम काल्पनिक थे। रावण राम से अधिक परिश्रमी था। रामायण तुलसीदास और वाल्मीकि दोनों ने लिखी है, फिर तुलसीदास की पूजा क्यों होती है, वाल्मीकि की नहीं। मनुवादी सोच रखने वाले लोगों ने वाल्मीकि की जगह तुलसीदास को श्रेष्ठ बताया है। कई ब्राह्मण विद्वानों ने भी लिखा है कि राम काल्पनिक थे, उनकी निंदा क्यों नहीं की जाती और जब कोई दलित कहता है तो लोगों को इससे परेशानी होती है।”
माँझी का बयान उस समय आया था, जब लालू यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल के नेता चंद्रशेखर यादव ने रामचरितमानस पर सवाल उठाए थे। जनवरी 2023 में बिहार के तत्कालीन शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर ने रामचरितमानस को लेकर कहा था कि तुलसीदास का रामचरितमानस, मनुस्मृति और माधव सदाशिवराव गोलवलकर की बंच ऑफ थॉट्स जैसी किताबों ने देश में 85 प्रतिशत आबादी को पिछड़े रखने की दिशा में काम किया है। चंद्रशेखर ने यहाँ तक कह दिया था कि हिंदू ग्रंथ रामचरितमानस को मनुस्मृति की तरह जलाया जाना चाहिए, क्योंकि यह समाज में जाति विभाजन को बढ़ावा देता है। बाद में उत्तर प्रदेश के समाजवादी पार्टी के नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने रामचरितमानस को बकवास बता दिया था और उसे जलाने का आह्वान किया था। चंद्रशेखर और स्वामी प्रसाद मौर्य के बयान के बाद देश भर में बवाल हो गया था। चंद्रशेखर की राह पर ही चलते हुए जीतनराम माँझी ने हिंदू धर्म का अपमान किया तो देश भर में उनके खिलाफ प्रदर्शन हुए।
जब जेएनयू में ब्राह्मणों के लेकर आपत्तिजनकर बातें लिखी गईं तो जीतनराम माँझी ने उस मौके पर अपनी राजनीति चमकाने के लिए इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा कि मनुस्मृति में जो दलित आदिवासी के लिए कहा गया है, वही बातें जेएयू में ब्राह्मणों के लिए कही गई है। रामचरितमानस को भी एक बार लोगों को देखना चाहिए। ब्राह्मणों को लेकर माँझी ने कहा था, “भ्रम जाल में डालकर लोगों को भ्रमित किया जाता है। ठीक रास्ते पर चलने वाले व्यक्ति को कर्म से भटकाते हैं और भावनाओं में बहाकर अपने वश में करके उसे गुलाम बनाते हैं, जिस वजह से हम उन्हें वास्तविकता समझाते हैं कि रामचरितमानस अच्छा है, लेकिन उसको आँख मूंदकर नहीं मानना चाहिए। उसमें भी बहुत की बुराइयाँ हैं।”
धर्मशास्त्र को भी जाति में बाँटते हुए हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के प्रमुख जीतनराम माँझी ने कहा था कि गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती लोग मनाते हैं, लेकिन वाल्मीकि जिन्‍होंने रामायण लिखी है उनकी जयंती लोग क्यों नहीं मनाते हैं? उन्होंने कहा था, “पूछिये समाज से। तुलसीदास ब्राह्मण हैं। इसलिए उनकी जयंती मनती है और रामायण लिखने वाले वाल्मीकि महर्षि कहलाते हैं। वे शेड्यूल कास्ट के माने जाते हैं। इसलिए उनकी जयंती नहीं मनाई जाती है। ये नहीं चलेगा। ये लोग यही सिखाते हैं हम बहुजनों को कि तुम्हारा लिखने वाला रामायण महर्षि तुलसीदास है।”
जीतनराम माँझी के बयान के ये सारे बयान उस समय के हैं, जब लोकसभा चुनाव 2024 के होने थे। वे दलितों को बरगलाने के लिए हिंदू धर्म पर ही आपत्तिजनक टिप्पणी कर रहे थे। भगवान राम को गाली दे रहे थे, रावण को महान बता रहे थे, तुलसीदास को गलत बता रहे थे और रामचरितमानस एवं मनुस्मृति को जलाने की बात कर रहे थे। आज जीतनराम माँझी NDA सरकार में मंत्री हैं और महाकुंभ में स्नान करने के बाद हिंदू धर्म का गुणगान कर रहे हैं। ये सब कुछ राजनीति के लिए है। आम जनता के लिए मन में प्यार और देश की सांस्कृतिक विरासत एवं धार्मिक आस्था उनके लिए राजनीति का मोहरा बनकर रह गई है। आज वे लालू यादव और ममता बनर्जी को चिढ़ा रहे हैं, लेकिन माँझी को पहले अपने अतीत में जरूर झाँकना चाहिए कि उन्होंने हिंदू धर्म को क्या दिया है और उसे कितना नुकसान पहुँचाया है।