उत्तर-दक्षिण भारत को एकसूत्र में पिरो सकता है गोरखनाथ पीठ, योगी आदित्यनाथ के पास है फॉर्मूला
गोरक्षपीठ हमेशा से सर्वधर्म समभाव का प्रतीक एवं समाज में एकजुटता का सन्देश देता रहा है। सदियों से गोरक्षपीठ में नाथ योगियों एवं सूफी संतों की विचारधारा का भारत में एक साथ प्रचार-प्रसार हुआ। उस काल में ऐसा भी देखा गया कि कुछ नाथ संतों ने सूफी धारा को अपना लिया तो कुछ सूफी संतों ने नाथ साधना पद्धति से प्रभावित होकर नाथ धारा को अपना लिया था।
![]() |
| योगी आदित्यनाथ (साभार: जनसत्ता) |
कहने का तात्पर्य यह है कि वह ऐसा समय था, जब जाति या धर्म का भेद नहीं होता था। दो भिन्न मार्ग पर चल कर सिद्धि या मोक्ष प्राप्त करने वाली बात थी। लेकिन, कुछ मुस्लिम कट्टरपंथी लोगों के कारण समाज में यह भेद स्पष्ट नज़र आने लगा। उन कट्टरपंथी लोगों ने अपने हितों के लिए समाज के भाईचारे एवं आपसी सौहार्द को दूषित कर दिया।
गोरक्षपीठ में कालांतर से ही हर जाति, धर्म और वर्ग का व्यक्ति गोरखपंथ से जुड़ा रहा है। गोरक्षपीठ से लम्बे समय से मुस्लिम समुदाय भी जुड़ा रहा है, जिसके बारे में आज के समय में बहुत ही कम लोग जानते हैं। नाथ संप्रदाय से हर जाति, धर्म, समाज, प्रांत और वर्ग का व्यक्ति जुड़ा है। गोरक्षपीठ से जुड़कर वह सिर्फ नाथ का ही हो जाता है।
पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा भारत के विभिन प्रदेशों जैसे बंगाल तथा दक्षिण भारत के प्रांतों में भी मुसलमान जोगियों के अनेकों गाँव हैं। इन गाँवों में ऐसे मुसलमान जोगी रहते हैं, जो नाथ पंथियों की तरह गेरूआ रंग का वस्त्र पहनते हैं और हाथ में सारंगी लिए गाँव-गाँव गोपीचंद और राजा भर्तृहरि के गोरखनाथ के प्रभाव में संन्यासी हो जाने की लोक कथा के गीत गाते फिरते हैं। वे गोरखनाथ की महिमा का वर्णन करने वाले गीत सुनाते हैं।
हिंदी के प्रसिद्ध विद्वान हजारी प्रसाद द्विवेदी ने नाथ संप्रदाय पर लिखी अपनी पुस्तक में इनके बारे में जानकारी दी है। उन्होंने लिखा है कि नाथ मत को मानने वाली बहुत-सी मुस्लिम जातियाँ अपना परिचय देने से डरती हैं। देश के हर हिस्से में ऐसी जातियों का अस्तित्व है। जार्ज वेस्टन ब्रिग्स ने भी अपनी पुस्तक ‘गोरखनाथ एंड दि कनफटा योगीज’ में मुस्लिम योगियों का जिक्र किया है।
योगी आदित्यनाथ जी के गुरु ब्रह्मलीन राष्ट्रसंत महंत अवैद्यनाथ जी ने तमिलनाडु के मीनाक्षीपुरम से सामाजिक समरसता का सन्देश दिया। उन्होंने धर्मांतरण के खिलाफ आवाज उठाई तथा पिछड़ी जाति तथा अनुसूचित वर्ग के अधिकारों को सुरक्षित करते हुए ऐसे जीवंत उदाहरण प्रस्तुत किये, जिससे गोरक्षनाथ पीठ का सम्मान और पहचान न केवल उत्तर भारत अपितु दक्षिण भारत मे भी बढ़ गया।
यहाँ यह बताना जरुरी है की महंत अवैद्यनाथ जी के तमिलनाडु पहुँचने के सदियों पहले से ही दक्षिण भारत मे श्री गोरखनाथ मठ की जड़ें विद्यमान हैं। लोककथाओं में राजा भर्तृहरि बहुत प्रसिद्ध हैं, जो उज्जैन के राजा थे एवं महान सम्राट विक्रमादित्य के बड़े भाई थे। राजा भर्तृहरि संस्कृत के महान् विद्वान एवं कवि थे। वे अपना राज्य अपने भाई को सौंपकर नाथ पंथी योगी बन गए थे।
भर्तृहरि को नाथ संप्रदाय के महान योगियों में गिना जाता है। इनकी कहानियाँ बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, छत्तीसगढ़, राजस्थान में काफी लोकप्रिय हैं। छतीसगढ़ राज्य में रामायण, महाभारत, श्रीमद्भागवद्गीता की तरह ही भर्तृहरिचरित भी काफी प्रचलित है। यह कथा गाँवों में बुजुर्गों के मुख से पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानांतरित हो रही है।
राजा भर्तृहरि तमिलनाडु के महान नाथ योगी पट्टीनाथ, जिन्हें तमिल भाषा में ‘पट्टिनाथर’ कहा जाता है (स्वेथरन्यार या पट्टीनाथु चेट्टियार, पूमपुहार, तमिलनाडु के इस संत का पूर्वाश्रम नाम है) के शिष्य बन गए। अंत में कालाहस्ती मंदिर में मुक्ति (मोक्ष) को प्राप्त किया।
दक्षिण भारतीय भाषाओं में गोरखनाथ पीठ को कोरक्का सिद्धार भी कहा जाता है, (देवनागरी: गोरखखर) जो 18 सिद्धारों में से एक है और नवनाथों के बीच गोरखनाथ के नाम से भी जाना जाता है। श्री अगत्तियार उनके गुरु थे, जिनकी समाधि तमिलनाडु के नागपट्टिनम जिले के वडुकुपोइगनल्लूर में है।
एक वृत्तांत के अनुसार, उन्होंने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा कोयंबटूर के वेल्लियांगिरी पर्वत में बिताया। गोरखनाथ पीठ यानी कोराक्कर से संबंधित अन्य गर्भगृह पेरूर, तिरुचेंदूर और त्रिकोनमल्ली में हैं। कोराक्कर के कुछ सिद्ध मंदिर तथा गुफाएँ चतुरगिरि और कोल्ली पहाड़ियों में पाई जाती हैं।
अगर हम राजनीति की बात करें तो यहाँ यह बताना जरूरी है कि आने वाले समय में भाजपा तमिलनाडु में राजनीतिक रूप से तभी सफल हो सकती है, जब वे योगी आदित्यनाथ को सामने रखेंगे तथा गोरखनाथ एवं दक्षिण भारत, खासकर तमिलनाडु के ऐतिहासिक संबंधों को वर्तमान पीढ़ी के सामने रखेंगे।
तमिलनाडु एवं गोरखनाथ पीठ का सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिकता जुड़ाव को सामने लाने की जरूरत है। भाजपा को तमिलनाडु में मजबूत करने के लिए गोरखनाथ मठ सबसे बड़ी ताकत है। इसके अलावा, योगी आदित्यनाथ को तमिलनाडु में ओबीसी, एससी-एसटी उत्थान विचारधारा को पुनर्जीवित करना चाहिए, जिसे उनके गुरु महंत अवैद्यनाथ जी ने शुरू किया था।
अगर ऐसा होता है तो योगी आदित्यनाथ भारत की राजनीति का पहला ऐसा चेहरा होंगे, जिनकी सशक्त पहचान और पकड़ हिंदी भाषित राज्यों के साथ साथ दक्षिण भारत मे भी होगी। भारत के भविष्य की राजनीति में शायद सनातन के रक्षक संत के रूप में योगी आदित्यनाथ ही होंगे, जो भारत को कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक एक सूत्र मे पिरोने का महान कार्य करेंगे।
(लेखिका रीना एन सिंह सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता हैं। सामाजिक, राजनैतिक एवं अन्य मुद्दों पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लिखती रहती हैं।)