सावरकर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत के बयान के बाद देश में सियासी उबाल है। मोहन भागवत को सावरकर को बदनाम करने के प्रयास के बाद एआईएमआईएम के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने कहा था कि ऐसे ही चलता रहा तो ये लोग महात्मा गांधी की जगह सावरकर को राष्ट्रपिता बना देंगे। ओवैसी के इस बयान पर संघ ने कहा, “हमारे यहां पिता होते हैं, बनाए नहीं जाते।”
 
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अखिल भारतीय इतिहास संकलन के संगठन मंत्री बालमुकुंद ने एनबीटी से कहा कि ओवैसी को कोई भी इतिहासकार नहीं हैं, इसलिए इतिहास के विषय पर उन्हें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। उन्हें राजनीति करना है, वो राजनीति ही करें।
संघ प्रचारक ने कहा कि सावरकर जेल में लंबे वक्त तक रहे और यातनाएं सहे। इसके बाद उन्हें लगा कि जेल में रहक कुछ नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि गांधी जी ने उन्हें संदेश भेजा था। गांधी जी ने कहा था कि हर कैदी को दया याचिका देने का अधिकार है। इस आधार पर उन्हें दया याचिका देकर जेल से बाहर निकलना चाहिए और देश की आजादी के लिए सत्याग्रह करना चाहिए।

बाल मुकुंद ने कहा कि सावरकर ने सिर्फ अपनी रिहाई के लिए पत्र नहीं लिखा था, बल्कि पोर्टब्लेयर जेल में जितने कैदी थे, उन सबको रिहा करने के लिए पत्र लिखा था। उन्होंने कहा कि उस समय के इतिहासकारों और सरकारों ने उन्हें बदनाम करने की कोशिश की।

संघ प्रचारक ने कहा कि दया याचिका देना और माफी मांगना दो अलग-अलग बाते हैं। दया याचिका हर कैदी का अधिकार है। सावरकर ने उसका इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा कि सावरकर उच्च कोटि के विद्वान थे। उनकी अपनी प्लानिंग रही होगी कि वह अपने अधिकार का इस्तेमाल करें और जेल से बाहर निकले। बाहर निकल कर भी उन्होंने हिंदू महासभा के जरिए काम किया। बालमुकुंद ने कहा कि सबसे पहले किसी को भारत रत्न दिया जाना चाहिए था तो वह सावरकर थे।