डेमोग्राफी में बदलाव सुरक्षा से खिलवाड़: TISS की रिपोर्ट में भयावह भविष्य, स्थानीय लोगों के हक पर डाका
देश में डेमोग्राफी बदलाव का असर कितना भयानक होता, इसका असर झारखंड, बंगाल से लेकर महाराष्ट्र लेकर देश के तमाम राज्यों में देखने को मिलता रहता है। जिन जगहों पर डेमोग्राफी में बदलाव आता है, वहाँ कानून-व्यवस्था लेकर हर तरह की बदलाव की झलक साफ मिलती रहती है, लेकिन देश में तुष्टिकरण की राजनीति के कारण इस पर कोई भी राजनीतिक दल स्पष्ट रूप से बोलने को तैयार नहीं दिखता। इसके उलट, भाजपा सहित कुछ राजनैतिक दलों को छो ड़कर तमाम राजनैतिक दल वोट बैंक की राजनीति में और गहराई तक उतरने की कोशिश में लगे रहते हैं।
![]() |
| डेमोग्राफी में बदलाव (साभार: AI) |
हाल ही में मुंबई स्थित टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) ने एक शोध रिपोर्ट साझा की है। इसमें बताया गया है कि किस तरह बांग्लादेश और म्यामांर से आने वाले अवैध बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुस्लिमों को मुंबई में बसाया जा रहा है। इसके कारण मुंबई की सामाजिक और आर्थिक ही नहीं, बल्कि राजनीतिक स्थिति भी लगातार बदलती जा रही है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि इस बदलाव के कारण मुंबई में साल 2051 तक हिंदू आबादी घटकर 54 प्रतिशत से भी कम हो जाएगी। वहीं मुस्लिम आबादी वर्तमान में 21 प्रतिशत से बढ़कर 30 प्रतिशत से भी अधिक हो जाएगी। इन बदलावों के साथ मुंबई के कई विधानसभा क्षेत्र राजनीतिक रूप से पूरी तरह बदल जाएँगे।
देश के राजनीतिक दल अपने वादों और नारों के जरिए इन बदलावों को परोक्ष रूप से सपोर्ट ही कर रहे हैं। जिस तरह से पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुस्लिमों के घुसपैठ को अनदेखा करके सत्ता पर काबिज होती हैं, वह किसी से छुपी हुई नहीं है। इसका परिणाम ये हो रहा है कि बंगाल में जब-जब चुनाव होते हैं, वह हिंसा की आग में जलने लगता है। वहाँ घर-घर में बम बनाने के कारखाने कुटीर उद्योग का रूप ले चुके हैं।
ममता बनर्जी की ही राह पर बिहार के राष्ट्रीय जनता दल, कॉन्ग्रेस, झारखंड का झारखंड मुक्ति मोर्चा जैसे कई राजनीतिक दल चल पड़े हैं। झारखंड में संथाल परगना जैसे इलाकों में अवैध घुसपैठियों की तदाद बड़े पैमाने पर बढ़ी है, जिसके कारण वहाँ के डेमोग्राफी में ही बदलाव देखने को मिल रहा है। कई ऐसे इलाके सामने आए हैं, जहाँ गाँव में अल्पसंख्यक बन चुके हिंदुओं को प्रताड़ना का सामना करना पड़ रहा है। राज्य के 21 विधानसभा में मुस्लिमों की बढ़ती हुई ने राजनीतिक दिशा तय करने की क्षमता हासिल कर ली है।
इसी तरह महाराष्ट्र में होने जा रहे विधानसभा चुनावों में भी मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति ने एक नई धारणा पैदा कर दी है। महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों में ऑल इंडिया उलेमा बोर्ड ने कॉन्ग्रेस नेतृत्व वाले महाविकास अघाड़ी (MVA) गठबंधन को अपना समर्थ दिया है। इसके बदले में सरकार बनने पर उसने 17 मुद्दों पर वचन लिया है। इनमें वक्फ बोर्ड को 1000 करोड़ रुपए देने, आरएसएस पर प्रतिबंध लगाने, मुस्लिमों को 10% आरक्षण, राज्य पुलिस भर्ती में प्राथमिकता, राज्य में संचालित मस्जिदों के मौलानाओं और इमामों को 15,000 रुपए प्रति माह का भुगतान, पैगंबर मुहम्मद के खिलाफ टिप्पणी संबंधी कानून लागू करने माँगें शामिल हैं।
आश्चर्य की बात है कि MVA ने इस बातों को स्वीकार भी किया है। यही तुष्टिकरण की राजनीति है। TISS ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि कुछ राजनीतिक संस्थाएँ अपने वोट बैंक की राजनीति के लिए इन अवैध अप्रवासियों का इस्तेमाल कर रही हैं। अवैध रूप से आने वाले आप्रवासी मुंबई में आसानी से वोटर कार्ड पा जा रहे हैं और मतदान कर रहे हैं। जाहिर इन आप्रवासियों के बीच उलेमा बोर्ड की पहुँच होगी और वे जिधर कहेंगे, उधर ये अवैध घुसपैठिये वोट डालेंगे। इस तरह देश में शेल्टर पॉलिटिक्स को संस्थागत बना दिया गया है।
TISS की रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा गया है कि देश में घुसपैठ कराने वालों का एक जटिल नेटवर्क काम कर रहा है, जो बांग्लादेशियों एवं रोहिंग्याओं को अवैध रूप से घुसपैठ कराकर देश में उन्हें बसाने का काम कर रहा है। यह नेटवर्क देश के विभिन्न हिस्सों से लेकर बांग्लादेश तक फैला हुआ है। वोट बैंक की राजनीति के कारण इन घुसपैठियों को तुरंत जाली दस्तावेजों के ज़रिए वोटर कार्ड भी बनवा दिया जाता है और देश की लोकतांत्रिक पद्धति में हिस्सेदार बनकर राजनीतिक शक्तियाँ अर्जित करते हैं। मुंबई के 12 ऐसे विधानसभा क्षेत्रों हैं, जहाँ आप्रवासी आबादी बहुसंख्यक है और वो मतदान पैटर्न को सीधे तौर पर प्रभावित करती है।
अवैध घुसपैठिये को देश के विभिन्न हिस्सों में बसाने और उन्हें वोटर कार्ड उपलब्ध कराने का ही सिर्फ मामला नहीं है। उन्हें विभिन्न एजीओ और मजहबी संगठनों द्वारा यह भी बताया जाता है कि वोट किसे देना है और किसे नहीं देना है। पिछले दिनों खुलासा हुआ था कि राज्य में 180 एनजीओ मिलकर मुस्लिम वोटों को जुटा रही हैं, ताकि राज्य से भाजपा को बाहर किया जा सके। इसी तरह नासिक में 12 मुस्लिम युवकों के अकाउंट में 125 करोड़ रुपए ट्रांसफर कर दिए गए। हर युवक के खाते में 12-15 करोड़ भेजे गए थे। ये रकम सिराज अहमद नाम के एक लोकल व्यवसायी ने जमा कराए थे। अब पुलिस जाँच कर रही है कि ये पैसे किस उद्देश्य से जमा कराए गए थे।
इससे पहले पहले लोकसभा चुनावों में भी भाजपा के खिलाफ मतदान करने के लिए मुस्लिमों के लिए एक फतवा जारी किया गया था। इसमें उद्धव ठाकरे की शिवसेना, कॉन्ग्रेस और शरद पवार की पार्टी को वोट देने के लिए कहा गया था। मुस्लिमों को डर दिखाया गया था कि अगर मोदी सरकार फिर से सत्ता में आ गई तो मुस्लिमों के हक को मार लिया जाएगा। इसका परिणाम ये हुआ था कि मुस्लिमों ने जमकर भाजपा के खिलाफ वोट दिए थे।
लोकसभा चुनावों के दौरान शिवाजीनगर, मुम्बादेवी, बायकुला, मालेगाँव जैसे क्षेत्रों में मुस्लिमों ने 60 प्रतिशत से भी अधिक मतदान किया। इसका परिणाम भी स्पष्ट दिखा था। लोकसभा चुनावों में शरद पवार की एनसीपी ने 8, कॉन्ग्रेस ने 13 और उद्धव ठाकरे की शिवसेना ने 9 सीटें हासिल की थीं। ये सब मुस्लिमों के वोटों के बदौलत हुआ था।
अब जबकि TISS की रिपोर्ट आई है कि बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुस्लिमों की एक बड़ी आबादी मुंबई और विभिन्न जगहों पर रह रही है और चुनावी प्रक्रिया में हिस्सा भी ले रही है तो यह इस देश के सभी राजनैतिक दलों के लिए एक वार्निंग है। भविष्य में इसका सीधा असर सिर्फ कानून-व्यवस्था पर ही नहीं, बल्कि की देश की सुरक्षा एवं अखंडता पर दिखाई देगा।
राजनीतिक दलों को TISS की इस रिपोर्ट को गंभीरता से लेना चाहिए और वोट बैंक की राजनीति से दूर होकर देश में रहने वाले अवैध घुसपैठियों के खिलाफ कार्रवाई में सरकार का साथ देना चाहिए। इतना ही नहीं, इन अवैध घुसपैठियों के नेटवर्क को ध्वस्त करने में सरकार का साथ भी देना चाहिए। याद रखना चाहिए कि जब तक इनकी आबादी कम है, तभी तक ये राजनीतिक उनका इस्तेमाल वोटबैंक के रूप में कर सकेंगे, आगे चलकर इन राजनीतिक दलों का अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा।