छत्तीसगढ़ के कवर्धा में हुई साम्प्रदायिक हिंसा को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक (संघ) और भाजपा के जारी विरोध प्रदर्शन पर प्रदेश के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने पलटवार किया है। उन्होंने संघ के स्वयंसेवकों की तुलना नक्सलियों से की। बघेल ने कहा कि जैसे नक्सलियों के नेता आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और दूसरे प्रदेशों में हैं और यहां के नक्सली केवल गोली चलाने और गोली खाने का काम करते हैं। वही स्थिति संघ के कार्यकर्ताओं की भी है। 
 

भूपेश बघेल (फोटो: साभार)

उन्होंने कहा कि प्रदेश में संघ के लोगों का कोई वजूद नहीं है। जो कुछ है, वह नागपुर से है। छत्तीसगढ़ में संघ के स्वयंसेवक बंधुआ मजदूर की तरह काम करते रहे। आज भी इनकी कोई नहीं चलती। ये सब नागपुर से संचालित होते हैं।
 
मुख्यमंत्री बघेल ने कहा कि इन लोगों (संघ और भाजपा) की दो ही चीजों में मास्टरी है, एक धर्मांतरण और दूसरी सांप्रदायिकता। उन्होंने कहा कि ये लोग हर घटना को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश करते हैं, लेकिन कवर्धा मामले में ऐसा नहीं होने दिया जाएगा।

 

 

बघेल ने कहा, “अब इनके पास छत्तीसगढ़ में कोई मुद्दा रहा नहीं। ये लोग किसानों, मजदूरों, आदिवासियों, अनुसूचित जाति, व्यापार और उद्योग के बारे में बात नहीं करते। ये सिर्फ धर्मांतरण और साम्प्रदायिकता पर ही लोगों को लड़ाने का काम कर रहे हैं।”

 

उन्होंने आगे कहा, “कोरोना के कारण लंबे समय से व्यापार-कारोबार बंद था। अब जाकर खुला है। अब ये लोग दंगा भड़काकर शहर को बर्बाद करेंगे। हम ऐसा कतई नहीं होने देंगे।” बघेल ने कहा कि किसी भी घटना को हल्के में नहीं लेना है। ये छोटी सी घटना को भी बड़ा बनाना चाहते हैं।
सांप्रदायिक घटना को आम घटना बताते हुए मुख्यमंत्री ने कहा, “जब दो लोग लड़ेंगे तो हो सकता है कि दोनों भाई हों। हो सकता है कि दो जातियों या दो अलग-अलग धर्मों के लोग हों। आपस में लड़ाई-झगड़ा हो ही जाता है। हर बात को साम्प्रदायिकता का रंग नहीं देना चाहिए। हमें उस पर हमें कड़ी निगाह रखनी है।”
सावरकर को लेकर बघेल ने कहा कि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का यह दावा गलत है कि महात्मा गाँधी के कहने पर सावरकर ने अंग्रेजों से माफी मांगी थी। उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी उस समय वर्धा में थे और सावरकर सेल्युलर जेल में, फिर दोनों का संपर्क कैसे हो गया? बघेल ने कहा कि जेल में रहकर ही सावरकर ने दया याचिका लगाई और एक बार नहीं, आधा दर्जन बार।
उन्होंने बताया है कि माफी मांगकर छूटने के बाद सावरकर पूरी जिंदगी अंग्रेजों के साथ रहे। उनके खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोले। बघेल ने आरोप लगाया कि सावरकर अंग्रेजों के फूट डालो और राज करो के एजेंडे पर काम करते रहे। 1925 में जेल से बाहर आने के बाद सावरकर ने सबसे पहले दो राष्ट्र की बात की।
बघेल ने कहा, “पाकिस्तान और हिंदुस्तान की बात है सावरकर ने 1925 में कही थी। 1937 में मुस्लिम लीग ने ऐसा ही प्रस्ताव पारित किया। इन दोनों (सावरकर और मुस्लिम लीग) साम्प्रदायिक ताकतों ने देश के बंटवारे की पृष्ठभूमि तैयार की थी।”