महामुद्रा: असाध्य बीमारियों से छुटकारा देकर तन-मन को युवा बनाती है यह मुद्रा, मिलती हैं कई सिद्धियाँ
महामुद्रा को को सिद्ध कर लेने पर शरीर हमेशा 16 वर्ष के युवक की तरह युवा, सुन्दर और स्वस्थ बना रहता है। इसे करने में बाएँ पैर की एड़ी को गुदा और शिश्न के बीच भाग में स्थित किया जाता है और दाएँ को फैलाकर लंबा किया जाता है। उसके बाद लम्बे किये हुए दाएँ पैर के अँगूठे को दोनों हाथों से पकड़ना चाहिए। इस दौरान अपने सिर को घुटने से लगाने का प्रयत्न करना चाहिए। नाक के बाएँ छिद्र से साँस खींचकर कुछ देर कुम्भक करते हुए (रोक कर रखते हुए) नाक के दाहिने छिद्र से रेचक करते हुए (साँस छोड़ने के बाद कुछ देर रूक जाना) छोड़ना चाहिए।
शुरू में पाँच प्राणायाम बाईं मुद्रा से करने चाहिये, उसके बाद दाएँ पैर को मोड़कर बाएँ पैर को फैला ले चाहिए। इस दौरान भी वही क्रिया करनी चाहिये। इस दशा में दाएँ नासिका छिद्र से कुम्भक और बाएँ से रेचक करना चाहिये। जितनी देर बाएँ भाग से यह मुद्रा की थी उतनी ही देर दाएँ भाग से करनी चाहिये।
महामुद्रा के अभ्यास से शरीर की समस्त नाड़ियों की सक्रियता बढ़ जाती है, उनमें वायु का संचार हो जाता है और स्फूर्ति आ जाती है। कहा जाता है कि इसी महामुद्रा से कपिल मुनि ने सिद्धि प्राप्त की थी। इससे अहंकार, अविद्या, भय, द्वेष, मोह आदि के पंच क्लेश विकारों का शमन होता है। भगन्दर, बवासीर, संग्रहिणी, प्रमेह आदि रोग दूर होते हैं। शरीर का तेज बढ़ता है, व्यक्ति हमेशा युवा रहता है और वृद्धावस्था दूर हो जाती है।
महामुद्रा-साधना के लाभ:
शिव संहिता में कहा गया है कि महामुद्रा करने से शारीरिक लाभ के साथ-साथ आध्यात्मिक लाभ की भी प्राप्ति होती है। शारीरिक लाभ में इस मुद्रा के करने से कई रोगों का नाश हो जाता है, जिनमें क्षय रोग, बवासीर, प्लीहा, अपच, कुष्ठ रोग, मलावरोध आदि प्रमुख हैं। इससे शरीर के समस्त नाड़ियाँ गतिमान हो जाती हैं और में नई ऊर्जा के साथ-साथ स्फूर्ति का संचार होने लगता है। इस क्रिया के करने से शरीर में वीर्य की स्थिरता बढ़ती है, जिससे शरीर तेजोमय बन दमकने लगता है। वहीं, आध्यात्मिक रूप में इससे भाग्यहीन लोगों को भी सिद्धि की प्राप्ति होती है। जीवन के समस्त कष्टों का निवारण होता है और भाग्योदय होता है।
1. इससे कुण्डली जागृत करने में मदद मिलती है।
2. अविद्या, भय, राग, द्वेष, अहंकार जैसे विकारों का नाश होता है।
3. द्विपुटाश्रया इड़ा-पिंगला नाड़ी की मरणावस्था आ जाती है (अर्थात सुषुम्णा नाड़ी में प्राण-प्रवेश करता है)।
4. इससे शरीर का विष भी अमृत बन जाता है।
7. क्षय, कुष्ठ, गुदावर्त जैसे रोगों का नाश होता है।
8. महान् सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।

