उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की राह पर अब अरुणाचल प्रदेश भी बढ़ चुका है। अरुणाचल सरकार ने सन 1978 में ‘जबरन’ धर्मांतरण के खिलाफ़ बने अधिनियम को 46 साल बाद इसे लागू करने जा रही है। इसके क्रियान्वयन के लिए सरकार नियम बना रही है। यह अधिनियम उस समय बना था, यह अरुणाचल प्रदेश पूर्ण राज्य नहीं बना था। उस समय यह केंद्र शासित प्रदेश था। इसकी पहली विधानसभा में इस कानून को पास किया गया था। हालाँकि, इस कानून को लेकर उस समय विवाद हो गया था। तब से यह ठंडे बस्ते में पड़ा हुआ है।

 

अरुणाचल प्रदेश (साभार: जीके टुडे)

 

20 जनवरी 1972 को इसे केंद्रशासित प्रदेश बनाया गया था और इसका नाम अरुणाचल प्रदेश रखा गया था। इससे पहले यह नॉर्थ-ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी (NEFA) के रूप में जाना जाता था। इसे अरुणाचल प्रदेश राज्य अधिनियम 1986 द्वारा राज्य का दर्जा प्रदान किया गया और आखिरकार 1987 में असम से अलग एक पूर्ण राज्य के रूप में इसका गठन कर दिया गया। चीन और भूटान से सीमा लगने वाले इस राज्य में मुख्यत: जनजातीय समुदाय के लोग रहते हैं। इनमें मोनपा, मेम्बा, खंबा, निशि, अपतानी,खम्पति, नोक्टे, सिंगफोस, शेरडुकपेन, आका आदि जनजाति प्रमुख हैं। जनजातीय समुदाय में तेजी से हो रहे धर्मांतरण के कारण तत्कालीन सरकार ने धर्मांतरण विरोधी यह कानून आज से 46 साल पहले लाया था।
क्या कहता है यह कानून?
धर्मांतरण विरोधी इस कानून में बल प्रयोग या प्रलोभन या धोखाधड़ी के माध्यम से धर्म परिवर्तन पर रोक का प्रावधान किया गया है। इस तरह के आपराधिक प्रयास के लिए दो साल तक की कैद और 10,000 रुपए तक के जुर्माने का प्रावधान किया गया है। इस अधिनियम में यह भी कहा गया है कि धर्म परिवर्तन कराने से पहले इसकी सूचना संबंधित जिले के उपायुक्त को देनी होगी। इसकी सूचना नहीं देने पर धर्म परिवर्तन कराने वाले व्यक्ति को भी सजा दी जा सकती है।
इस अधिनियम में ‘धार्मिक आस्था’ में स्थानीय स्तर पर प्रचलित मान्यता, विश्वास, आस्था अनुष्ठान, रीति-रिवाज, संस्कृति आदि को शामिल किया गया है। इस परिभाषा में मोनपा, मेम्बा, शेरडुकपेन, खंबा, खम्पति और सिंगफोस के बीच प्रचलित बौद्ध धर्म, राज्य के कुछ समुदायों के बीच प्रचलित डोनी-पोलो की पूजा सहित प्रकृति पूजा तथा नोक्टेस एवं आका में प्रचलित वैष्णव धर्म शामिल हैं।
इस कानून की क्यों पड़ी जरूरत?
अरुणाचल प्रदेश में कई धर्म एवं संप्रदाय को लोग हैं, जो अलग-अलग धर्म एवं संस्कृति को मानते हैं। जैसे कि वहाँ बौद्ध मानने वाले लोगों का संप्रदाय भी अलग-अलग है और उनकी पूजा पद्धति भी अलग है। तिब्बत और भूटान की सीमा से लगे पश्चिमी अरुणाचल प्रदेश के मोनपा और शेरदुकपेन समुदाय के लोग बौद्ध धर्म के महायान प्रथा का पालन करते हैं। वहीं, पूर्वी अरुणाचल में खम्पति और सिंगफोस समुदाय को लोग थेरवाद बौद्ध धर्म का पालन करते हैं। इसके अलावा, बहुत ही जनजातियाँ अलग-अलग पूजा पद्धति अपनाती हैं। कई जनजातियाँ बहुदेववादी प्रकृति और अपने पूर्वजों की पूजा करती हैं। इनमें डोनी पोलो की पूजा तानी जनजातीय समाज द्वारा की जाती हैं। इनमें न्याशी, आदिस, अपाटानी, गालोस, मिसिंग और टैगिन्स आदि भी शामिल हैं।
इन स्थानीय जनजातीय समाज पर नजर ईसाई मिशनरियों की लंबे समय तक रही है। साल 1950 तक यहाँ ईसाई मिशनरी सक्रिय नहीं हो पाए थे। इसके पीछे औपनिवेशिक भारत में सीमांत क्षेत्रों को लेकर अंग्रेजों की कुछ प्रतिबद्धताएँ थीं। यहाँ इनर लाइन सिस्टम था, जिसमें बाहरी लोगों के प्रवेश पर प्रतिबंध था। इनमें ईसाई मिशनरियों के प्रवेश भी शामिल थे। 15 अगस्त 1947 को जब भारत आजाद हुआ तो इसकी भौगोलिक स्थिति को देखते हुए भारत सरकार ने भी यहाँ पर इनर लाइन सिस्टम को जारी रखा।
चूँकि अरुणाचल प्रदेश 1972 से पहले असम का ही हिस्सा था तो असम के तलहटी क्षेत्रों में ईसाई मिशनरी ने अपने पाँव पसारने शुरू कर दिए थे। 1950 के दशक में मिशनरियों ने तत्कालीन उत्तर पूर्व सीमांत एजेंसी में पैठ बनाई और स्थानीय लोगों का धर्मांतरण करना शुरू कर दिया। आज के अरुणाचल प्रदेश के क्षेत्र में पहला चर्च साल 1957 में बना था। यह असम के धेमाजी जिले के पास था, जो वर्तमान में पूर्वी सियांग जिले के रायंग गाँव में स्थित है। इन इलाकों में ईसाई मिशनरियों ने अपने शिकंजे कसने शुरू कर दिए और ईसाइयों की जनसंख्या इन इलाकों में तेजी से बढ़ने लगी।
उत्तर पूर्वी राज्यों में अलग-अलग जनजातीय समाज की आबादी अधिक होने के कारण सन 1963 में असम (उस समय अरुणाचल उसी का हिस्सा था) के राज्यपाल के सलाहकार ने सभी पॉलिटिकल ऑफिसर (अब डिप्टी कमिश्नर) को पत्र लिखकर धर्म के संबंध में प्रशासन की सामान्य नीति की रूपरेखा बताई। इसमें कहा गया था कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक राज्य है, इसलिए सरकार के अधिकारियों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने अधिकार क्षेत्र में संबंधित धार्म को लेकर पूरी तरह से तटस्थ रहेंगे। ईसाई मिशनरियों की बेचैनी को इंगित करते हुए पत्र में कहा गया था कि किसी भी धर्म के प्रचारकों की गतिविधियाँ विभिन्न कारणों से NEFA में अवांछनीय हैं। यानी की ईसाई मिशनरियों को पर विशेष निगरानी रखने के लिए कहा गया था।
सभी राजनीतिक अधिकारियों (अब DC) को निर्देश दिया गया था कि धार्मिक संस्थान के निर्माण के लिए भूमि स्थानीय प्रशासन की पूर्व स्वीकृति के साथ ही दी जानी चाहिए। इसमें यह भी निर्देश दिया गया था कि प्रशासन की विशिष्ट अनुमति के बिना किसी भी नए धार्मिक गतिविधि केंद्र को शुरू करने या नए गाँवों में ऐसी गतिविधि की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
एजेंसी परिषद ने भारत सरकार से क्षेत्रों की विभिन्न जनजातियों के स्वदेशी विश्वासों की रक्षा और संवर्धन के लिए उपयुक्त कदम उठाने का आग्रह किया। इस आशय का एक प्रस्ताव 1969 में पारित किया गया था। इस बीच साल 1971 में हुई की जनगणना के आँकड़े सामने आए तो स्थानीय लोगों में बैचेनी बढ़ गई। प्रदेश में ईसाइयों की जनसंख्या में 0.79% की वृद्धि दर्ज की गई थी। इसके बाद स्थानीय जनजातीय समूह की संस्कृति बचाने की मुहिम और तेज हो गई।
अक्टूबर 1972 में प्रदेश परिषद ने एक और प्रस्ताव पारित किया। इसमें कहा गया, “अरुणाचल प्रदेश के किसी भी स्वदेशी जनजातीय समुदाय से संबंधित कोई व्यक्ति जो पारंपरिक विश्वास और/या धर्मों को त्याग देता है, उसे उस समुदाय या जनजाति को त्यागने वाला माना जाएगा और उसे उस जनजाति/समुदाय का सदस्य होने के कारण मिलने वाली सभी सुविधाओं, लाभों, फायदों, लाभों से वंचित कर दिया जाएगा”।
इसी तरह सन 1976 में पासीघाट में आयोजित अरुणाचल प्रदेश विकास सह सांस्कृतिक सम्मेलन ने इसी तरह का प्रस्ताव पारित किया था। इसमें अरुणाचल प्रदेश सरकार से विभिन्न जनजातियों की स्वदेशी आस्था और संस्कृति की रक्षा के लिए तत्काल कदम उठाने का अनुरोध किया गया था। इसके दो साल बाद प्रदेश में विधानसभा के चुनाव हुए। 1978 में अरुणाचल प्रदेश की पहली निर्वाचित विधानसभा ने सर्वसम्मति से एक निजी सदस्य के प्रस्ताव को स्वीकार किया। यह प्रस्ताव विधायक एकेन लेगो द्वारा पेश किया गया था, जिसमें सरकार से साल 1972 में तत्कालीन प्रदेश परिषद द्वारा पारित प्रस्ताव के आधार पर तत्काल विधायी उपाय करने का आग्रह किया गया था। इसके बाद 19 मई 1978 को ‘अरुणाचल प्रदेश धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम’ (APFRA) 1978 को पास किया गया। हालाँकि, कानून तो पास कर लिया गया, लेकिन इसका कोई नियम नहीं तय किया गया।
क्यों अभी तक लागू नहीं हुआ?
अरुणाचल प्रदेश विधानसभा ने 19 मई 1978 को ‘अरुणाचल प्रदेश धर्म की स्वतंत्रता विधेयक’ पारित किया। इस विधेयक को मंजूरी के लिए अरुणाचल प्रदेश के तत्कालीन उपराज्यपाल के.ए.ए. राजा के पास स्वीकृति के लिए भेजा गया। ईसाई संगठनों ने इस जमकर विरोध किया। अरुणाचल प्रदेश से तत्कालीन ईसाई सांसद बाकिन पर्टिन ने इसका जमकर विरोध किया था। ईसाइयों की बड़ी आबादी वाले नागालैंड विधानसभा ने भी इस अधिनियम के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया था। इस विरोध को देखते हुए भारत के राष्ट्रपति ने इसे अपने पास विचारार्थ सुरक्षित रख लिया। हालाँकि, उन्होंने 25 अक्टूबर 1978 को इसकी स्वीकृति दे दी। अब यह कानून बन गया, जो पूरे क्षेत्र पर लागू होता है। चूँकि सरकार ने इस अधिनियम के प्रावधानों को लागू करने के लिए कोई नियम नहीं बनाए थे, इसलिए यह ‘कोमा’ की स्थिति में रहा।
उधर इस कानून के विरोध में एक साल बाद ‘अरुणाचल क्रिश्चियन फोरम’ का गठन किया गया। इसे ईसाई विरोधी बताते हुए आंदोलन शुरू कर दिया गया। फोरम का तर्क था कि इस कानून की आड़ में जिला प्रशासन या पुलिस द्वारा दुरुपयोग किया जा सकता है। ईसाई आबादी और उनके संगठनों के दबाव की राजनीति के बीच तुष्टिकरण की राजनीति में डूबे इस देश में किसी भी राजनीतिक दल ने इसे लागू करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया।
क्यों लागू करना चाह रही है सरकार
आज अरुणाचल प्रदेश में ईसाई आबादी बढ़कर राज्य की कुल जनसंख्या का लगभग 30.26 प्रतिशत हो चुकी है। यह आँकड़े साल 2011 की जनगणना पर आधारित हैं। ईसाई अब अरुणाचल प्रदेश का सबसे बड़ा धार्मिक समूह है। इसी जनगणना में हिंदू धर्म को 29.04 प्रतिशत आबादी के साथ राज्य में दूसरे स्थान पर बताया गया है। वहीं, जनजातीय के रूप में ‘अन्य धर्म’ की आबादी 26.2 प्रतिशत और ‘बौद्ध’ धर्म की आबादी 11.77 प्रतिशत दर्ज की गई थी। साल 1971 की आबादी में अन्य धर्म की आबादी 63.5 प्रतिशत थी, जिनमें से अधिकांश अब अपने आपको सनातन से जुड़ा पाते हैं और खुद को हिंदू के रूप में पेश कर रहे हैं।
साल 1971 की जनगणना ईसाइयों की जनसंख्या में 0.79% की वृद्धि दर्ज की गई थी। साल 1981 की जनगणना में तो यह आँकड़े भयानक रूप ले चुके थे। उस जनगणना में इन क्षेत्रों में ईसाइयों की जनसंख्या में 4.32 प्रतिशत की जबरदस्त तेजी देखी गई। इसके बाद स्थानीय रीति-रिवाजों पर मंडराते खतरे को देखते हुए लोगों के कान खड़े हो गए। जिस दर से धर्मांतरण हो रहा है, उससे हालात बुरे होते जा रहे हैं। कुछ जिलों में ईसाई धर्मांतरण लगभग 90 प्रतिशत तक हो चुका है। ईसाई में धर्मांतरित हुए लोग अपनी पारंपरिक प्रथाओं की बुराई कह रहे हैं और ‘विदेशी’ बता रहे हैं। इससे अपनी संस्कृति से प्यार करने वाले लोगों में एक अनजाना भय व्याप्त हो गया है। वे अपनी संस्कृति एवं प्रथाओं को बचाने के लिए अंतिम विकल्प के रूप में न्यायाल की शरण ली।
साल 2022 में अरुणाचल प्रदेश के स्वदेशी आस्था और सांस्कृतिक समाज (IFCSAP) के पूर्व महासचिव और अधिवक्ता टैम्बो तामिन ने गुवाहाटी उच्च न्यायालय की ईटानगर पीठ में एक जनहित याचिका दायर की थी। अपनी याचिका में टैम्बो ने राज्य सरकार द्वारा अधिनियम के लिए नियम बनाने में विफलता रहने का आरोप लगाते हुए अदालत से हस्तक्षेप करने की अपील की गई थी। इसके बाद 30 सितंबर 2024 को अरुणाचल प्रदेश के महाधिवक्ता ने अदालत को बताया कि मसौदा नियम तैयार किए गए हैं और उन्हें अंतिम रूप देने में छह महीने और लगेंगे। इसके बाद अदालत ने यह कहते हुए याचिका बंद कर दी कि “हम उम्मीद करते हैं कि संबंधित अधिकारी अपने दायित्वों के प्रति सचेत रहेंगे और मसौदा नियमों को आज से छह महीने की अवधि के भीतर अंतिम रूप दिया जाएगा।”