हिन्दू धर्म में ऐसे कई प्रभावशाली मंत्र हैं, जिनके जाप से व्यक्ति को न केवल सुख-समृद्धि प्राप्त होती है, बल्कि मरणोपरांत मोक्ष की प्राप्ति भी होती है। इनमें गायत्री मंत्र और महा-मृत्युंजय मंत्र का विशेष महत्व है। इसके अलावा, एक अन्य मंत्र का उल्लेख धार्मिक ग्रंथों में निहित है, जो गायत्री मंत्र और महा-मृत्युंजय मंत्र के संयोग से बना है। इस मंत्र के जाप से मृत व्यक्ति को भी जीवित किया जा सकता है। इस मंत्र का नाम मृत संजीवनी मंत्र है, जिसके जाप से कालांतर में कई दानवों को पुनः जीवित किया गया था।
महा-मृत्युंजय मन्त्र साधना और मृत संजीवनी मन्त्र साधना दोनों अलग-अलग साधनाएं है। महा-मृत्युंजय मन्त्र साधना में जीवित मनुष्य की मृत्यु को रोकने या टालने का प्रयास किया जाता है, जबकि मृत संजीवनी मन्त्र साधना में मृत शरीर को पुनर्जीवित किया जाता है। ये दोनों ही साधनायें अत्यंत दुष्कर हैं, किन्तु असंभव नहीं।
महा मृत्युंजय मन्त्र साधना से शरीर पहले अजर बनता है अर्थात जरावस्था से मुक्त होता है और फिर अमर यानी मृत्यु को जीत लेता है। महा-मृत्युंजय मन्त्र की साधना से अजर बनने में कई वर्ष लग सकते हैं और अमर बनना तो बहुत लम्बी प्रकिया है। अत: जिस व्यक्ति के अन्दर संस्कृत के इस कठिन मन्त्र को पूरी शुद्धतापूर्वक और पूरे विधि विधान पूर्वक जप सकने की क्षमता और धैर्य हो सिर्फ उसे ही इस साधना को करना चाहिए, अन्यथा नहीं करना चाहिए।
रावण ने भी मृत्यु को जीता था और अमृत को अपने नाभि में धारण किया था। दरअसल नाभि में ही एक बेहद सूक्ष्म कोटर में हर व्यक्ति का मुख्य प्राण रहता है और जब उसकी मृत्यु होती है तो यही प्राण शरीर में स्थित 5 प्रत्यक्ष या 1 अप्रत्यक्ष रास्ते से बाहर निकल जाता है।
जो साधक अमरत्व की साधना में सफलता प्राप्त कर लेता है, उसकी नाभि में स्थित प्राण अपने चारों ओर स्थित अमृत के कुंड में डूब जाता है। इसका परिणाम यह होता है कि ऐसी स्थिति को प्राप्त हुआ साधक तब तक मर नहीं सकता या बूढ़ा नहीं हो सकता, जब तक कि वह अमृत कुंड सूख नहीं जाता।
इससे अलग मृत संजीवनी साधना में कई यौगिक, मान्त्रिक और भौतिक प्रक्रियाएं शामिल होती हैं। कहा जाता है कि इस साधना के लिए 6 अति दिव्य औषधियों का मिश्रण लेकर पारे के साथ विशेष पात्र में पकाना पड़ता है। इन 6 औषधियों में से सिर्फ एक ही औषधि (जिसे सोम कहते हैं) आज पृथ्वी पर हिमालय के क्षेत्र में उपलब्ध है, बाकी 5 औषधियाँ उच्च लोकों (स्वर्गादि लोकों) में ही मिलती हैं।
इस विद्या की प्रक्रिया के अनुसार, इन औषधियों को पारे के साथ पकाने पर स्वर्णिम आभा लिए हुए एक अग्नि के समान दहकता हुआ महादिव्य पेय तैयार होता है। इसी दिव्य तरल को मरे हुए शरीर में डाला जाता है और जो डालता है उसे कुछ घंटे तक अपनी सांस रोक कर प्राणायाम की कुम्भक की स्थिति में बैठना पड़ता है, जब तक की ये तरल मरे हुए शरीर के सभी कोशों का फिर से निर्माण न कर दे।
मृत संजीवनी मंत्र:
“ऊँ हौं जूं स: ऊँ भूर्भुव: स्व: ऊँ त्र्यंबकंयजामहे
ऊँ तत्सर्वितुर्वरेण्यं ऊँ सुगन्धिंपुष्टिवर्धनम
ऊँ भर्गोदेवस्य धीमहि ऊँ उर्वारूकमिव बंधनान
ऊँ धियो योन: प्रचोदयात ऊँ मृत्योर्मुक्षीय मामृतात
ऊँ स्व: ऊँ भुव: ऊँ भू: ऊँ स: ऊँ जूं ऊँ हौं ऊँ”
मृत संजीवनी मंत्र साधना में मृत संजीवनी यन्त्र का प्रयोग किया जाता है और प्रतिदिन इसकी विधिवत पूजा की जाती है। इसके बाद मंत्र जप होता है। मृत संजीवनी मंत्र के साधक इसे स्वतंत्र रूप से भी मृत्यु के समीप पहुँच रहे व्यक्ति के लिए बनाते हैं और अभिमंत्रित कर धारण कराते हैं। ऐसे व्यक्ति को धारण कराने से दो तरह की क्रिया होती है। एक तो उसकी प्राण शक्ति बढ़ जाती है गायत्री के प्रभाव से और दूसरे आसन्न मृत्यु को टाला जा सकता है महामृत्युंजय भगवान् शिव के प्रभाव से। अतः जब भी किसी की मृत्यु की आशंका समीप हो उसे मृत संजीवनी यन्त्र कम से कम 21,000 मन्त्रों से अभिमंत्रित करके धारण कराना चाहिए।
मृत संजीवनी मंत्र साधना:
महामृत्युंजय मंत्र में जहां हिंदू धर्म के सभी 33 देवताओं (8 वसु, 11 रूद्र, 12 आदित्य, 1 प्रजापति तथा 1 वषट तथा ऊँ) की शक्तियां शामिल हैं वहीं गायत्री मंत्र प्राण ऊर्जा तथा आत्मशक्ति को चमत्कारिक रूप से बढ़ाने वाला मंत्र है। विधिवत रूप से संजीवनी मंत्र की साधना करने से इन दोनों मंत्रों के संयुक्त प्रभाव से व्यक्ति में कुछ ही समय में विलक्षण शक्तियां उत्पन्न हो जाती है। यदि वह नियमित रूप से इस मंत्र का जाप करता रहे तो उसे अष्ट सिदि्धयां, नव निधियां मिलती हैं तथा मृत्यु के बाद उसका मोक्ष हो जाता है।
पूजा की विधि:
श्री मृत संजीवनी पूजा का आरंभ सामान्यतया सोमवार वाले दिन किया जाता है तथा उससे अगले सोमवार को इस पूजा का समापन कर दिया जाता है जिसके चलते इस पूजा को पूरा करने के लिए सामान्यता 7 दिन लगते हैं किन्तु कुछ स्थितियों में यह पूजा 7 से 10 दिन तक भी ले सकती है जिसके चलते सामान्यतया इस पूजा के आरंभ के दिन को बदल दिया जाता है तथा इसके समापन का दिन सामान्यतया सोमवार ही रखा जाता है।
संजीवनी मंत्र के जाप में ध्यान रखें:
(1) सोमवार की सुबह भगवान शिव की पूजा-अर्चना फिर इस मंत्र का 108 बार जाप करें।
(2) जपकाल के दौरान पूर्ण रूप से सात्विक जीवन जिएं।
(3) पूर्ण शारीरिक व मानसिक ब्रह्मचर्य का पालन करें।
(4) सरसों तेल, साबुन-शैम्पू, पेस्ट का मंजन न करें।
(5) मंत्र के दौरान साधक का मुंह पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए।
(6) इस मंत्र का जाप शिवमंदिर में या किसी शांत एकांत जगह पर रूद्राक्ष की माला से ही करना चाहिए।
(7) मंत्र का उच्चारण बिल्कुल शुद्ध और सही होना चाहिए, साथ ही मंत्र की आवाज होठों से बाहर नहीं आनी चाहिए।
(8) जपकाल के दौरान व्यक्ति को मांस, शराब, सेक्स तथा अन्य सभी तामसिक चीजों से दूर रहना चाहिए।
(9) जिसके लिए किया जा रहा जप या तो उसका भोजन हो अथवा खुद के घर का ही भोजन हो। किसी अन्य के घर का भोजन अथवा अन्न ग्रहण न करें।
(10) मृतक अथवा जन्म सूतक से बचाव करें। अस्पताल आदि जाने से बचें जहाँ जन्म-मृत्यु होती हो।
क्यों नहीं करना चाहिए महामृत्युंजय गायत्री (संजीवनी) मंत्र का जाप:
मृत संजीवनी मंत्र का जप और इसका अनुष्ठान हर कोई नहीं कर सकता। इसे वही व्यक्ति कर सकता है जिसे दीक्षा के बाद गुरु द्वारा इसे दिया गया हो अथवा ऐसा ब्राह्मण, जिसने गायत्री और महामृत्युंजय दोनों ही मन्त्रों के कम से कम 5 -5 लाख जप कर लिए हों। ऐसा व्यक्ति गुरु से अनुमति मिलने पर ही इस अनुष्ठान को कर सकता है।
इसका किसी पर प्रयोग करने से पूर्व अथवा इसके यन्त्र निर्माण और प्रतिष्ठा के पूर्व साधक को कम से कम इसका सवा लाख का एक पुरश्चरण करना आवश्यक होता है, तभी वह यन्त्र में शक्ति ला पाता है। बिन किसी पुरश्चरण के सीधे बनाया और अभिमंत्रित किया गया यन्त्र, किसी की जान बचाने के बजाय जान ले भी सकता है। पुरश्चरण अथवा मन्त्र जप में हुई त्रुटी महाक्षति करती है।
गायत्री को सौम्य शक्ति कहा जाता है, किन्तु वास्तव में यह सौम्य नहीं समग्र शक्ति है, जिससे हर उद्देश्य पूर्ण होते हैं। यही सावित्री भी है और महाकाली भी है। एक तो इनकी शक्ति उपर से महाकाल मृत्युंजय की शक्ति जब एक साथ संयुक्त हो तो उस ऊर्जा का अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता।
आध्यात्म विज्ञान के अनुसार मृत संजीवनी मंत्र के जाप से व्यक्ति में बहुत अधिक मात्रा में ऊर्जा पैदा होती है, जिसे हर व्यक्ति सहन नहीं कर सकता। यदि इसका पूर्ण नाद और स्वर से जप किया जाय तो आदमी कुछ सौ जाप करने में ही पागल हो जाता है या तो उसकी मृत्यु हो जाती है। इसके साथ कुछ विशेष प्राणायाम और अन्य यौगिक क्रियाएं भी सिखनी होती है ताकि मंत्र से पैदा हुई असीम ऊर्जा को संभाला जा सके। इन्ही कारणों से इसे सामान्य लोगों और यहाँ तक की अच्छे से अच्छे साधक को भी करने से मना किया जाता है।