राजीव दीक्षित एक ऐसा नाम है, जिसे राष्ट्रवाद की बात करने वाला हर शख्स जानता होगा। उन्होंने सनातन, संस्कृति एवं उससे जुड़े आयुर्वेद को लेकर देश-विदेश में ऐसी अलख जगाई कि लोग उनकी उनकी मौत के बाद भी उन्हें नहीं भूले हैं। वे विदेशी कंपनियों के खिलाफ मुहिम चलाने वाले सबसे पहले एवं प्रमुख लोगों में से एक थे। हालाँकि उनकी मौत को लेकर तमाम अटकलें लगाए जाते हैं, लेकिन उनके साथ वास्तव में क्या हुआ था, यह सच्चाई आज तक बाहर नहीं आ पाई।  30 नवंबर 2010 को राजीव दीक्षित की रहस्यमयी परिस्थितियों में मौत हो गई थी। कहा जाता है कि उनके शव का पोस्टमार्टम भी नहीं कराया गया था।
राजीव दीक्षित (साभार: सोशल मीडिया)

 

राजीव दीक्षित के साथ तमाम तरह के विवाद जुड़े थे। ये विवाद उनकी व्यक्तिगत, पारिवारिक या सामाजिक जीवन को लेकर कम, उनके बयानों को लेकर ज्यादा थी। राजीव दीक्षित ने दावा किया था कि बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी गोमांस यानी बीफ खाती हैं। उन्होंने यह भी दावा किया था कि बीफ खाने की वजह से ही ममता बनर्जी ने अटल बिहारी वाजपेयी को धमकी दी थी कि अगर देश में बीफ बैन कराया तो NDA की सरकार गिरा देंगी।
राजीव दीक्षित के दावे सिर्फ राजनीतिक ही नहीं, बल्कि बॉलीवुड और विदेशी कंपनियों तक के लिए थे। सदी के महानायक कहलाने वाले अमिताभ बच्चन को लेकर उन्होंने दावा किया था कि अमिताभ पेप्सी का ऐड इसलिए नहीं करते, क्योंकि उनकी आँत पेप्सी पीने की वजह से खराब हो गई थी। कभी लक्स साबुन का प्रचार करने वाली हेमा मालिनी को लेकर उन्होंने कहा था कि वो लक्स से नहीं, बल्कि बेसन और मलाई के मिश्रण से नहाती हैं। हेमा मालिनी ये बातें इसलिए नहीं बताती हैं, क्योंकि पूरे देश की महिलाएँ खूबसूरत हो जाएँगी। राजीव दीक्षित के ऐसे अनेकों दावे थे।
कहा जाता है कि राजीव दीक्षित का दिल का दौरा पड़ने से उनकी मौत हो गई। जिस समय उनकी मौत हुई, उस समय वे सिर्फ 43 साल के थे। उनकी मौत को लेकर तमाम तरह के दावे किए जाते हैं। उनके समर्थकों का दावा है कि राजीव दीक्षित की की हत्या की गई थी। इसके पीछे वे तर्क देते हैं कि राजीव दीक्षित अरबों का व्यापार करने वाली विदेशी कंपनियों के खिलाफ बोलते थे। इन कंपनियों के व्यापार पर असर ना पड़े, इसलिए उन्होंने दीक्षित की हत्या करा दी।
राजीव दीक्षित की हत्या की जो भी वजह हो, लेकिन इतना तो तय है कि वो आम भारतीयों में इतना प्रसिद्ध हो चुके थे कि भारत सरकार ने साल 2018 में उनकी मौत की जाँच के लिए आदेश दिए थे। अगर 2018 की खबरों को मानें तो प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) ने राजीव दीक्षित की मौत की नए सिरे से जाँच के लिए छत्तीसगढ़ के दुर्ग पुलिस को आदेश दिया था। राजीव दीक्षित की भिलाई प्रवास के दौरान ही मौत हुई थी। हालाँकि, इस जाँच का क्या हुआ, किसी को नहीं पता।
कहा जाता है कि भारत स्वाभिमान आंदोलन के राष्ट्रीय प्रवक्ता और आजादी बचाओ आंदोलन के सूत्रधार राजीव दीक्षित 29 नवंबर 2010 को दुर्ग जिले के बेमेतरा तससील प्रांगण में सुबह 10 से दोपहर 1 बजे तक व्याख्यान दिया। इसके बाद दुर्ग में रहने वाले ‘भारत स्वाभिमान आंदोलन’ के पदाधिकारी दया सागर के साथ भिलाई के लिए कार से रवाना हो गए। भिलाई में शाम 4 बजे अक्षय पात्र फाउंडेशन के पास उनका भाषण होना था।
भिलाई जाने के दौरान उन्हें रास्ते में बेचैनी महसूस होने लगी। उनकी कार कन्हैया नाम का एक ड्राइवर चला रहा था। कहा जाता है कि जब ड्राइवर ने अस्पताल चलने की बात कही तो उन्होंने मना कर दिया। वे वापस दुर्ग में दया सागर की ओर चल पड़े। दया सागर के घर पहुँचकर वे उसके बाथरूम में गिर गए। कहा जाता है कि वहाँ रामदेव ने उन्हें फोन किया और उनके कहने पर वे अस्पताल जाने के लिए तैयार हुए। 29-30 नवंबर 2010 की रात उन्हें भिलाई के बीएसआर अपोलो अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ उनकी मौत हो गई।
राजीव दीक्षित की हत्या को बल देने वाले कारणों में एक बड़ा कारण ये भी है कि उनकी मौत के बाद जिला प्रशासन ने उनके शव का पोस्टमार्टम नहीं कराया। शव का बिना पोस्टमार्टम कराए बिना ही अंतिम संस्कार के लिए उनके शव को गृहनगर उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ भेज दिया गया। कहा जाता है कि मौत के दौरान उनका शव नीला पड़ गया था। यहाँ पर सवाल उठना लाजिमी है, क्योंकि राजीव दीक्षित उस समय तक बड़े नाम बन चुके थे और उनकी मौत के बाद शव का पोस्टमार्टम कराए बिना भेजना प्रशासन की घनघोर लापरवाही थी।
राजीव दीक्षित के विदेशी कंपनियों द्वारा शुरू किए गए मुहिम को बाद में रामदेव को आगे बढ़ाया और वे आज कई हजार करोड़ रुपए की कंपनी के मालिक हैं। इस आधार पर राजीव दीक्षित के समर्थक उनकी मौत को हत्या की संज्ञा देते हैं। राजीव दीक्षित का जन्म जिस दिन को हुआ था, उसी दिन उनका शरीर भी छूटा। राजीव दीक्षित का जन्म 30 नवंबर 1967 को हुआ था और वर्ष 2010 में जन्मदिन के दिन ही उनकी मौत हो गई।
राजीव दीक्षित दीक्षित का जन्म उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिला के अतरौली तहसील के नाह गाँव में हुआ था। उनकी शुरुआती शिक्षा इलाके में ही हुई और फिर फिरोजाबाद से 12वीं करने के बाद वे इलाहाबाद से बीटेक किया। इसके बाद आईआईटी कानपुर से एमटेक किया। हालाँकि, साल 2015 में एक आरटीआई के जवाब में आईआईटी कानपुर ने बताया कि राजीव दीक्षित नामक छात्र उनके यहां के छात्रों की सूची में नहीं है।
राजीव दीक्षित ने अपने कई वीडियो में दावा किया था कि उन्होंने फ्रांस से पीएचडी की है और CSIR में एंटी ग्रैविटी पर रिसर्च का काम किया है। वो अक्सर कहा करते थे कि उनकी रिसर्च के लिए जर्मनी का मैक्स प्लांक इंस्टीट्यूट अरबों रुपए देने के लिए तैयार था, लेकिन उन्होंने अपने देश की खातिर रिसर्च बेचने से इनकार कर दिया। खैर जो भी हो और उनके दावे जो भी हों, लेकिन उनके समर्थक उस पर आँख मूँद कर विश्वास करते हैं।
राजीव दीक्षित का नाम पहली बार लोगों ने 1984 के भोपाल गैस त्रासदी के बाद सुना।उन्होंने आरोपित कंपनी यूनियन कार्बाइड के खिलाफ प्रदर्शन किए थे। राजीव दीक्षित ने दावा किया था कि यूनियन कार्बाइड जैसी घटना को अमेरिका ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत एक्सपेरिमेंट के लिए इस्तेमाल किया था।
वे भारत का वर्तमान न्यायिक व्यवस्था, कर लगाने की व्यवस्था आदि की खूब आलोचना करते थे। वे इसे भारतीय संस्कृति के विपरीत अंग्रेजों के कानून की फोटोकॉपी बताते थे। वर्तमान कर प्रणाली को वो भ्रष्टाचार की जड़ बताते थे। उनका दावा था कि वर्तमान कर प्रणाली में देश का 80 प्रतिशत कर नेताओं और नौकरशाहों की जेब में जाता है। वे 500 और 1000 रुपए की नोट बंद करने की भी सलाह देते थे।
राजीव दीक्षित का मानना था कि भारत को फिर से विश्वगुरु बनाने के लिए किसानों की आमदनी को बढ़ाना जरूरी है और किसानों की आमदनी के सबसे बड़े दुश्मन वैश्वीकरण एवं उदारीकरण है। उदारीकरण को वे किसानों की आत्महत्या का सबसे बड़ा कारण मानते थे। उनका कहना है कि इस तरह की वैश्विक परिस्थितियों ने भारतीय किसानों के लिए कुछ भी स्पेस नहीं छोड़ा है, जहाँ वे स्मृद्धि की ओर बढ़ सकें।
इसके अलावा, वे राजनीतिक टिप्पणी भी किया करते थे। उन्होंने पंडित जवाहरलाल नेहरू को लेकर कहा था कि वे मोहम्मद अली जिन्ना और एडविना के साथ एक ही कॉलेज में पढ़े थे। एडविना एक चालाक महिला थी और पंडित नेहरू और जिन्ना को एक ही समय पर हैंडल किया करती थी। दीक्षित का आरोप था कि जिन्ना और पंडित नेहरू हल्के चरित्र के लोग थे। इसलिए एडविना ने उन्हें मोहरा बना लिया था। दीक्षित कहा करते थे कि एडविना के पास पंडित नेहरू की आपत्तिजनक तस्वीरें थीं, जिससे वह उन्हें ब्लैकमेल करती थीं और इसी ब्लैकमेल की वजह से भारत का बँटवारा कराया गया था।
खैर जो भी हो, लेकिन राजीव दीक्षित अपने दावों को लेकर अक्सर चर्चा में रहते थे। दक्षिणपंथी उन्हें पसंद करते थे तो विपक्ष उनके दावों को अनाप-शनाप बताते थे। इस बीच साल 2009 में वे बाबा रामदेव के साथ काम करना शुरू किया और अगले ही साल उनकी मौत हो गई। इसके बाद बाबा रामदेव ने विदेशी कंपनियों के खिलाफ उन्हीं मुद्दों को उठाना शुरू किया, जो राजीव दीक्षित उठाया करते थे। इसके बाद राजीव दीक्षित के समर्थक रामदेव की तरफ अंगुली उठाने लगे और राजीव दीक्षित की मौत के लिए जिम्मेदार बताने लगे।
हालाँकि, जो भी हो लेकिन राजीव दीक्षित की मौत के बाद स्थानीय प्रशासन द्वार उनके शव का पोस्टमार्टम नहीं कराना एक गंभीर चूक है। इस तरह की चूक पर दंडित करने का प्रावधान है या नहीं, ये मुझे नहीं पता। लेकिन, इसी चूक के कारण राजीव दीक्षित की मौत को लेकर तमाम तरह के अफवाह एवं साजिश की बातें कही जाती हैं।