कानपुर, नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में हिंसा की आग में जल रहे कानपुर में 21 दिसंबर को सांप्रदायिक सौहाद्र्र की बड़ी मिसाल पेश की गई। हिंसा में तीन युवकों की मौत के बाद बेहद तनावपूर्ण माहौल को लेकर बाकरगंज निवासी खान परिवार अपनी बेटी की आने वाली बारात को लेकर बेहद परेशान था। उनकी बेटी जीनत के निकाह के लिए बारात प्रतापगढ़ से आनी थी और जब लड़के वालों को पता चला कि कानपुर में उपद्रव बढ़ गया है तो उन लोगों ने आने से इनकार कर दिया। ऐसे में पड़ोसी हिंदुओं ने उनको भरोसा दिलाया और अपनी जिम्मेदारी पर उनको बुला लिया। इतना ही नहीं करीब चार दर्जन हिंदुओं ने न सिर्फ बारात की अगवानी की बल्कि खाने के साथ ही निकाह के सब इंतजाम में अपना योगदान दिया। 

कानपुर में बाकरगंज निवासी खान परिवार 21 दिसंबर को होने वाली अपनी बेटी जीनत की शादी की तैयारियों में जुटा था। इसी बीच नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में 19 दिसंबर से प्रदेश में माहौल बिगड़ने लगा। कानपुर भी 20 दिसंबर को हिंसा की आग में जल उठा। अचानक पूरे कानपुर में तनाव का माहौल बनने से जीनत के ससुराल के लोग बारात ले जाने को लेकर असमंजस में थे। इसी बीच हिंदू पड़ोसी विमल के साथ करीब चार दर्जन लोगों ने जीनत के पिता के साथ ससुराल के लोगों को निकाह के लिए राजी कर लिया और अपनी जिम्मेदारी पर बारातियों को बुलाया। इधर जीनत के पिता के साथ अन्य रिश्तेदार भी निकाह को कुछ दिन के लिए टालने के पक्ष में थे। इनकी परेशानी जब पड़ोसियों को पता चली तो चंद मिनट में ही सारी समस्या समाप्त हो गई।

पड़ोसी विमल चपडिय़ा ने इस संकट में खान परिवार की मदद का निर्णय लिया। अपने साथी सोमनाथ तिवारी और नीरज तिवारी को लेकर वह खान फैमिली से मिलने पहुंचे। यहां उन्होंने आश्वासन दिया कि बारात की अगवानी और विदाई तक की जिम्मेदारी वे लेंगे और इसलिए चिंतित होने की जरूरत नहीं है। इन सभी ने खान परिवार के साथ प्रतापगढ़ से आने वाले बारातियों को आमंत्रित किया। इतने आश्वासन के बाद प्रतापगढ़ के लोग भी मान गए।

प्रतापगढ़ से 21 दिसंबर की शाम 65-70 बाराती कार तथा बस से बाकरगंज चौराहे पर खान परिवार के गेस्ट हाउस के पास पहुंच गए। इसके बाद करीब चार दर्जन हिंदू बारात को विवाह स्थल तक पहुंचाने के लिए तैयार थे। इन सभी ने ह्यूमन चेन बनाई और बारातियों को इनके बीच लेकर उनको सुरक्षित पहुंचाया। इस तरह आपसी भाईचारे ने एक तनावपूर्ण माहौल को हरा दिया था।

इन सभी के प्रयास से जीनत अब प्रतापगढ़ के हुसनैन फारूकी की हो गई थीं। निकाह के बाद बुधवार को जीनत अपने ससुराल से वापस कानपुर आई थीं। उनके चेहरे पर मुस्कान देखते बन रही थी। उन्होंने सभी पड़ोसियों का भी शुक्रिया किया। जीनत सिर्फ 12 साल की थी जब उनके पिता की मृत्यु हो गई थी। जीनत के चाचा वाजिद फजल ने कहा कि विमल और उनके साथियों ने हमें आश्वासन दिया था कि बारात को कुछ नहीं होने देंगे। जीनत भी जब यहां पहुंची तो सबसे पहले विमल के घर गई और उन्हें भाई बोलते हुए उनसे आशीर्वाद लिया।

जीनत ने कहा कि कई दिनों से मैं सो भी नहीं पाई हूं। तनाव के कारण ही कुछ दिन पहले एक शादी टूट गई थी। शादी के दिन जब चाचा के पास मेरे ससुरालवालों का फोन आया तो मुझे एक बार तो लगा कि शायद मेरी भी शादी नहीं हो पाएगी। विमल भाई और उनके साथियों के सहयोग के बिना यह असंभव था।