विश्व में औद्योगिक विकास में प्लास्टिक कचरा महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। इसके साथ ही प्लास्टिक कचरा की समस्या भी मानवता एवं जीवों के लिए खतरा बनकर उभर गया है। प्लास्टिक कचरा इस धरती का सबसे दूरगामी प्रभाव डालने वाला कचरा बन गया है। प्लास्टिक मुख्य रूप से तेल, गैस और कोयले जैसे जीवाश्म ईंधनों से बने रसायनों को ऊर्जा-गहन प्रक्रिया द्वारा रूपांतरित करके तैयार किया जाता है। उत्पादन के दौरान छोटे रासायनिक अणु (मोनोमर) को मिलाकर लंबे और मजबूत श्रृंखला अणु (पॉलीमर) बनाए जाते हैं। इसके बाद इनमें रंग, चिकनाई, लचीलापन, अग्निरोधकता आदि गुण देने के लिए अनेक रासायन मिलाए जाते हैं। इन सबके कारण यह काफी लंबे समय तक टिकाऊ बना रहता है।

प्लास्टिक प्रदूषण (साभार: बिजनेस स्टैंडर्ड)

प्लास्टिक सड़ता नहीं है। इसे नष्ट करने के लिए आमतौर पर जला दिया जाता है, जिसके कारण यह वायुमंडल में जहरीले गैस उत्सर्जन करता है, जो वायुमंडल के लिए बेहद खतरनाक होता है। इस्तेमाल होने वाला प्लास्टिक  हवा, जल स्रोतों, कृषि भूमि, नदियों और महासागरों में लगातार जमा होता रहता है और यह एक भारी विपदा में बदल गया है। दरअसल, विश्व भर में प्लास्टिक कचरे का केवल 9% हिस्सा ही रिसाइकल किया जाता है। वहीं, 12% हिस्सा जला दिया जाता है। बाकी के 79% प्लास्टिक कचरे को लैंडफिल में डाल दिया जाता है, जो आगे चलकर  या पर्यावरण में फैल जाता है और इससे भूमि, जल और वायु प्रदूषण होता है ।

माइक्रोप्लास्टिक और उनसे जुड़े रसायन, जैसे फ्थैलेट्स, हार्मोनल असंतुलन का कारण बन सकते हैं, जिससे प्रजनन क्षमता में कमी, मासिक धर्म में गड़बड़ी और गर्भावस्था संबंधी जटिलताएं हो सकती हैं । यह हृदय रोग का भी बड़ा कारण है। न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय के एक अध्ययन में पाया गया है कि डाइ-2-एथिलहेक्सिल फ्थैलेट (DEHP) के संपर्क में आने से 2018 में 3,56,000 से अधिक हृदय रोगों से संबंधित मौतें हुईं। इनमें से अधिकांश मौतें  विकासशील देशों में हुईं। बता दें कि विकसित देशों द्वारा प्लास्टिक कचरे का निर्यात विकासशील देशों में किया जाता है। इन विकासशील देशों में कचरा प्रबंधन की सुविधाएं अभी विकसित भी नहीं हो पाई हैं। इससे स्थानीय समुदायों में गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ जाती हैं।

हाल शोधों से यह पता चला है कि माइक्रोप्लास्टिक और नैनोप्लास्टिक कण हर स्थान, हर जीव, यहाँ तक कि इंसानी शरीर में भी मिल रहे हैं। इसकी गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि प्लास्टिक के ये सूक्ष्म कण गर्भवती महिलाओं और गर्भस्थ शिशुओं की प्लेसेंटा और मल में भी मिल रहे हैं। ये प्लास्टिक अपशिष्ट हमारी त्वचा, आँखों, श्वसन तंत्र, नर्वस सिस्टम, लीवर और यहाँ तक कि मस्तिष्क को भी नुकसान पहुँचा सकते हैं। इनकी वजह से कैंसर, ल्यूकेमिया, जन्म दोष, आनुवंशिकी बीमारी, प्रजनन क्षमता में कमी, स्ट्रोक, डायबिटीज और प्रतिरक्षा प्रणाली पर गंभीर दुष्प्रभाव दिखने लगते हैं।

वहीं, माइक्रोप्लास्टिक मनुष्यों की सोचने-समझने की शक्ति को भी गंभीर रूप से प्रभावित करता है। माइक्रोप्लास्टिक यानी प्लास्टिक के सूक्ष्म कण मस्तिष्क की कोशिकाओं में प्रवेश करता है। इससे न्यूरोडीजेनेरेटिव रोगों, जैसे कि अल्जाइमर और पार्किंसंस का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा, भोजन में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक का सेवन आंतों की परत को नुकसान पहुंचाता है। इससे पाचन संबंधी समस्याएं, अंदरूनी सूजन और पोषक तत्वों के अवशोषण में कमी हो सकती है। शरीर में माइक्रोप्लास्टिक की उपस्थिति से इम्यून सिस्टम भी कमजोर हो जाता है। इससे रोगों से लड़ने की क्षमता खत्म हो जाती है और संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है ।

हम खुद प्लास्टिक के उपयोग को कम करके गंभीरता को कम कर सकते हैं

प्लास्टिक प्रदूषण फैलाने में सिंगल यूज प्लास्टिक की सबसे बड़ी भूमिका है। ऐसे कई तरीके हैं जिनसे व्यक्ति, व्यवसाय और सरकारें समाज में सिंगल यूज प्लास्टिक की उपयोगिता को कम करने का प्रयास कर सकते हैं। हम खरीदारी करते समय या बाहर खाना खाते समय अपना जूट बैग या बोतल साथ रख सकते हैं। हम ऐसे सामग्री का उपयोग कर सकते हैं, जिनका रिसाइकल आसान हो या प्रकृति में बिना किसी हानि के नष्ट हो जाएँ, जैसे कि कागज, जूट आदि के सामान।

हम प्लास्टिक के बने सामानों का उपयोग ना करके भी इसके उपभोग को बढ़ावा देने से रोक सकते हैं। यदि हमारे पास को प्लास्टिक कचरा हो तो उसे जिम्मेदारी के साथ उसका उचित निपटान करना चाहिए। वहीं, व्यवसायिक संस्थान भी इनके उत्पादन को रोक करके इस पर लगाम लगा सकती हैं। इसके अलावा, सरकार द्वारा इन पर लगाए गए निषेध को कठोरता को लागू करके भी इसके इस्तेमाल को पूरी तरह रोका जा सकता है।

दरअसल, दुनिया भर के 60 से अधिक देशों में प्लास्टिक बैग के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। केन्या में इस पर साल 2017 में प्रतिबंध लगा। इसके बाद वहाँ प्लास्टिक बैग के इस्तेमाल में 80% की गिरावट देखी गई है। हालाँकि, भारत में प्लास्टिक पर रोक के बावजूद इसका धड़ल्ले से देश भर में इस्तेमाल हो रहा है और इसके इस्तेमाल में कोई उचित गिरावट नहीं देखी जा रही है। वहीं, यूरोपीय संघ ने साल 2021 तक कुछ सिंगल यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाने की योजना बनाई। इसके तहत सदस्य देशों को 2029 तक 90% प्लास्टिक की बोतलें एकत्र करनी होंगी।