प्लास्टिक कचरा दुनिया भर के लिए एक बड़ी समस्या बनकर उभरा है। यह सिर्फ स्थल पर रहने वाले मानव एवं अन्य जीवों के लिए ही नहीं, बल्कि समुद्री जीवों के लिए भी खतरा बन गया है। दुनिया भर में हर साल लगभग 80 लाख से 1 करोड़ टन प्लास्टिक कचरा समुद्र में फेंका जाता है। यह कचरा समुद्री जीवन के लिए गंभीर खतरा बनकर उभरा है। यह प्लास्टिक समुद्र की सतह से लेकर गहरे तह तक और दोनों ध्रुवों से लेकर दूर-दराज के द्वीपों तक फैल चुका है। समुद्र में प्लास्टिक के कारण 17% प्रजातियाँ प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ की खतरे वाली प्रजातियों की लाल सूची में हैं।

समुद्र में डाले गए प्लास्टिक को कुछ जीव भोजन समझकर उसे खा लेते हैं। कुछ प्लास्टिक कचरे में फँसकर मारे जाते हैं। अगर  प्लास्टिक कचरे को कोई समुद्री जीव खा लेता है तो उसके कण उनकी आंतों में फँस जाते हैं। यह उनकी मौत का कारण बन जाता है। एक अध्ययन के अनुसार, लगभग 11% समुद्री जीवों के शरीर में प्लास्टिक पाया गया है। यह खतरे की घंटी है। समुद्र में प्लास्टिक कचरा का 80% भूमि आधारित स्रोतों से आता है। इनमें घरेलू कचरा, औद्योगिक अपशिष्ट और कृषि अपशिष्ट शामिल हैं।

हर साल लगभग 1.27 करोड़ टन प्लास्टिक कचरा समुद्र में पहुँचता है। इसके कारण हर साल लगभग 1,00,000 बड़े समुद्री स्तनधारी जीव मारे जाते हैं। इसके कारण ह्वेल जैसे बड़े जीव प्रभावित होते हैं। बड़े समुद्री स्तनधारी जीव प्लास्टिक में उलझ जाते हैं।इससे उनकी मौत हो जाती है। आमतौर पर मछली पकड़ने की रस्सियाँ, जाल और बर्तन समुद्र में फेंक दिए जाते हैं। इसमें आमतौर पर प्लास्टिक के बने होते हैं। इसमें ब्लू व्हेल से लेकर छोटे केकड़ों तक के कई तरह के समुद्री जीवों फँस जाते हैं। अनुमान है कि हर साल 3,00,000 व्हेल, डॉल्फ़िन और पोर्पॉइज़ घोस्ट इसमें उलझ कर मर जाते हैं। साल 2019 में एक व्हेल के पेट में 40 किलोग्राम प्लास्टिक की थैलियाँ सहित अन्य चीजें मिली थीं।

इससे समुद्री कछुए भी नहीं बच पाते। प्लास्टिक की थैलियाँ जेलीफिश की तरह दिखती हैं। इसके कारण कछुए इन्हें अपना भोजन समझ लेते हैं। वहीं, कुछ कछुए एवं जीव प्लास्टिक के जाली में फँस जाते हैं। इससे उनकी मौत हो जाती है। हाल ही में किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि अटलांटिक और प्रशांत महासागरों और भूमध्य सागर से समुद्री कछुओं की सभी सात प्रजातियों के पेट में माइक्रोप्लास्टिक के निशान मिले थे।

कुछ समुद्री पक्षी समुद्र के जल पर तैर रहे प्लास्टिक के टुकड़ों को मछली आदि जैसे अपना भोजन समझ लेते हैं और उन्हें खा जाते हैं। इससे ये प्लास्टिक उनके गले में फँस जाते हैं। प्लास्टिक के कारण हर साल 10,00,000 से ज़्यादा समुद्री पक्षी मारे जाते हैं। प्लास्टिक से मछलियां भी नहीं बच पाती हैं। मछलियों की कई प्रजातियों में प्लास्टिक के अंश मिले हैं। इनमें से कुछ प्रजातियाँ ऐसी हैं, जिन्हें मनुष्य खाते भी हैं।

एक रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2050 तक समुद्र में प्लास्टिक सभी मछलियों से ज़्यादा हो जाएगा। पर्यावरण संरक्षण एजेंसी EPA का कहना है कि मनुष्यों द्वारा बनाए गए सभी प्लास्टिक का 100% अभी भी अस्तित्व में है। प्लास्टिक को आम तौर पर खत्म होने में 500 से लेकर 1,000 साल तक लगते हैं। खत्म होने के बाद भी यह माइक्रोप्लास्टिक बन जाता है। वर्तमान में समुद्र में प्लास्टिक और माइक्रोप्लास्टिक के लगभग 50-75 लाख करोड़ टुकड़े हैं। यह प्लास्टिक या तो माइक्रोप्लास्टिक कणों में टूट जाता है या इधर-उधर तैरता रहता है और कचरे का ढेर बन जाता है।

नेशनल ज्योग्राफिक के अनुसार, वैज्ञानिकों को हेंडरसन द्वीप पर रूस, संयुक्त राज्य अमेरिका, यूरोप, दक्षिण अमेरिका, जापान और चीन से आने वाला प्लास्टिक मिला। हेंडरसन द्वीप चिली और न्यूजीलैंड के बीच में स्थित एक निर्जन द्वीप है। चूँकि भूमि से ही विभिन्न माध्यमों से होते हुए ये प्लास्टिक समुद्र में जाते हैं। इसलिए समुद्र से इन्हें निकालता बेहद मुश्किल काम है। इसलिए इन्हें समुद्र में जाने से पहले ही रोकना होगा। इसके लिए जरूरी है कि हम प्लास्टिक के इस्तेमाल को नकारें। अगर प्लास्टिक का इस्तेमाल कर भी रहे हैं तो इसके रिसाइकल करने के लिए पर्याप्त प्रबंध करें। इससे हम खुद को और अपने पारिस्थितिकी तंत्र को बचा सकते हैं।