बाँकीपुर और दतिया में BJP का 30 साल पुराना किला ढहा: जमीनी हालात रहे मुश्किल
पटना के बाँकीपुर और मध्य प्रदेश के दतिया विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में भाजपा को करारा झटका लगा है। दशकों पुराने इन दोनों सीटों को भाजपा ने गँवा दिया है।बाँकीपुर सीट पर जनसुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने लगभग 19,000 वोटों से भाजपा उम्मीदवार नीरज सिन्हा पर जीत हासिल की है। वहीं, दतिया सीट पर दतिया राजपरिवार के सदस्य और कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता घनश्याम सिंह ने लगभग 6,000 वोटों से भाजपा के आशुतोष तिवारी को हराया है।
ये दोनों ऐसी सीटें हैं, जिन पर भाजपा पिछले लगभग 30 सालों से लगातार जीत हासिल करती आई है, लेकिन इस बार के उपचुनाव में भाजपा के ये दोनों गढ़ ध्वस्त हो गए और विपक्षियों के कब्जे में चले गए। हालाँकि, गुजरात की मांजलपुर विधानसभा सीट पर भाजपा के सतेंद्रभाई पटेल की जीत हुई है, जो भाजपा के लिए राहत की बात है। पटेल ने कॉन्ग्रेस उम्मीदवार भीखाभाई रबाड़ी को 30,630 मतों से हराया है।
बाँकीपुर सीट से भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन विधायक हुआ करते थे। जब वो भाजपा अध्यक्ष और राज्यसभा के सदस्य बने तो यह सीट खाली हुआ। वहीं, दतिया के कॉन्ग्रेस विधायक राजेंद्र भारती को धोखाधड़ी के एक मामले में दिल्ली की अदालत द्वारा सजा सुनाए जाने के बाद उनकी विधायकी चली गई थी। राजेंद्र भारती ने साल 2023 के विधानसभा चुनावों में भाजपा के कद्दावर नेता नरोत्तम मिश्रा को हराया था।
बाँकीपुर में भाजपा की दुर्गति
जिस बाँकीपुर सीट पर प्रशांत किशोर ने जीत हासिल की है, उस पर नितिन नवीन पिछले 5 बार से विधायक चुनते आ रहे थे। उनके पहले उनके पिता नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा इस सीट से सन 1995 में विधायक बने थे। ये वो दौर था, जब बिहार में लालू यादव का जलवा था। इसके बावजूद नितिन नवीन के पिता ने इस सीट पर जीत हासिल की। इस जीत को उन्होंने 2000 और 2005 के विधानसभा चुनावों में भी दोहराया।
साल 2005 में नवीन किशोर सिन्हा की मृत्यु के बाद उनके बेटे नितिन नवीन यहाँ से लगातार विधायक बनते आ रहे थे। हालाँकि, प्रशांत किशोर ने भाजपा के इस भ्रम को तोड़ दिया। ये वही प्रशांत किशोर हैं, जिन्होंने 2025 के विधानसभा चुनावों में अपने कई उम्मीदवार मैदान में उतारे थे और उन्हें दुर्गति झेलनी पड़ी थी। हालाँकि, इस बार के उपचुनाव में प्रशांत ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी और जीत हासिल की।
बाँकीपुर सीट पर भाजपा पहले से ही कंफ्यूज थी। इस सीट के लिए उसने सबसे पहले नितिन नवीन के करीबी अभिषेक कुमार बंटी को टिकट दिया। हालाँकि, सोशल मीडिया पर उम्मीदवारी को लेकर सवाल उठने लगे। बंटी के पिता रवींद्र प्रसाद को चारा घोटाले में दोषी पाया गया है। हालाँकि, अभी वो जमानत पर बाहर हैं। सोशल मीडिया पर जब यह बात चली तो भाजपा नेतृत्व के कान खड़े हो गए।
भाजपा बिहार में लालू यादव के खिलाफ चारा घोटाले और जंगलराज को प्रमुख मुद्दे के रूप में प्रस्तुत करती है और जनता को बार-बार उस दौरान की कहानी सुनाती है। कहा जाता है कि बंटी के पिता के चारा घोटाले में संलिप्तता की बात चलने लगी तो भाजपा नेतृत्व ने बंटी से पीछे हटने के लिए कह दिया। इसके बाद बंटी ने पारिवारिक कारणों का हवाला देकर अपना नामांकन वापस ले लिया।
इसके बाद भाजपा ने नीरज कुमार सिन्हा को बाँकीपुर सीट पर उम्मीदवार बनाया। भाजपा आश्वस्त थी कि यह उसकी अपनी सीट है, इसलिए प्रशांत किशोर कुछ विशेष नहीं कर पाएँगे। हालाँकि, भाजपा ने आसन्न खतरे को भाँपते हुए भाजपा के तमाम बड़े नेताओं की चुनावी ड्यूटी बाँकीपुर में लगा रखी थी, लेकिन भाजपा को अपने पाले में करने में नाकाम रही।
इस पीछे भरत तिवारी एनकाउंटर और उसमें पुलिस की भागीदारी, यूजीसी बिल सवर्णों में नराजगी आदि की भी प्रमुख भूमिका रही। बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का बड़बोलापन भी लोगों को चुभा। भरत तिवारी एनकाउंटर में उनके बयान के कारण भारी बवाल मच गया था। उधर पीके भी सम्राट चौधरी पर लगातार हमलावर रहे हैं। उन्होंने सीएम सम्राट को हत्यारा तक बता दिया था। इन सब आरोपों एवं स्थितियों ने भी बाँकीपुर में असर डाला।
इन कारणों से बाँकीपुर में भाजपा का वोट शेयर गिरकर 34.5 प्रतिशत रह गया। साल 1995 में लालू यादव के दौर में जब भाजपा ने इस पर जीत हासिल की थी, तब भी उसे 40.68 प्रतिशत वोट मिले थे। साल 2000 में 54.93 प्रतिशत वोट मिले। साल 2005 में मिले 59.12 प्रतिशत वोट शेयर 2006 में 82 प्रतिशत तक पहुँच गया।
साल 2005 के बाद भाजपा को इस सीट पर 59 प्रतिशत के वोट कभी कम नहीं मिले, लेकिन इस बार वोट शेयर में भारी गिरावट दर्ज की गई। परिणाम सामने है। माना जा रहा है कि सवर्ण वोटरों ने इस बार बाँकीपुर में भाजपा का दामन छोड़ दिया।
दतिया सीट पर फिर कॉन्ग्रेस
साल 2023 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस के राजेंद्र भारती ने भाजपा के दिग्गज नेता नरोत्तम मिश्रा को 7,700 से अधिक वोटों से हराया था। उस समय नरोत्तम मिश्रा प्रदेश के गृहमंत्री थे। इस हार के बाद नरोत्तम मिश्रा की ना सिर्फ कुर्सी गई, बल्कि वो प्रदेश की राजनीति में भी हाशिये पर चले गए।
धोखाधड़ी मामले में जब कॉन्ग्रेस विधायक राजेंद्र भारती को सजा हुई तो उनकी विधायकी जाने के कारण यह सीट खाली हो गई। इसके बाद भाजपा ने नरोत्तम मिश्रा के बजाय इस सीट पर किसी नए चेहरे पर दाँव लगाने की सोची और टिकट आशुतोष तिवारी को दिया।
हालाँकि, आशुतोष तिवारी को टिकट मिलने के बाद नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों ने दतिया में जमकर हंगामा मचाया। भरे मंच से नरोत्तम खुद रो पड़े। हालाँकि, उन्होंने वादा किया था कि वो भाजपा प्रत्याशी के पक्ष में घर-घर जाकर प्रचार करेंगे और लोगों से वोट मागेंगे। लेकिन, नरोत्तम के कथनी का उपचुनाव में असर नहीं दिखा।
उपचुनाव में नरोत्तम के बूथ नंबर 121 पर भाजपा पीछे रही। इस बूथ पर कॉन्ग्रेस को 291 वोट मिले, जबकि भाजपा को 264 वोट मिले। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा द्वारा नरोत्तम की जगह नए चेहरे पर दाँव लगाना भारी पड़ गया। हालाँकि, यह पूरी तरह सच नहीं है। नरोत्तम को इसके पहले कॉन्ग्रेस हराकर हाशिये पर धकेल चुकी है।
दतिया में भाजपा की हार की एक बड़ी वजह कॉन्ग्रेस के मजबूत प्रत्याशी का मैदान में होना। इस बार कॉन्ग्रेस ने दतिया राजघराने के घनश्याम सिंह को अपना उम्मीदवार बनाया था। राजा होने के कारण इलाके में उनका काफी सम्मान है। घनश्याम सिंह एक कद्दावर नेता हैं, जो पहले भी कई बार विधायक रह चुके हैं।
उन्होंने उन्होंने साल 1993 में पहली बार कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीतकर विधानसभा में प्रवेश किया। इसके बाद अगले चुनाव में हार मिली। कुछ सालों बाद उन्होंने फिर से वापसी की और दोबारा विधायक बने। बाद में उन्होंने दतिया के पड़ोसी सेवढ़ा विधानसभा से भी चुनाव जीता। जीत या हार, दोनों ही स्थितियों में घनश्याम सिंह से जनता के बीच बने रहे और संवाद को बनाए रखा।
उनकी बेदाग छवि और जनसुलभता के कारण इलाके में उनकी गिनती एक जननेता के रूप में होती है, जो राजपरिवार का प्रमुख होने के बावजूद भी सरल और जमीन से जुड़े हैं। संगठन के साथ लंबे समय तक काम करने का अनुभव भी उन्हें इस चुनाव में मददगार साबित हुआ।