मंदिरों की पवित्रता पर देवदासी का काला दाग, इनके अवैध बच्चे का अस्तित्व नहीं
स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर की मौत के बाद देवदासी प्रथा की खूब चर्चा हुई थी। यह प्रथा कर्नाटक और आंध्र प्रदेश सहित दक्षिण भारत के कई राज्यों सहित राजस्थान एवं मध्य प्रदेश के कुछ जिलों में आज भी जारी है। इन देवदासियों की संतानें आज पहचान के लिए तड़प रही हैं। इनके बच्चों को तमाम तरह के अपमान और परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
कर्नाटक में पूर्व देवदासियों के बच्चों ने सरकार से विभिन्न फॉर्मों में दिए गए ‘पिता’ के कॉलम को वैकल्पिक बनाने का आग्रह किया है। उनका कहना है कि उन्हें छूट दी जाए कि जहाँ पिता का नाम लिखना है, वहाँ वे अपनी माँ का नाम लिख सकें या उसे खाली छोड़ सकें। उनका कहना है कि यदि सरकार उनकी बात मान लेती है तो उन्हें पहचान के संकट से थोड़ी राहत मिलेगी।
सरकार के इस फैसले से उन हजारों बच्चों को राहत मिलेगी, जो इस प्रथा के कारण भेदभाव और अपमान का शिकार बन रहे हैं। देवदासियों में अधिकांश दलित महिलाएँ हैं। ऐसे में दलित होने के कारण भेदभाव और ऊपर से देवदासी जैसी घृणित प्रथा के कारण इन महिलाओं का जीना दूभर होता है। पिता के नाम पर पहचान खोजने वाला समाज इनके बच्चों के साथ और भी बुरा व्यवहार करता है।
दक्षिण भारत में जारी देवदासी जैसी घिनौनी प्रथा आज भी जारी है। यहाँ पूर्व देवदासियों की एक अच्छी-खासी आबादी मौजूद है। उनके बच्चे के सामने कई तरह के सामाजिक और आर्थिक संकट खड़े हैं। कर्नाटक में पूर्व देवदासियों के भविष्य को लेकर न्यूइंडियन एक्सप्रेस में बाला चौहान ने प्रासंगिक लेख लिखा है।
इन बच्चों को नहीं पता है कि इनके पिता कौन हैं। इसलिए इन्हें ताने सुनने पड़ते हैं। इन बच्चों का कहना है कि देवदासियों के बच्चे होने के कारण उन पर स्कूलों में हँसा जाता है और उनके साथ दुर्व्यवहार किया जाता है। ये बच्चे मानसिक रूप से बेहद संजीदा होते हैं और यौन शोषण को लेकर बेहद सतर्क। इनकी समस्या पर रितेश शर्मा ने ‘द होली वाइव्स’ एक डॉक्युमेंट्री फिल्म बनाया है।
कहने को को दक्षिण की समाज सुधारक महिला डॉ. मुथूलक्ष्मी रेड्डी के प्रयासों से देवदासी को 1947 में खत्म कर दिया गया, लेकिन पुजारियों की सेवा के लिए शुरू की गई ‘देवदासी प्रथा’ आज भी जारी है। कहीं जोगिनी, कहीं माथमा तो कहीं वेदिनी नाम से देवदासी प्रथा देश के कई हिस्सों में अभी भी कायम है।
कर्नाटक के 10 जिलों और आंध्र प्रदेश के 14 जिलों में यह अमानवीय एवं घृणित प्रथा आज भी बदस्तूर जारी है। कर्नाटक ने सन 1982 और आंध्र प्रदेश ने सन 1988 में इस प्रथा को गैर-कानूनी घोषित किया था, लेकिन वहाँ की सरकारें और बेहद शक्तिशाली ब्राह्मण वर्ग के कारण इस प्रथा पर पूरी तरह रोक नहीं लग पाई है।
सुनीता दोहरे के अनुसार, कर्नाटक के बेलगाम जिले के सौदती स्थित येल्लमा देवी के मंदिर में माघ पूर्णिमा को धार्मिक आयोजन कर देवदासियों की आज भी भर्ती की जाती है। ‘रण्डी पूर्णिमा’ के नाम से वहाँ जाना जाने वाला माघ पूर्णिमा के दिन किशोरियों को देवदासी बनाया जाता है। उस दिन लाखों की संख्या में कथित भक्तजन पहुँच कर आदिवासी लड़कियों के साथ सरेआम छेड़छाड़ करते हैं और नशे में धुत हो अपनी काम पिपास बुझाते हैं।
देवदासी बनी महिलाओं की जिंदगी और देह व्यापार करने वाली महिलाओं की जिंदगी में कुछ खास अंतर नहीं है। देवदासियों को भगवान की सेवा के नाम पर आजीवन कुँआरी रखा जाता है और मंदिर में दान कर दिया जाता है। इसके बाद मंदिर के पुजारी/पंडित वर्ग द्वारा उनका दैहिक शोषण होता है। एक ऐसा समय ऐसा आता है, जब मंदिर उनका घर नहीं रह जाता और अपना एवं अवैध रूप से जन्मे संतानों को पालने के लिए हिलाओं को देह व्यापार करना पड़ता है।
सुनीता दोहरे लिखती हैं कि इतिहास के अनुसार भारत के मंदिरों की देवदासियाँ संभवतयाः पहली वेश्याएँ थीं। ये वही दौर था, जब कोस्थि में एफ्रोडाइट के मंदिर तथा आर्मीनिया में एनाइतिस के मंदिर में हायरोड्यूल (मंदिर में रहने वाली दासियां) होती थीं। ये भी कुछ ऐसी ही वेश्याएँ थीं। ये पुजारी वर्ग को यौन सुख देने के साथ-साथ पूंजीपति वर्ग के कामना को तृप्त करती थीं। इसके बदले मिले धन को वह मंदिर के कोष में जमा करवा देती थीं।
देवदासी प्रथा को लगभग दो हजार पुरानी प्रथा बताया जाता है। माना जाता है कि कौटिल्य या चाणक्य के समय इस प्रथा ने रफ्तार पकड़ी, क्योंकि इसका जिक्र उनके लिखित अर्थशास्त्र में भी है। यह भी कहा जाता है कि मौर्य वंश के अंतिम शासक और बौद्ध धर्मावलंबी बृहद्रथ की हत्या कर सत्ता हथियाने वाले उनके ब्राह्मण सेनापति पुष्यमित्र शुंग के काल में इस प्रथा को काफी विस्तार मिला। शुरू में देवदासियों का काम भगवान के लिए मंदिरों की साफ-सफाई करना था। बाद में वे पुजारियों की काम-वासना को शांत करने का साधन बन गईं।
हालाँकि उसके पहले भी राजनर्तकियों का नगरवधुओं के रूप में जिक्र आता है, लेकिन समाज में उनकी हैसियत काफी ऊँची हुआ करती थी। वे राजा की सलाहकार और राज्य के लिए गुप्तचर का काम करती थीं। नगरवधुओं में मदनमाला, चित्रलेखा (चंद्रगुप्त मौर्य की सहचरी), आम्रपाली, चंद्रसेना (अशोक की सहचरी), देवरक्ता (हर्षवर्धन की सहचरी), वसंतसेना, पिंगला प्रसिद्ध हैं। उस दौरान तक देवदासी प्रथा का कहीं जिक्र नहीं आता।