भारत के राष्ट्रीय गान ‘जन गण मन’ की यात्रा की कहानी बेहद दिलचस्प है। वर्तमान राष्ट्रीय गान को सबसे पहले 27 दिसंबर 1911 को भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस के कोलकाता अधिवेशन में गाया गया था। कोलकाता से शुरू होकर 1919 में आंध्र प्रदेश के मदनपल्ले, 1942 में जर्मनी के हैम्बर्ग, 1943 में अरब सागर को पार करके करते हुए आखिरकार 1950 में भारत के राष्ट्रीय गान बनने तक की यात्रा रोमांचकारी है।
रवींद्रनाथ टैगोर (साभार: मनी कंट्रोल)

 

जन गण मन की रचना महान साहत्यकार एवं नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ ठाकुर ने सन 11 दिसंबर 1911 में की थी। इसे ‘भारतो भाग्य बिधाता’ शीर्षक के तहत लिखा गया था। इसकी मूल रचना संस्कृतनिष्ठ बंगाली भाषा में की गई थी। इस रचना को टैगोर ने खुद संगीतबद्ध भी किया था। इसकी धुन राग अल्हैया बिलावल पर आधारित है। टैगोर ने स्वयं संगीतबद्ध किया था।
‘जन गण मन’ को पहली बार 27 दिसंबर 1911 को कॉन्ग्रेस के कोलकाता राष्ट्रीय अधिवेशन में गाया गया था। उस समय इसे रवींद्रनाथ टैगोर की भतीजी सरला देवी ने गाया था। उन्‍होंने स्‍कूली बच्‍चों के साथ मिलकर इसे बंगाली भाषा वाली मूल रचना को गाया था। उस समय अधिवेशन में कॉन्ग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष बिशन नारायण डार तथा अंबिका चरण मजूमदार और भूपेंद्र नाथ बोस जैसे नेता मौजूद थे। इसे फरवरी 1912 में हिंदू धर्म के सुधारवादी और पुनर्जागरण आंदोलन ‘ब्रह्म समाज’ के स्थापना दिवस कार्यक्रम में भी गाया गया था।
इतना ही नहीं, इसे ब्रह्म समाज के भजनों के संग्रह में शामिल किया गया था। नोबेल पुरस्कार पाने वाले पहले एशियाई रवींद्रनाथ टैगोर ने ब्रह्म समाज की आधिकारिक पत्रिका का संपादक रहते हुए थे, उन्होंने इसमें छापा था। में पहल इसके बाद 28 फरवरी 1919 में रवींद्रनाथ टैगोर ने आंध्र प्रदेश के मदनपल्ले के बेसेंट थियोसोफिकल कॉलेज में इसे गाया था। इस गीत को कॉलेज की उप-प्राचार्या एवं संगीत विशेषज्ञ मार्गरेट कजिन्स ने पश्चिमी संगीत नोटेशन में रखा। उसी समय टैगोर ने इसे अंग्रेजी में ‘द मॉर्निंग सॉन्ग ऑफ इंडिया’ के रूप में अनुवादित किया। यह गीत आज भी मदनपल्ले के बेसेंट हॉल में गाया जाता है।
साल 1942 में जर्मनी में नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने हैम्बर्ग में ‘फ्री इंडिया सेंटर’ की स्थापना की। इसमें उन्होंने रवींद्रनाथ टैगोर के गीत को केंद्र के राष्ट्रगान के रूप में चुना। हैम्बर्ग के रेडियो सिम्फनी ऑर्केस्ट्रा ने जर्मनी और फ्री इंडिया सेंटर के राष्ट्रगान बजाए थे। इसी तरह 1943 में नेताजी और अपने निजी सचिव एवं दुभाषिया कवि आबिद हसन के साथ एक जर्मन पनडुब्बी पर सवार होकर पूर्वी एशिया की ओर जा थे। पनडुब्बी में नेताजी ने हसन से ‘जन गण मन’ का हिंदी में अनुवाद करने का अनुरोध किया।
हसन ने हिंदी छंद लिखे: “शुभ सुख चैन की बरखा बरसे, भारत भाग है जागा। / पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा, द्रविड़, उत्कल, बंगा, चंचल सागर, विंध्य, हिमालय, नीला जमुना, गंगा। / तेरे नित गुन गायें, तुझसे जीवन पायें, हर तन पाये आशा। / सूरज बन कर जग पर चमके, भारत नाम सुभागा, जय हो! जय हो! जय हो! जय, जय, जय, जय हो! / सब के दिल में प्रीत बसे, तेरी मीठी बानी।? हर सूबे के रहने वाले, हर मजहब के प्राणी, सब भेद और फर्क मिटा के, सब भगवान में तेरी आके, गुंथे प्रेम की माला। /सूरज बन कर जग पर चमके, भारत नाम सुभागा, / जय हो! जय हो! जय हो! जय, जय, जय, जय हो!”
सन 1943-44 तक आजाद हिंद फौज में ‘शुभ सुख चैन की बरखा बरसे’ इसका कौमी तराना बन गया। इसे कैप्टन राम सिंह ठाकुर ने आईएनए सैनिकों को प्रेरित करने के लिए संगीतबद्ध किया था। 1946 में दिल्ली में कैप्टन राम सिंह को महात्मा गाँधी और सरदार पटेल के सामने कौमी तराना बजाने का मौका मिला। इस तरह हर मौके पर जन गण मन को राष्ट्रीय गीत के तौर पर इस्तेमाल किया जाने लगा। जन गण मन सामान्य रूप से राष्ट्र भाषा के रूप में इस्तेमाल होने लगा। राष्ट्रगान घोषित होने से पहले इसे सन 1945 में बनी फिल्म हमराही में इस्तेमाल किया गया था।
जब 15 अगस्त 1947 की रात संविधान सभा की पहली बैठक हुई तो उसका समापन भी ‘जन गण मन’ से किया गया। इसके बाद 1947 में ही न्‍यूयॉर्क में संयुक्‍त राष्‍ट्र महासभा की बैठक में भारतीय प्रतिन‍िधिमंडल से देश का राष्‍ट्रगान बताने को कहा गया तो UNGA को ‘जन गण मन’ की रिकॉर्डिंग दी गई। एक चिट्ठी में पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने जिक्र किया था कि दुनिया भर के प्रतिनिधियों के सामने ऑर्केस्‍ट्रा पर ‘जन गण मन’ गूँजा और सबने इसकी धुन को सराहा।
आखिरकार 24 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू करने के लिए सभा बैठी तो इसमें जन गण मन को राष्ट्रीय गान का दर्जा दिया गया। देश के प्रथम राष्‍ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने ‘जन गण मन’ को राष्‍ट्रगान और ‘वंदे मातरम’ को आधिकारिक रूप से राष्‍ट्रगीत घोषित किया। बता दें कि गुरुदेव के नाम से प्रसिद्ध रवींनाथ ठाकुर ने ही बांग्लादेश का राष्ट्रगान ‘अमार सोनार बांग्ला’ भी लिखा था।
जन गण मन को लेकर विवाद
सन 1911 में जब इस गीत को पहली बार गाया गया तो विवाद खड़ा हो गया। कहा गया कि यह गीत ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम और क्वीन मैरी के भारत आगमन के दौरान उनकी प्रशंसा में लिखा गया था। कहा जाता है कि अंग्रजों के दबाव में अधिनायक शब्द का इस्तेमाल किया गया था। लोगों ने कहा कि उनकी गीत के बोल सम्राट के प्रशंसा में हैं। जैसे ‘आप सभी लोगों के मन के शासक हैं, / भारत के भाग्य विधाता हैं। / आपका नाम पंजाब, सिंध, गुजरात और मराठा, द्रविड़, उड़ीसा और बंगाल के हृदयों को जगाता है; यह विंध्य और हिमालय की पहाड़ियों में गूंजता है, गण और यमुना के संगीत में मिल जाता है / और भारत के समुद्र की लहरों द्वारा गाया जाता है। / वे आशीर्वाद के लिए प्रार्थना करते हैं और आपकी स्तुति गाते हैं / सभी लोगों का उद्धार आपके हाथों में है, हे भारत के भाग्य विधाता।”
हालाँकि, जब जॉर्ज पंचम भारत आए और 11-12 दिसंबर 1911 को दिल्ली दरबार सजा तो यह गीत नहीं गाया गया। रवींद्रनाथ टैगोर ने खुद इसे नकार दिया था कि उन्होंने यह गीत जॉर्ज पंचम के सम्मान एवं स्वागत में लिखी थी। उन्होंने 1937 और फिर 1939 में इस संबंध में कई पत्र लिखे। इन पत्रों में उन्होंने साफ तौर पर कहा कि यह गान ‘भारत के भाग्य विधाता’ ईश्वर को समर्पित है, न कि ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम को।
नवंबर 1937 में टैगोर ने अपने संपादक पुलिन बिहारी सेन को एक पत्र लिका था। इसमें इस विवाद का पटाक्षेप करते हुए टैगोर ने कहा था कि यह साफ है कि ‘न तो पाँचवाँ, न ही छठा और न ही कोई जॉर्ज युगों तक मानव के भाग्य का निर्माता हो सकता है। मैंने जन गण मन गीत में भारत के भाग्य विधाता की स्तुति की थी, जो सभी उत्थान और पतन के बीच पथ-प्रदर्शक है, जो लोगों को रास्ता दिखाता है।”
हालाँकि, यह विवाद आज तक जारी है। साल 2015 में राजस्थान के राज्यपाल रहते हुए दिवंगत कल्याण सिंह ने भी कहा था कि रवींद्रनाथ टैगोर की रचना ‘जन गण मन’ में वास्तव में ब्रिटिश शासकों की प्रशंसा में लिखी गई थी। उन्होंने कहा था कि ‘अधिनायक जय हे’ को हटाकर उसकी जगह ‘मंगलदायक’ शब्द का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
कल्याण सिंह से पहले सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मार्कंडेय काटजू ने आरोप लगाया था कि रवींद्रनाथ टैगोर अंग्रेजों की कठपुतली थे। इसलिए उन्होंने अंग्रेजों की चापलूसी में इस गीत को लिखा था। काटजू ने कहा था, “राष्ट्रगान को हम बहुत गर्व के साथ गाते हैं, लेकिन वह देश के सम्मान में नहीं बल्कि ब्रिटिश किंग जॉर्ज पंचम के सम्मान में लिखा था। काटजू ने कहा था कि कोलकाता के अखबार इंग्लिश मैन ने उस समय इस बात का खुलासा किया था।”
रवींद्रनाथ टैगोर पर किताब लिखने वाले नित्यप्रिय घोष ने इसे गलत बताया है। घोष ने अपनी किताब ‘रवींद्रनाथ टैगोर अ पिक्टोरियल बॉयोग्राफ़ी’ में लिखा है कि रवींद्रनाथ टैगोर के एक मित्र ने सम्राट जॉर्ज पंचम के दिल्ली दरबार के मौके पर उनके सम्मान में एक गीत लिखने का आग्रह किया था। उस आग्रह को रवींद्रनाथ टैगोर ने ठुकरा दिया था। टैगोर ने किसी अंग्रेज राजा के लिए नहीं, बल्कि मानव हृदय पर राज करने वाली शक्ति (ईश्वर) के सम्मान में ये गीत लिखा था।”
रवींद्रनाथ टैगोर पर किताब लिखने वाले इतिहासकार सब्यसाची भट्टाचार्य ने भी इसका खंडन किया है। उनका मानना ​​है कि गीत को लेकर इस तरह के मिथक का खंडन किया जाना चाहिए और इसे समाप्त किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि टैगोर ने यह कविता ना तो ब्रिटिश सम्राट के लिए लिखी थी और न ही कॉन्ग्रेस के लिए। भट्टाचार्य के अनुसार, उन्होंने इसे एक भजन के रूप में लिखा था, जो देश एवं स्वयं के निर्माता यानी ईश्वर के लिए एक भजन था।