मालेगाँव ब्लास्ट, समझौता एक्सप्रेस विस्फोट और ‘हिंदू आतंकवाद’: कॉन्ग्रेस ने इसे अपनी मौत का सामान बनाया
मालेगाँव ब्लास्ट को देश में हिंदू आतंक का नैरेटिव गढ़ने के लिए याद किया जाता रहेगा। कॉन्ग्रेस की अगुवाई वाली UPA की सरकार मुस्लिम तुष्टिकरण में इस कदर डूबी रही कि इस्लामी आतंकवाद की काट में सैफ्रॉन टेररिज्म यानी भगवा आतंकवाद का नैरेटिव गढ़ा और इसके लिए बकायदा मालेगाँव बम ब्लास्ट में हिंदू संतों से लेकर सेना के अधिकारियों तक को फँसाया। इसको लेकर अब एक नई फिल्म आई है। 10 जनवरी 2025 को रिलीज हुई इस फिल्म का नाम है ‘मैच फिक्सिंग- द नेशन एट स्टेक’। आर्मी के पूर्व इंटेलिजेंस अधिकारी कर्नल कंवर खटाना की किताब ‘द गेम बिहाइंड सैफ्रन टेरर’ पर आधारित इस फिल्म में विनीत कुमार सिंह ने मुख्य भूमिका निभाई है। वहीं,अनुजा साठे, मनोज जोशी, किशोर कदम, ललित परिमू और राज अर्जुन भी इसमें अलग-अलग भूमिका में नजर आएँगे। इस फिल्म का निर्देशन केदार गायकवाड ने किया है।
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| सोनिया गाँधी और पी चिदंबरम (साभार: पत्रिका) |
सबसे पहले जानते हैं कि सैफ्रॉन टेरर या भगवा आतंकवाद की शुरुआत कहाँ से हुई। इस शब्द का सबसे पहले उपयोग सबसे पहले उपयोग कॉन्ग्रेस के प्रति हमदर्दी रखने वाले अंग्रेजी के पत्रकार प्रवीण स्वामी ने किया था। साल 2002 के गुजरात दंगों की रिपोर्टिंग में प्रवीण स्वामी ने ‘Saffron Terror’ नाम से हेडलाइन दिया था। इस रिपोर्ट में स्वामी ने लिखा था कि हिंदुओं ने मुस्लिमों पर अत्याचार किए थे। इस रिपोर्ट में उन्होंने नरेंद्र मोदी की सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए गुजरात पुलिस पर भी सवाल उठाए थे।
भाजपा और संघ को घेरने के लिए इस शब्द का सबसे पहला राजनीतिक प्रयोग देश का गृहमंत्री रहते हुए पी. चिदंबरम ने किया था। 25 अगस्त 2010 को डीजीपी और आईजी के वार्षिक सम्मेलन को संबोधित करते हुए चिदंबरम ने कहा था, “मैं आपको सावधान करना चाहता हूँ कि भारत में युवा पुरुषों एवं महिलाओं को कट्टरपंथी बनाने के प्रयासों में कोई कमी नहीं आयी है। इसके अलावा हाल में ‘भगवा आतंकवाद’ सामने आया है, जो अतीत में कई बम विस्फोटों में पाया गया है..।” चिदंबरम का बयान मालेगाँव ब्लास्ट, समझौता एक्सप्रेस और मक्का मस्जिद ब्लास्ट की ओर था। चिदंबरम ने साफ तौर कहा था कि इन बम विस्फोटों में ‘हिंदू आतंकवादियों’ की भूमिका थी।
इसके बाद भारत के गृहमंत्री रहते हुए सुशील कुमार शिंदे ने 20 जनवरी 2013 को जयपुर में कॉन्ग्रेस के चिंतन शिविर में कहा था कि भाजपा और आरएसएस के कैंपों में ‘हिंदू आंतकवादियों’ को प्रशिक्षण दिया जाता है। शिंदे ने कहा था, “हमारे पास रिपोर्ट आई है। जाँच में भाजपा या आरएसएस के ट्रेनिंग कैंप हिंदू आतंकवाद बढ़ाने का काम कर रहे हैं। समझौता एक्सप्रेस रेलगाड़ी का धमाका हो, मक्का मस्जिद ब्लास्ट हो या फिर मालेगाँव बम धमाका, हिंदू चरमपंथियों ने बम विस्फोट करवाए और फिर कह दिया कि ये धमाके अल्पसंख्यकों ने करवाए।”
जब सुशील कुमार शिंदे के इस बयान की आलोचना हुई तो उन्होंने साफ तौर पर इसका भार मीडिया पर डाल दिया। तब शिंदे ने कहा था, “ये सब इतनी बार अख़बार में आ गया है। ये कोई नई चीज़ नहीं है जो मैंने आज कही है। ये भगवा आतंकवाद की ही बात मैंने की है।” शिंदे के इस बयान पर पाकिस्तान परस्त कॉन्ग्रेस के नेता मणिशंकर अय्यर ने उन्हें बधाई दी थी।
दरअसल, कॉन्ग्रेस नेताओं ने मुस्लिमों को खुश करने के लिए इस शब्द का खूब राजनीतिक इस्तेमाल किया और भाजपा एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बहाने हिंदुओं को चरमपंथी बता दिया। अपनी बात को सही साबित करने के लिए कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट, मक्का मस्जिद ब्लास्ट, अजमेर ब्लास्ट, मालेगाँव ब्लास्ट जैसे कई आतंकवादी हमलों में हिंदुओं के नामों को आगे किया। समझौता एक्सप्रेस बम धमाका साल 2007 में हुआ था। उस समय भारत और पाकिस्तान के प्रतिनिधि आपस में मिलकर रिश्तों को मजबूत बनाने में लगे थे, लेकिन इस्लामी आतंकी इससे खुश नहीं थे। इसको लेकर खूब आरोप-प्रत्यारोप चले।
इसके बाद महाराष्ट्र के मालेगाँव में 29 सितम्बर 2008 को एक मोटरसाइकिल में धमाका हुआ। इस धमाके में 6 लोग मारे गए थे, जबकि 101 लोग घायल हुए थे। इन धमाकों के लिए साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, कर्नल श्रीकांत पुरोहित सहित कई बड़े नामों को गिरफ्तार किया गया और उन्हें जुर्म कबूलने के लिए बुरी तरह प्रताड़ित किया गया था। इस मामले में स्वामी असीमानंद को भी गिरफ्तार किया गया था। असीमानंद और लोकेश शर्मा को समझौता एक्सप्रेस में बम विस्फोट करने का मुख्य आरोपित बनाया गया था।
शुरुआत में इसकी जाँच महाराष्ट्र ATS कर रही थी। बाद में इस मामले को राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) को हस्तांतरित कर दिया गया। साल 2013 में भगवा आतंकवाद को स्थापित करने के लिए 10 हिंदुओं को नाम जारी किए गए, जिनके तार संघ या अन्य हिंदुत्ववादी संगठनों से जुड़े थे। इनमें सुनील जोशी, लोकेश शर्मा, संदीप डांगे, स्वामी असीमानंद, देवेंद्र गुप्ता, राजेंद्र, चंद्रशेखर लेवे, रामजी कालसांगरा, कमल चौहान, मुकेश वासानी के नाम थे। ये सभी समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट, मक्का मस्जिद ब्लास्ट, अजमेर ब्लास्ट में वांछित बताए गए थे।
NIA ने 22 मई 2013 को चार लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर दी थी। उस वक्त की पहली चार्जशीट में एनआईए ने असीमानंद और कर्नल श्रीकांत पुरोहित का नाम नहीं था। एनआईए ने मुंबई की विशेष अदालत में दाखिल चार्जशीट में लोकेश शर्मा, धन सिंह चौधरी, राजेंद्र चौधरी और मनोहर का नाम लिया था और इन सभी को कथित कट्टरपंथी संगठन अभिनव भारत से जुड़े होने का आरोप लगाया था। इन सभी पर साजिश रच कर धमाके करने के आरोप लगाए गए थे। लोकेश शर्मा पर धमाकों को अंजाम देने के लिए मदद मुहैया कराने और राजेंद्र चौधरी को मुख्य साजिशकर्ताओं में से एक बताया गया था।
तब एनआईए ने मुंबई की विशेष अदालत में दाखिल चार्जशीट में कट्टर हिंदूवादी संगठनों से जुड़े लोकेश शर्मा, धन सिंह, राजेंद्र चौधरी और मनोहर के नाम लिया था। इन सभी पर साजिश रच कर धमाकों को अंजाम देने के आरोप लगाए गए हैं। बाद में कुछ लोगों पर से आरोप हटा लिए गए। असीमानंद को प्रताड़ित करके उनसे इकबालिया बयान दिलवाया गया कि ये ब्लास्ट हिंदू संगठनों ने किए थे। इन लोगों पर योगी आदित्यनाथ और संघ एवं भाजपा के बड़े नेताओं के नाम लेने का दबाव बनाया जा रहा था।
झूठ का ज्यादा समय तक नहीं टिकता है। यही हुआ इन आरोपितों को साथ। कई मामलों में इन लोगों को क्लीन चिट मिल गई और कई मामलों में अभी केस चल रहा है, लेकिन अधिकांश को बेल मिल गई। उस दौरान इन लोगों के साथ की गई बर्बरता का खुलासा साध्वी प्रज्ञा ने बाद में कई मौकों पर किया। साध्वी प्रज्ञा ने मुंबई के पूर्व पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा था कि 3-4 पुलिसकर्मियों की उपस्थिति में परमबीर ने उन्हें बहुत ज्यादा प्रताड़ित किया था। हिरासत में लेकर उन्हें बेल्ट से इस तरह पीटा गया कि उन्हें वेंटीलेटर तक पर जाना पड़ा। उनकी रीढ़ की हड्डी भी टूट गई। उन्होंने परमबीर सिंह पर आरोप लगाया था कि उन्हें हिरासत के दौरान पॉर्न वीडियो दिखाई गईं और उनसे भद्दे सवाल किए गए।
अपनी प्रताड़ना के विषय में साध्वी ने बताया था कि उन्हें 7-8 लोगों के घेरे के बीच में मारा गया। उनके पैरों के तलों तक में बेल्ट से पिटाई हुई। उन्हें 24 दिनों तक भूखा रखा गया था, उनको बिजली के झटके दिए जाते थे। गाली-गलौच तो आम बात थे। उनको पुरुष कैदियों के साथ रखकर पोर्न वीडियो देखने पर मजबूर किया जाता था। ATS के जरिए कॉन्ग्रेस के टॉर्चर के कारण उनके ब्रेन में सूजन आ गई है, आँखों से देखने और कानों से सुनने में कठिनाई जैसी समस्याएँ हो गईं। उन्होंने बताया था कि पुलिस की हिरासत में उनकी हालत बिगड़ी। उनको कैंसर और न्यूरो की बीमारी हो गई। शरीर में पस तक पड़ गया। इन सबके बाद जब उन्हें कोर्ट के आदेश पर डॉक्टर के पास ले जाया जाता था तो उन पर दबाव रहता था कि वह यह रिपोर्ट दे कि साध्वी एकदम ठीक हैं। इतना ही नहीं, बेल के आवेदन करने पर जजों को धमकी दिलवाई जाती थी।
साध्वी प्रज्ञा के साथ जिन अन्य लोगों के बयान दर्ज किए गए उनमें लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित, मेजर (रिटायर्ड) रमेश उपाध्याय, सुधाकर चतुर्वेदी, सुधाकर द्विवेदी, समीर कुलकर्णी और अजय राहिरकर शामिल हैं। कर्नल पुरोहित को भी खूब प्रताड़ित किया गया था। कर्नल पुरोहित अपने साथ हुए प्रताड़ना को लेकर 8 मई 2024 को मुंबई के एक कोर्ट को बताया था, “मेरे साथ जानवरों और युद्ध बंदी से भी बदतर व्यवहार किया गया। हेमंत करकरे, परमबीर सिंह और कर्नल श्रीवास्तव लगातार मुझ पर इस बात के लिए जोर देते थे कि मैं मालेगाँव बम धमाके के लिए खुद को जिम्मेदार बता दूँ। उन्होंने मुझसे कहा कि मैं RSS, VHP के वरिष्ठ नेताओं और उत्तर प्रदेश के तत्कालीन सांसद योगी आदित्यनाथ का नाम लूँ। उन्होंने मुझे 3 नवम्बर, 2008 तक यातनाएँ दी।”
कर्नल पुरोहित ने कोर्ट को आगे बताया था, “हेमंत करकरे और परमबीर सिंह बार-बार मुझ पर अपने खुफिया नेटवर्क की जानकारी देने के लिए दबाव डाल रहे थे। यह लोग मुझसे अपने उन मुखबिरों की सूची देने को कह रहे थे जिन्होंने आतंकी संगठन SIMI, ISI और डॉ. जाकिर नाइक की गतिविधियों का पता लगाने में मेरी सहायता की थी। मैंने अपने नेटवर्क का खुलासा करने से इनकार कर दिया, क्योंकि यह मुझे स्वीकार्य नहीं था। इसके बाद मुझे बुरी तरह यातना दी गई।” कर्नल पुरोहित ने आरोप लगाया कि ATS गवाहों से बन्दूक की नोक पर बयान दिलवाती थी। उन्हें प्रताड़ित करती थी।
कॉन्ग्रेस के दौर में गृह मंत्रालय में एक अंडर-सेक्रेटरी के रूप में काम किए आरवीएस मणि ने अपनी किताब ‘हिंदू टेरर’ में लिखा मेजर रमेश उपाध्याय को दी गई याचना के बारे में बताया है। उपाध्याय ने बताया था कि मालेगाँव ब्लास्ट में कॉन्ग्रेस की यूपीए सरकार ने उन्हें फँसाया था। उन्हें हिरासत में लेने के बाद एटीएस उनके साथ बर्बरता करती थी। उन्हें धमकी दी जाती थी कि उनकी पत्नी को नंगा घुमाया जाएगा। उनकी बेटी के साथ रेप किया जाएगा और बेटे का जबड़ा तोड़ दिया जाएगा। उनकी शादीशुदा बेटियों के घरों पर दबिश दी गई । हर वो हालात पैदा कर दिए गए कि वो कैसे भी वो जुर्म कबूलें जो उन्होंने किया ही नहीं। उनका नार्को टेस्ट भी कराया गया। हालाँकि जब उसमें उन्हें क्लीनचिट मिल गई तो रिपोर्ट को दबा दिया गया।
हालाँकि, इस मामले में डरा-धमकाकर जितने भी गवाह बनाए थे, वे बाद में सभी एक-एक करके अपने बयान से मुकर गए और कॉन्ग्रेस सरकार की साजिश का पर्दाफाश हो गया। इस तरह हिंदू आतंकवाद का नैरेटिव गढ़ने के लिए कॉन्ग्रेस की सरकार ने सत्ता और अपनी शक्ति का भरपूर दुरुपयोग किया और कई लोगों की जिंदगी पूरी तरह बदल दी। इन मामलों में आरोपित बनाए गए कई लोग आज भी सामान्य जिंदगी नहीं जी पाते हैं। इस फिल्म में इस पूरे मामले को दिखाने की कोशिश की गई है।