अमेरिकी रिसर्च एजेंसी प्यू रिसर्च के अनुसार, भारत की 30 प्रतिशत आबादी सामान्य वर्ग की है। इसमें बाभनों की जनसंख्या 4 प्रतिशत और सामान्य वर्ग के दूसरी जातियों की जनसंख्या 26 प्रतिशत है। इस हिसाब से अगर 2021 में भारत की जनसंख्या 139 करोड़ मान ली जाये तो सामान्य वर्ग की कुल आबादी 36 करोड़ 14 लाख है। वहीं, इस हिसाब से भारत में बाभनों की कुल जनसंख्या लगभग 5 करोड़ 50 लाख है। सर्वे में यह बात भी उभर कर सामने आई कि बाभनों ने खुद को सामान्य वर्ग या हिंदू मानने के बजाय खुद को ब्राह्मण माना।

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साभार: ट्विटर

पिछले महीने 29 जून को जारी किये गए आंकड़ों में प्यू रिसर्च ने कहा है कि 10 में 3 यानी 29 प्रतिशत बाभनों ने कहा कि वे पड़ोसी के रूप में किसी अनुसूचित जाति या जनजाति के व्यक्ति को स्वीकार नहीं करेंगे। वहीं, 78 प्रतिशत शहरी और 69 प्रतिशत ग्रामीण लोगों ने माना कि वे दलितों को पड़ोसी के रूप में स्वीकार करने में उन्हें कोई ऐतराज नहीं है।

हिंदुओं में सबसे अधिक बाभनों ने तिलक लगाने और जनेऊ पहनने पर जोर दिया। लगभग 76 प्रतिशत बाभनों ने कहा कि वे तिलक लगाना  पसंद करते हैं, जबकि हिंदू समुदाय के 53 प्रतिशत लोगों ने तिलक लगाने के प्रति रुचि दिखाई। वहीं, जनेऊ पहनने के मामले में भी बाभन आगे रहे। लगभग 56 प्रतिशत बाभनों ने माना कि वे जनेऊ पहनते हैं, जबकि 18 प्रतिशत हिंदुओं ने माना कि वे जनेऊ धारण करते हैं।

अगर युवा बाभनों की बात की जाय तो उनमें जनेऊ धारण की प्रवृत्ति अपेक्षाकृत कम है। 35 वर्ष से कम आयु के 45 प्रतिशत बाभन जनेऊ धारण करते हैं, जबकि 35 वर्ष के ऊपर 65 प्रतिशत बाभन जनेऊ धारण करते हैं। अगर हिंदू धर्म से बाहर तिलक और जनेऊ की बात करें तो प्यू रिसर्च के अनुसार, सिख समुदाय के 7 प्रतिशत तिलक और 7 प्रतिशत जनेऊ पहनते हैं, जबकि बौद्ध धर्म के मानने वाले 17 प्रतिशत तिलक लगाते हैं और 3 प्रतिशत जनेऊ पहनते हैं।

सर्वे में सामने आया है कि 64 प्रतिशत बाभन पुरुष और 66 प्रतिशत बाभन महिला दूसरी जाति और धर्म में शादी करने के खिलाफ हैं। वहीं, 63 प्रतिशत हिंदू पुरुष और 64 प्रतिशत हिंदू महिला जाति-धर्म से बाहर शादी के खिलाफ है। वहीं मुसलमानों में 70 पुरुष और 74 महिला जाति, खासकर धर्म से बाहर शादी के विरोध हैं। बौद्ध धर्म में 44 प्रतिशत पुरुष और 44 प्रतिशत महिला इसके खिलाफ है।