कॉन्ग्रेस (Congress) के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी (Rahul Gandhi) ने कहा कि मोदी सरकार (Modi Government) की गलत नीतियों के कारण पाकिस्तान और चीन भारत के गठबंधन बना है। इस रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि राहुल गांधी शायद भूल गए हैं कि पंडित जवाहरलाल नेहरू ने प्रधानमंत्री रहते पाकिस्तान ने शक्सगाम घाटी चीन को सौंप दी थी।

पंडित जवाहरलाल नेहरू (साभार: नवभारत टाइम्स)

पंडित नेहरू के नाम पर कई असफलताएं दर्ज हैं। चीन ने जब तिब्बत पर आक्रमण किया तो पाकिस्तान चिंतित हो उठा था। पाकिस्तान ने उस वक्त भारत को चीन के खिलाफ मोर्चे में शामिल होने की अपील भी की थी, लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की अदूरदर्शिता के कारण यह संभव नहीं हो सका।

चीन ने जब तिब्बत पर हमला किया, उस वक्त पाकिस्तान साउथ एशियन ट्रीटी आर्गेनाइजेशन (SEATO) और सेंट्रल ट्रीटी आर्गेनाइजेशन (CENTO) के साथ जुड़ गया। 1959 में पाकिस्तान के तानाशाह राष्ट्रपति अयूब खान ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के हुंजा घाटी और आसपास के क्षेत्रों में घुसपैठ को लेकर चीन को गंभीर नतीजे भुगतने की धमकी दी थी। चीन 1953 से इन इलाकों में घुसपैठ कर रहा था। अयूब ने इसे चीन की विस्तारवादी नीति बताया था।

सितंबर 1959 में इस्लामाबाद से ढाका जाते वक्त अयूब खान नई दिल्ली के पालम हवाई अड्डे पर रूके और औपचारिक रूप से भारतीय उपमहाद्वीप की संयुक्त रक्षा का प्रस्ताव रखा था। मनमोहन सिंह सरकार में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहे ज्योतिन्द्र नाथ दीक्षित ने ‘युद्ध और शांति में भारत-पाकिस्तान’ किताब में चीन के खिलाफ पाकिस्तान और भारत के बीच संयुक्त रक्षा समझौते के बारे में लिखा है। उन्होंने लिखा है कि अयूब ने 24 अप्रैल 1959 को एक संयुक्त रक्षा समझौते का प्रस्ताव रखा था। बता दें कि मार्च 1959 में चीन द्वारा तिब्बत पर हमले के बाद दलाई लामा भारत में शरण लेने पहुंचे थे।

भारत के पहले पीएम पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अयूब के प्रस्ताव को खारिज कर दिया था। नेहरू ने 1948 में पाकिस्तान द्वारा जम्‍मू-कश्‍मीर पर हमला किए जाने के बाद 1949 में पाकिस्‍तान के सामने ‘नो वॉर’ समझौते की पेशकश रखी थी, जिसे पकिस्तान ने ठुकरा दिया था।

रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका में पाकिस्तान के राजदूत रहे अजीज अहमद और अमेरिकी अधिकारियों के बीच फरवरी 1963 में भी कुछ ऐसी ही बातचीत हुई थी। इस बातचीत में कहा गया था कि पाकिस्तान लद्दाख और कश्मीर वाले इलाके की रक्षा करे और भारत अरुणाचल प्रदेश वाले क्षेत्र की। ऐसे में भारतीय उपमहाद्वीप सुरक्षित रहेगा।

वहीं, 1962 भारत-चीन युद्ध के बाद तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री हेरोल्ड मैकमिलन ने कहा था कि भारत को चीनी आक्रमण के खिलाफ रक्षा समझौता करना चाहिए। यह तभी संभव है जब भारत और पाकिस्तान एक साथ आएं। ऐसे में यह अधिक प्रभावी हो सकता है। उन्होंने कहा था कि इससे अमेरिका की परेशानी कम होगी।

साल 1959 के बाद संयुक्त रक्षा समझौते की संभावनाएं फीका पड़ता देख पाकिस्तान और चीन आते चले गए। इस दौरान दोनों देशों ने अपने सीमा विवाद को सुलझाने की कोशिश की। इस बात को लेकर 17 जुलाई 1963 को जुल्फिकार अली भुट्टो ने पकिस्तान की नेशनल असेंबली में कहा था कि भारत के साथ युद्ध के मामले में पाकिस्तान अकेला नहीं होगा, एशिया का सबसे शक्तिशाली देश पाकिस्तान की मदद करेगा।