इस्लामी सुल्तान के सामने डटी रहीं रानी दुर्गावती, जौहर था अंतिम विकल्प
मध्य प्रदेश के रायसेन किले से जुड़े संघर्ष में 701 क्षत्राणियों के जौहर को आज 494 साल पूरे हो गए हैं। मुगलों के आक्रमण के दौर में जौहर की इस कहानी के बारे में बुहत कम लोग ही जानते हैं। बात 6 मई 1532 की है, जब रायसेन किले पर राजा शिलादित्य की रानी दुर्गावती ने बहादुर शाह के सामने झुकने की बजाय लड़ने का निर्णय लिया था।
महारानी दुर्गावती ने गुजरात के मुस्लिम आक्रांता सुल्तान बहादुर शाह के सामने घुटने टेकने की जगह 701 राजपूतानियों के साथ जौहर कर लिया था। 6 मई 1532 को किले में हुए इस जौहर के कई प्रमाण इतिहास में मिलते हैं। रायसेन के गजेटियर में भी इस घटना का उल्लेख है।
महारानी दुर्गावती मेवाड़ के महाराणा संग्राम सिंह उर्फ राणा सांगा की बेटी थीं। उनका विवाह रायसेन के तोमर क्षत्रिय महाराजा शिलादित्य से हुआ था। मुगल बादशाह बहादुर शाह ने धोखा देकर महाराजा शिलादित्य को कैद कर लिया था। इसके बाद महारानी दुर्गावती ने मुगलों से युद्ध करने का निर्णय लिया था।
दरअसल, गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने रायसेन के राजा सिल्हादी शिलादित्य को अपने शिविर में बुलाकर धोखे से मांडू में कैद कर लिया था। रायसेन किला तब रानी दुर्गावती और शिलादित्य के भाई लक्ष्मण राय की देखरेख में था तो इसे घेर लिया। घेराबंदी के बाद भी सुल्तान जब किले में सेंध नहीं मार पाया तब महाराजा शिलादित्य ने बहादुर शाह से अपने भाई व पत्नी से बात करने की इच्छा जताई।
महाराजा शिलादित्य ने किले में पहुंचकर रानी दुर्गावती और भाई से मंत्रणा की। इसमें न झुकने और हर हाल में लड़ने का फैसला लिया गया। हार तय थी, क्योंकि किले में बारूद की कमी और शत्रु सेना की अधिक संख्या अधिक थी। राजपूत योद्धा युद्ध के लिए निकले और उधर रानी दुर्गावती ने 701 राजपूतनियों के साथ जौहर का निर्णय ले लिया।
राजपूतों ने लड़ाई जारी रख युद्घ किया। शिलादित्य और उसके भाई मारे गए। शिलादित्य का बेटा भूपति राय उस समय एक युद्घ अभियान पर था। जब उसे इस घटना की जानकारी मिली तो वह लौटा और बहादुर शाह के सामंत को मार भगाया। इस तरह रायसेन किले पर फिर राजपूतों का कब्जा हो गया।
मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पुरातत्वविद नारायण व्यास का कहना है, “रायसेन के ऐतिहासिक किले में महारानी दुर्गावती के जौहर के कई प्रमाण मिले हैं। गजेटियर में भी इसका उल्लेख है। इतिहास को अगर देखा जाए तो मध्यकाल में रायसेन किले की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।”