दुनिया में सबसे अधिक अधिक प्लास्टिक प्रदूषण फैलाता है भारत: कैंसर, पर्यावरण एवं जलीय जीवन पर खतरा
भारत एक ऐसा देश है, जो अपनी समृद्ध जैव विविधता और पारिस्थितिकी विरासत के लिए प्रसिद्ध है। हालाँकि, देश में बढ़ते प्लास्टिक प्रदूषण ने इन पर संकट खड़ा कर दिया है। इतना ही नहीं, अपनी विशालता के कारण और लगातार किए जाने वाले प्लास्टिक उपयोग की वजह से भारत दुनिया में सबसे अधिक प्लास्टिक प्रदूषण फैलाने वाला देश बन गया है। भारत दुनिया के कुल प्लास्टिक कचरे का लगभग 20% अकेले पैदा करता है। यह कचरा सालाना 90 लाख टन होता है। प्लास्टिक कचरे को नष्ट होने में 800 साल से भी अधिक समय लगते हैं। इससे समझा जा सकता है कि यह चुनौती कितनी बड़ी है।
भारत में प्लास्टिक कचरे का प्रबंधन पर ढंग से नहीं हो पाता है। अगर भारत में प्लास्टिक के उपयोग को प्रति व्यक्ति के हिसाब से देखें तो यह आँकड़ा भयावह हो जाता है। भारत में हर साल एक व्यक्ति लगभग 11 किलोग्राम प्लास्टिक उपयोग करता है। अगर प्रतिदिन के हिसाब से देखे तो प्रति व्यक्ति प्रति दिन 0.12 किलोग्राम प्लास्टिक कचरा पैदा करता है। हालाँकि, यह कई पश्चिमी देशों से कम है, लेकिन इन प्लास्टिक कचरों के सफल निस्तारण का उपाय नहीं होने के कारण ये कचरे पर्यावरण को नुकसान पहुँचाते हैं।
देश में प्लास्टिक कचरा फैलने का सबसे बड़ा कारण जनसंख्या में विस्फोटक तेजी, बढ़ता शहरीकरण और आर्थिक विकास में अन्य कारकों की लगातार अपेक्षा भी है। शहरी क्षेत्रों में ही नहीं, अब तो ग्रामीण क्षेत्रों में भी प्लास्टिक पैकेजिंग वाले सामान धड़ल्ले से बिक रहे हैं। ये प्लास्टिक इधर-उधर फेंके हुए होते हैं। इतना ही नहीं, देश में हर साल 58 लाख टन से अधिक कचरे को जला दिया जाता है। इससे निकलने वाली गैंसे ओजोन परत को भारी नुकसान पहुँचाती हैं। इसका अलावा, ये मानव एवं अन्य जीवों को भी नुकसान पहुँचाती हैं। इन जहरीले गैसों के कारण लोगों में श्वसन संबंधी बीमारियाँ पैदा होती हैं।
देश में प्लास्टिक कचरे का एक बड़ा हिस्सा बैग, स्ट्रॉ, कटलरी और पैकेजिंग सामग्री है। इन सब का आमतौर पर सिर्फ बार इस्तेमाल किया जाता है और फिर इन्हें फेंक दिया जाता है। देश में प्लास्टिक उपयोगों पर प्रतिबंध तो है, लेकिन इसकी कड़ाई से पालन नहीं होने के कारण यह आम चलन में है। साल 2022 में देश में सिंगल यूज प्लास्टिक के इस्तेमाल पर रोक लगा दिया गया था, लेकिन यह आसानी से उपलब्ध है। भारत के कुल प्लास्टिक कचरे का 43% हिस्सा सिंगल-यूज प्लास्टिक होता है। इसके पीछे का कारण कम लागत और लोगों के लिए किफायती होना है। लागत कम होने के कारण कंपनियाँ इसे बनाती हैं और आम लोग इसे खरीदते हैं।
प्लास्टिक कचरे के फैलने की पीछे भारत की अपशिष्ट के रिसाइक्लिन करने की क्षमता में कमी भी एक महत्वपूर्ण कारक है। भारत में प्लास्टिक कचरे को संभालने के लिए अभी पर्याप्त ढाँचा विकसित नहीं किया जा सका है। कचरा बीनने वालों और छोटे पैमाने पर इसका रिसाइकल करने वाले वाले ही प्लास्टिक कचरे का आमतौर पर प्रबंधन में भूमिका निभाते हैं। माना जाता है कि भारत का लगभग 60% प्लास्टिक कचरा इसी अनियमित क्षेत्र द्वारा संभाला जाता है। हालाँकि, कचरा बिनने वाले और इसे रिसाइकल करने वाले छोटे उद्योगों को आमतौर पर कोई सहायता या समर्थन नहीं मिलता। इसके बावजूद इसे रोकने में ये महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
शहरों में निकलने वाले कचरे का अनुमानित 77% हिस्सा बिना रिसाइकल किए हुए ही खुले में फेंक दिया जाता है। कुल प्लास्टिक कचरे का लगभग 30% लैंडफिल में फेंका जाता है। इससे निकला रसायन अन्य जल स्रोतों में जाकर मिल जाता है और गंभीर चुनौतियाँ पैदा करता है। शहरों में तो प्लास्टिक कचरा ड्रेनेज सिस्टम को ही अवरूद्ध कर देता है। इसके कारण शहर में बाढ़ आ जाती है। दिल्ली के गाजीपुर और बादली जैसे लैंडफिल साइट के कारण आसपास के क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को कई तरह की बीमारियाँ हो रही है। देश की राजधानी में इन प्लास्टिक कचरे के प्रबंधन का समुचित उपाय नहीं किया गया है तो छोटे-छोटे शहरों एवं ग्रामीण क्षेत्रों में इसकी बात करना उचित प्रतीत नहीं होता।
माइक्रोप्लास्टिक तो देश भर में 83% नल के पानी के नमूनों में पाए गए हैं। वे कृषि भमि तक पहुँच चुके हैं। इसका असर खाद्य सामग्री में भी देखने को मिलने लगा है, जो स्वास्थ्य के लिए बेहद घातक होगा। इससे कैंसर जैसे जानलेवा रोग सहित कई असाध्य बीमारियों के पैदा होने का खतरा बढ़ गया है। भारत के तटीय क्षेत्रों की स्थिति भी अलग नहीं है। देश में समुद्री कूड़े का अनुमानित 80% हिस्सा प्लास्टिक है। जलीय जीव प्लास्टिक कचरे को भोजन समझकर अक्सर खा लेते हैं। इसके कारण कई समुद्री प्रजातियों के अस्तित्व पर संकट आ गया है।
भारत ने प्लास्टिक कचरे से निपटने के लिए कई कानून हैं। इनमें प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 प्रमुख है। इस कानून में समय-समय पर संशोधन भी हुए। इनमें साल 2018, साल 2021 और साल 2024 के संशोधन प्रमुख है। इसके अलावा, विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) ढाँचा भी तैयार किया गया है। प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 का उद्देश्य प्लास्टिक कचरे को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करना और इनके रिसाइकल को बढ़ावा देना है। हालाँकि, इस कानून को कठोरता से लागू करने की इच्छाशक्ति, भ्रष्टाचार और बुनियादी ढाँचा की कमी के कारण यह असफल सिद्ध होता दिख रहा है।