मौर्य से मुगल तक का इतिहास पुराणों में! इतिहासकार इन्हें ‘ऑथेंटिक’ क्यों नहीं मानते?
हिंदू धर्म में पुराणों की अपनी महात्म्य है। ज्यादातर पंडित इन्हीं पुराणों के आधार पर कर्मकांड कराते हैं। हालाँकि, अंग्रेज इसे अप्रामाणिक ग्रंथ मानते थे। इतिहासकार भी ऐसा ही मानते हैं। आर्य समाजी भी ऐसा ही कहते हैं। भविष्य पुराण तो ऐसा पुराण हैं, जिसमें मुस्लिमम आक्रांताओं और विक्टोरिया आदि का गुणगान किया गया है। इनका काल मौर्यकाल यानी बौद्ध काल से लेकर मध्यकाल यानी मुगलकाल तक माना जाता है।
दरअसल, हिंदू धर्म में पुराणों की संख्या मुख्यत: अट्ठारह बताई गई है, जिनमें कुल 4 लाख श्लोक हैं। ये पुराण हैं – विष्णु, पद्य, ब्रह्म, शिव, भागवत, नारद, मार्कंडेय, अग्नि, ब्रह्मवैवर्त, लिंग, वाराह, स्कंद, वामन, कूर्म, मत्स्य, गरुड और ब्रह्मांड पुराण। इसके अलावा, देवीभागवत पुराण, वायु पुराण और भविष्य पुराण सहित कई अन्य पुराण हैं।
जो अन्य पुराण हैं, उन्हें उप-पुराण का नाम दे दिया गया है। ये उप-पुराण हैं: गणेश पुराण, नृसिंह पुराण, कल्कि पुराण, एकाम्र पुराण, कपिल पुराण, दत्त पुराण, श्रीविष्णुधर्मोत्तर पुराण, मुद्गगल पुराण, सनत्कुमार पुराण, शिवधर्म पुराण, आचार्य पुराण, मानव पुराण, उश्ना पुराण, वरुण पुराण, कालिका पुराण, महेश्वर पुराण, साम्ब पुराण, सौर पुराण, पराशर पुराण, मरीच पुराण, भार्गव पुराण, हरिवंश पुराण, सौरपुराण और प्रज्ञा पुराण।
पुराण शब्द ‘पुरा’ एवं ‘अण शब्दों की संधि से बना है। पुरा का अथ है- ‘पुराना’ अथवा ‘प्राचीन’ और अण का अर्थ होता है कहना या बतलाना। कहते हैं कि शुरू में एक ही पुराण था, जिसमें एक अरब श्लोक थे। बाद में इस पुराण को वेद व्यास ने कई भागों में विभक्त किया। हालांकि इतिहासकार मानते हैं कि पुराणों की रचना वैदिक काल के काफी बाद की है।
ब्रह्म, मत्स्य, विष्णु, ब्रह्मांड आदि सब पुराणों में ब्रह्मपुराण पहला कहा गया है। शोधकर्ता पुराणों में सबसे पुराने पुराण ब्रह्म पुराण और विष्णु पुराण को मानते हैं, क्योंकि पुराण के पांचों लक्षण भी उस पर ठीक बैठते हैं। उसमें सृष्टि की उत्पत्ति और लय, मन्वंतरों, भरतादि खंडों और सूर्यादि लोकों, सूर्य वंश, चंद्र वंश आदि का वर्णन है।
इन पुराणों के बाद मत्स्य पुराण, स्कंद और वराह पुराण की प्रतिष्ठा है। फिर शिव और देवीभागवत पुराण। कुछ लोगों का कहना है कि वायुपुराण ही शिवपुराण है। लेकिन कुछ पुराणों में मगध के मौर्य वंश, गुप्तवंश तथा शुंग वंश के राजाओं तक का उल्लेख मिलता है। ये पुराण हैं विष्णु पुराण, वायु पुराण और मत्स्य पुराण हैं।
भविष्य पुराण में तो अकबर, तैमूर, बाबर, हुमायूँ से लेकर इंग्लैंड की रानी विक्टोरिया तक का वर्णन है। इतिहासकारों का मानना है कि सबसे पुराने माने जाने वाले मत्स्य पुराण में शुंग वंश के राजाओं का विवरण है तो यह अति प्राचीन कैसे हो सकता है? इसलिए माना जाता है कि इन पुराणों को उसी काल में लिखा माना गया है।
पुराणों में श्रीमद्भागवत पुराण का ही प्रचार सबसे अधिक है क्योंकि उसमें भक्ति के माहात्म्य और श्रीकृष्ण की लीलाओं का विस्तृत वर्णन है। इसमें 12 स्कंधों के भीतर पुरातन सभी प्रसंगों को समेटा गया है। अग्निपुराण में इतिहास के साथ साथ ही आयुर्वेद, व्याकरण, रस, अलंकार, शस्त्र- विद्या आदि अनेक विषयों का वर्णन है।
सारांश यह कि अधिकांश पुराणों का वर्तमान रूप हजार वर्ष से लेकर 500 साल पहले तक का है। इसका कारण यह कि यदि यह पुराण प्राचीन होते तो इनमें किसी जाति और धर्म विशेष के प्रति द्वैष वाली भावनाओं का प्राचार नहीं मिलता। जैसे शूद्र, मलेच्छ, यवनादि के बारे में उल्लेख करना।