सरकार से पैसा, काम पाकिस्तान के लिए: कश्मीर के बर्खास्त शिक्षक युवाओं को पढ़ाते थे मौत का पाठ
जम्मू-कश्मीर में इस्लामिक आतंकवाद को समर्थन और अलगाववाद को बढ़ावा देने के मामले में उपराज्यपाल ने जिन शिक्षकों को बर्खास्त किया था, वे आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त थे। सूत्रों के हवाले से अमर उजाला ने बताया कि ये शिक्षक बच्चों को जीवन की शिक्षा देने के बजाय उन्हें मौत की शिक्षा देते थे। ये शिक्षक युवाओं को पत्थरबाज से लेकर आतंकी बनने तक के लिए प्रेरित कर रहे थे। किसी ने आतंकियों को सीधे मदद की तो किसी ने जमात में अपना योगदान दे रहा था। आइए, केंद्रीय एजेंसियों द्वारा तैयार तैयार की गई रिपोर्ट के आधार पर इन शिक्षकों की बारे में जानते हैं:

मोहम्मद जब्बार पर्रे: पर्रे जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान में लेक्चरर पद तैनात था। यह जमात-ए-इस्लामी का बेहद करीबी था और इसे वहाँ छोटा गिलानी कहा जाता है। वह जमात के विद्यार्थियों, जिसे जमात-ए-तुल्बा विंग कहा जाता है, के युवाओं को उकसाता और पत्थरबाजी के लिए प्रेरित करता था। यह आतंकियों के जनाजे का प्रबंध भी करता था। कहा जाता है कि इसने बिजबिहाड़ा में आतंकियों के जनाजे में एक दर्जन से ज्यादा युवाओं को आतंकी बनवा दिया था। वह मस्जिदों से युवाओं को कट्टरपंथी बनाने के साथ-साथ अनंतनाग जिले में कई आतंकी हमलों में जैश-ए-मोहम्मद की मदद की थी।
अब्दुल गनी तांत्रे: अनंतनाग के हांजी मोहल्ला बटेंगू मिडिल स्कूल में शिक्षक तांत्रे आतंकी संगठन हिज्बुल मुजाहिदीन से 1990 से ही संपर्क में है। वह 1990 में शिक्षक के रूप में तैनात हुआ था। तांत्रे कुछ महीनों का खुद अवकाश लेकर अपने छोटे भाई निसार अहमद तांत्रे को अस्थायी शिक्षक बनवा दिया, जो बाद में स्थायी हो गया। निसार अहमद तांत्रे हिज्बुल सरगना सलाहुद्दीन का करीबी बन गया। निसार का बेटा पाकिस्तान में पढ़ाई कर रहा है, जिसका सारा खर्च सलाहुद्दीन ही उठाता है।
सकीना अख्तर: अनंतनाग के गोरजन शीरम प्राइमरी स्कूल में सकीना अख्तर अस्थायी शिक्षिका थी। साल 2008 में उसे नियमित कर दिया गया। सकीना ने शिक्षक रहते हुए देश विरोधी गतिविधियों में शामिल दुख्तरान-ए-मिल्लत के ज्यादा काम किया। सकीना सरकार से वेतन लेती थी, लेकिन काम पाकिस्तान के लिए करती थी।
रजिया सुल्तान: अनंतनाग में खीरम स्कूल की प्रमुख रजिया को उसके पिता की जगह नौकरी मिली थी। रजिया के पिता सुल्तान भट्ट जमात-ए-इस्लामी समर्थक थे, लेकिन सुल्तान को धोखे के शक पर आतंकियों ने 1996 में मार डाला था। जांच रिपोर्ट के अनुसार रजिया जमात व दख्तरान-ए-मिल्लत के लिए सभाएं करतीं और शिक्षक होने के बावजूद लोगों को देश विरोध के लिए बरगलाती।