उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का योगी आदित्यनाथ का गो-प्रेम जगजाहिर है। गोरखपुर में स्थित उनके गोरखनाथ मठ में आज भी लगभग 500 गोवंश हैं। इनकी सेवा और लालन-पालन मठ द्वारा किया जाता है। समय-समय पर गो-सेवा करते हुए योगी आदित्यनाथ की तस्वीरें भी सामने आती रहती हैं।

साल 2017 में जब योगी आदित्यनाथ पहली बार मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने सबसे पहले प्रदेश के बुचड़खानों पर हमला बोला। प्रदेश में जितने भी अवैध बूचड़खाने थे, उन्हें बंद करवाया। गोहत्या पर रोक लगाई। जगह-जगह गोशाला खुलवाए गए। इन गोशालाओं को सरकार की ओर सहायता दी गई।

अखिलेश यादव के कार्यकाल (2012-2017) के दौरान पूरे उत्तर प्रदेश में लगभग 356 मुख्य बूचड़खाने (Slaughterhouses) संचालित हो रहे थे। इनमें से आधिकारिक और पूरी तरह वैध बूचड़खानों की संख्या करीब 40 थी। बाकी के सैकड़ों बूचड़खाने बिना वैध लाइसेंस के (अवैध/अनाधिकृत रूप से) चल रहे थे।

एक विजनरी नेता के रूप में योगी आदित्यनाथ ने ऐसे कई कदम उठाए, जो किसानों के लिए बेहद लाभकारी रहा। उन्होंने गायों को बचाने और इन गायों के जरिए किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए प्रदेश में कई योजनाएँ शुरू कीं। इससे गोवंश और किसान, दोनों को फायदा हुआ। इस मुहिम को योगी आदित्यनाथ लगातार आगे बढ़ा रहे हैं।

गोसंरक्षण: किसानों की आय में वृद्धि और युवा उद्यमिता का विकास 

योगी आदित्यनाथ की गोसंरक्षण नीति ने ना सिर्फ देशी नस्लों का संरक्षण किया, बल्कि यह नीति ग्रामीण अर्थव्यवस्था और रोजगार का मजबूत आधार भी बन गई है। प्रदेश में किसान और स्टार्टअप शुरू करने वाले युवा पंचगव्य आधारित आयुर्वेदिक उत्पादों का कारोबार कर रहे हैं। यह कारोबार करोड़ों रुपये का है।

इतना ही नहीं, प्रदेश में देसी गायों के संरक्षण के साथ आयुर्वेदिक फार्मेसी भी संचालित की जा रही हैं। परंपरागत भारतीय चिकित्सा पद्धति और आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण का समन्वय करते हुए अब आयुर्वेदिक उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। इससे किसानों और युवा उद्यमियों, दोनों का फायदा हो रहा है।

बुलंदशहर के एनवायरमेंट इंजीनियर पराग गौड़ को ले लीजिए। उन्होंने प्राकृतिक उपचार को बढ़ावा देने के उद्देश्य से पंचगव्य आधारित 40 से अधिक आयुर्वेदिक उत्पाद विकसित किए हैं। इन उत्पादों में मोटापे के लिए गोमूत्र अर्क, लिवर और किडनी के लिए पुनर्नवादि अर्क, थायरॉइड के लिए कचनारादि अर्क शामिल हैं।

इतना ही नहीं, पराग ने रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए देसी गाय के घी से तैयार च्यवनप्राश, श्वसन संबंधी समस्याओं और कैंसर की बीमारी में कारगर गोमूत्र कैप्सूल, महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए फल घृत, बच्चों के विकास के लिए अश्वगंधा घृत, शरीर की मजबूती के लिए शतावरी घृत, आंखों के लिए त्रिफला घृत तथा पेट संबंधी रोगों, बवासीर और गैस की समस्या में उपयोगी तक्रारिष्ट प्रमुख हैं। 

करीब डेढ़ दशक तक विदेशी कंपनियों के लिए काम करने वाले सॉफ्टवेयर इंजीनियर असीम रावत ने गो संरक्षण के क्षेत्र में कदम रखा। गाजियाबाद स्थित उनकी संस्था ‘हेता ऑर्गेनिक’ आज देसी गायों के संरक्षण के साथ करीब 10 करोड़ रुपये का सालाना कारोबार कर रही है। यहां देशी गायों के दूध से 150 से अधिक प्रकार के उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। इनमें A2 बिलौना घी, ब्राह्मी घृत, पंचगव्य घृत, देसी गाय का दूध, कुकीज, लड्डू, शतधौत घृत, हेल्दी मिठाइयां, स्नैक्स, हर्बल चाय, पेय पदार्थ तथा स्किन और हेयर केयर उत्पाद शामिल हैं।

 इसी तरह वाराणसी स्थित सुरभि शोध संस्थान भी लखनऊ, वाराणसी, मीरजापुर, दिल्ली सहित कई स्थानों पर गोशाला संचालित करता है। यहां 28,000 से अधिक गोवंश हैं। इन गोवंशों के गोबर और गोमूत्र का उपयोग जैविक खेती और विभिन्न उत्पादों के निर्माण में किया जाता है। इससे स्थानीय लोगों को ना सिर्फ रोजगार मिलता है, बल्कि किसानों को सस्ते में जैविक खाद भी मिलता है। 

प्रदेश में देसी गायों के पंचगव्य, आयुर्वेदिक औषधियों, जैविक उत्पादों और पारंपरिक खाद्य सामग्री की मांग लगातार बढ़ी है। इन उत्पादों का बाजार अब केवल उत्तर प्रदेश या देश तक सीमित नहीं है। यह बाजार अमेरिका, कनाडा, यूनाइटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, सिंगापुर, दुबई और यूरोप के कई देशों तक फैल चुका है।

दरअसल, मुख्यमंत्री का पद संभालने के साथ ही योगी आदित्यनाथ ने साल 2017 में ही प्रदेश में साहीवाल और थारपारकर जैसी देसी नस्लों की गाय के संरक्षण का अभियान शुरू कर दिया था। तब से यह अभियान निरंतर चल रहा है। प्रदेश में उत्तर प्रदेश गो सेवा आयोग है, जो गायों के संरक्षण के लिए नीतियां बनाता है।

गोशालाओं को आत्मनिर्भर एवं उत्पादक इकाइयों के रूप में विकसित करने के लिए आयोग ने प्रत्येक जिले की गोशालाओं के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के आधार पर मूल्यांकन कराने का निर्णय है। मूल्यांकन में वैज्ञानिक प्रबंधन, स्वच्छता, गोवंश के स्वास्थ्य एवं पोषण, नस्ल संवर्धन, दुग्ध उत्पादन, जनसहभागिता और आत्मनिर्भरता के प्रयास प्रमुख आधार होंगे।  

उत्तर प्रदेश में किए गए गो-संरक्षण उपाय

गौशालाओं और आश्रय स्थलों का विस्तार: प्रदेश भर में 7,700 से अधिक वृहद गोसंरक्षण केंद्र, कान्हा गोशालाएं और अस्थायी आश्रय बनाए गए हैं, जिनमें लगभग 12.5 लाख से अधिक गोवंश को आश्रय मिला है।

मुख्यमंत्री निराश्रित गोवंश सहभागिता योजना: इस योजना के अंतर्गत जरूरतमंद किसानों और पशुपालकों को गोवंश सौंपे जाते हैं, और उनके भरण-पोषण के लिए सीधे बैंक खाते में ₹1,500 प्रति माह भेजे जाते हैं।

गौवंश स्वास्थ्य एवं नस्ल सुधार: मवेशियों के लिए 24 घंटे टोल-फ्री हेल्पलाइन (1962), मुफ्त कृत्रिम गर्भाधान, और लंपी व खुरपका रोगों के लिए व्यापक टीकाकरण अभियान चलाए गए हैं।

चारा और गोचर भूमि की उपलब्धता: अवैध कब्जों से हजारों हेक्टेयर गोचर भूमि को मुक्त कराकर उस पर हरा चारा और नेपियर घास उगाने का काम शुरू किया गया है।

गोहत्या के खिलाफ कड़े कानूनी प्रावधान: ‘उत्तर प्रदेश गोवध निवारण संशोधन अध्यादेश’ के तहत गोवध और अवैध परिवहन पर 10 साल तक की कड़ी सजा और भारी जुर्माने का कड़ा प्रावधान किया गया है।

मशरूम उत्पादन को बढ़ावा

गोसंरक्षण के अलावा, योगी सरकार ने किसानों को वैकल्पिक खेती का भी अवसर उपलब्ध कराया है। इनमें मशरूम की खेती महत्वपूर्ण है। उत्तर प्रदेश ने मशरूम उत्पादन में देश में प्रथम स्थान प्राप्त किया है। राज्य ने वर्ष 2024-25 में 51,000 मीट्रिक टन मशरूम का उत्पादन कर राष्ट्रीय स्तर पर नया कीर्तिमान स्थापित किया है। देश में कुल 4.27 लाख मीट्रिक टन मशरूम उत्पादन होता है। इसमें उत्तर प्रदेश की लगभग 13 प्रतिशत हिस्सेदारी है। 

उन्होंने बताया कि मशरूम की खेती को बढ़ावा देने के लिए उद्यान विभाग द्वारा एकीकृत बागवानी विकास मिशन (एमआईडीएच) के अंतर्गत 40 से 50 प्रतिशत तक अनुदान प्रदान किया जा रहा है। कम भूमि, कम लागत और मात्र तीन से चार सप्ताह में तैयार होने वाली यह फसल किसानों के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध हो रही है। इसके साथ ही उत्तर प्रदेश सरकार रेशम क्षेत्र के समग्र विकास, किसानों की आय में वृद्धि और रोजगार सृजन के लिए भी कार्य कर रही है।  

किसानों की आय में 9 साल में दोगुनी वृद्धि

 यूपी सरकार की किसानों के लिए शुरू की गई योजनाओं के कारण प्रदेश में किसानों की आय लगभग दोगुनी हो चुकी है। नाबार्ड के आँकड़े के अनुसार, साल 2015-16 में यूपी के किसानों की औसत मासिक आय 6,668 रुपये थी। ये वो समय था, जब अखिलेश यादव अपनी कार्यकाल के अंतिम वर्ष में थे। आज यह आय लगभग दोगुनी बढ़कर लगभग 12,000 रुपये मासिक के करीब पहुँच गई है। 

कुल कृषि उत्पादन में आज उत्तर प्रदेश देश में पहले स्थान पर है। गन्ना, गेहूं और आलू के उत्पादन में यूपी देश में नंबर 1 है। दुग्ध उत्पादन में भी प्रदेश देश में शीर्ष पर है। वर्ष 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा बागवानी उत्पादक बना हुआ है। देश की कुल बागवानी उत्पादन में यूपी का हिस्सा 16.4% है।

उत्तर प्रदेश के आधिकारिक आर्थिक आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2016-17 में राज्य की कृषि विकास दर जो महज 8.6% थी, वह वर्ष 2024-25 तक रिकॉर्ड स्तर पर बढ़कर 17.7% तक पहुँच गई है। यह दर्शाता है कि राज्य में प्रति हेक्टेयर पैदावार और कृषि से होने वाली कमाई की रफ्तार तेज हुई है।

इन सब उपायों का असर दिखा है। राज्य में ना सिर्फ कृषि क्षेत्र में जबरदस्त विकास और कृषि आधारित उद्योग बढ़े, बल्कि आम लोगों का भी जीवन स्तर में सुधार आया। राज्य सरकार के बजट 2026 के आंकड़ों के अनुसार, यूपी की सामान्य प्रति व्यक्ति आय  वर्ष 2016-17 के 54,564 से थी, जो बढ़कर आज दोगुनी से ज्यादा यानी 1,09,844 से अधिक हो चुकी है।